Vāmadeva’s Counsel on Rooted Kingship and Non-violent Victory (वामदेवोपदेशः—दृढमूलराजधर्मः)
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजध्ानुशासनपर्वमें वामदेवगीताविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९३ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं) अपन क्ाा छा 2 चतुर्नवतितमो< ध्याय: वामदेवके उपदेशमें राजा और राज्यके लिये हितकर बर्ताव वामदेव उवाच अयुद्धेनैव विजयं वर्धयेद् वसुधाधिप: । जघन्यमाहुर्विजयं युद्धेन च नराधिप,वामदेवजी कहते हैं--नरेश्वर! राजा युद्धके सिवा किसी और ही उपायसे पहले अपनी विजय-वृद्धिकी चेष्टा करे; युद्धसे जो विजय प्राप्त होती है, उसे निम्न श्रेणीकी बताया गया है
Vāmadeva uvāca: ayuddhenaiva vijayaṃ vardhayet vasudhādhipaḥ | jaghanyam āhur vijayaṃ yuddhena ca narādhipa ||
ବାମଦେବ କହିଲେ—ହେ ବସୁଧାଧିପ! ରାଜା ଯୁଦ୍ଧ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ ଉପାୟରେ ପ୍ରଥମେ ନିଜ ବିଜୟକୁ ବଢ଼ାଇବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରିବା ଉଚିତ୍; କାରଣ ଯୁଦ୍ଧରେ ଲଭ୍ୟ ବିଜୟକୁ ସେମାନେ ନିମ୍ନତମ ବିଜୟ ବୋଲି କହିଛନ୍ତି।
वामदेव उवाच