आपद्धर्मे वैश्यवृत्तिः, विक्रय-निषेधाः, तथा ब्रह्म-क्षत्र-सम्बन्धः
Emergency Livelihood, Prohibited Trade, and Brahman–Kshatra Regulation
युधिछिर उवाच अभ्युत्थिते दस्युबले क्षत्रार्थे वर्णसंकरे । सम्प्रमूढेषु वर्णेषु यद्यन्योडभि भवेद् बली,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! नृपश्रेष्ठ!ी यदि डाकुओंका दल उत्तरोत्तर बढ़ रहा हो, समाजमें वर्णसंकरता फैल रही हो और क्षत्रियके प्रजापालनरूपी कार्यके लिये समस्त वर्णोके लोग कोई उपाय न हढूँढ़ पाते हों, उस अवस्थामें यदि कोई बलवान ब्राह्मण, वैश्य अथवा शाद्र धर्मकी रक्षाके निमित्त दण्ड धारण करके लुटेरोंके हाथसे प्रजाको बचा ले तो वह राजशासनका कार्य कर सकता है या नहीं। अथवा उसे इस कार्यसे रोकना चाहिये या नहीं? मेरा तो मत है कि क्षत्रियसे भिन्न वर्णके लोगोंको भी ऐसे अवसरोंपर अवश्य शस्त्र उठाना चाहिये
yudhiṣṭhira uvāca | abhyutthite dasyu-bale kṣatrārthe varṇa-saṅkare | sampramūḍheṣu varṇeṣu yady anyo 'pi bhaved balī ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପିତାମହ, ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେତେବେଳେ ଦସ୍ୟୁବଳ ଉଦ୍ଧତ ହୋଇ ବଢ଼ିଯାଏ, କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କର ପ୍ରଜାରକ୍ଷା କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ସଫଳ ହୁଏ ନାହିଁ, ବର୍ଣ୍ଣସଙ୍କର ପ୍ରସାରିତ ହୁଏ ଏବଂ ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣ ମୋହଗ୍ରସ୍ତ/ବିଭ୍ରାନ୍ତ ହୋଇପଡ଼ନ୍ତି—ସେହି ସଙ୍କଟରେ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କୌଣସି ବଳବାନ ବ୍ୟକ୍ତି ଧର୍ମରକ୍ଷା ପାଇଁ ଦଣ୍ଡ ଧାରଣ କରି ପ୍ରଜାକୁ ଦସ୍ୟୁମାନଙ୍କ ହାତରୁ ଉଦ୍ଧାର କଲେ, ସେ କି ରାଜକାର୍ଯ୍ୟ କରିପାରିବ? ନା କି ତାକୁ ରୋକିବା ଉଚିତ?
युधिछिर उवाच