Treasury Security, Protection of Informants, and the Kalakavṛkṣīya Exemplum (Śānti Parva 83)
सम्बुबोधयिषुर्मित्रं सदश्चवमिव सारथि: । अतिमन्युप्रसक्तो हि प्रसह हितकारणात्,'जैसे सारथि अच्छे घोड़ेको सचेत करता है, उसी प्रकार यदि कोई मित्र मित्रको समझानेके लिये आया हो, मित्रकी हानि देखकर जो अत्यन्त दुखी हो और उसे सहन न कर सकनेके कारण जो हठपूर्वक अपने सुहृद् राजाका हितसाधन करनेके लिये उसके पास आकर कहे कि “राजन! तुम्हारे इस धनका अपहरण हो रहा है” तो सदा ऐश्वर्य और उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले विज्ञ एवं सुहृद् पुछषको अपने उस हितकारी मित्रकी बात सुननी चाहिये और उसके अपराधको क्षमा कर देना चाहिये!
saṃbubodhayīṣur mitraṃ sadaśvām iva sārathiḥ | atimanyuprasakto hi prasaha hitakāraṇāt ||
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଯେପରି ସାରଥି ଉତ୍ତମ ଘୋଡ଼ାକୁ ସଚେତନ କରି ସମ୍ଭାଳେ, ସେପରି ମିତ୍ର ମିତ୍ରକୁ ବୁଝାଇବାକୁ ଆସେ। ମିତ୍ରର ହାନି ଦେଖି ସେ ଅତ୍ୟଧିକ କ୍ରୋଧ-ବେଦନାରେ ପଡ଼ି, ହିତକାରଣରୁ ବଳପୂର୍ବକ ମଧ୍ୟ କହିଦିଏ।
भीष्म उवाच