Śānti Parva, Adhyāya 52 — Bhīṣma’s Humility Before Kṛṣṇa and the Granting of Boons
“मेरा बल शरीरको छोड़ता-सा जान पड़ता है। ये प्राण निकलनेको उतावले हो रहे हैं। मेरे मर्मस्थानोंमें बड़ी पीड़ा हो रही है; अतः मेरा चित्त भ्रान्त हो गया है ।। दौर्बल्यात् सज्जते वाड़् मे स कथं वक्तुमुत्सहे । साधु मे त्वं प्रसीदस्व दाशार्हकुलवर्धन,“दुर्बलताके कारण मेरी जीभ तालूमें सट जाती है, ऐसी दशामें मैं कैसे बोल सकता हूँ? दशाहईकुलकी वृद्धि करनेवाले प्रभो! आप मुझपर पूर्णरूपसे प्रसन्न हो जाइये
durbalyāt sajjate vāg me sa kathaṃ vaktum utsahe | sādhu me tvaṃ prasīdasva dāśārha-kula-vardhana ||
ଦୁର୍ବଳତାରେ ମୋର ବାଣୀ ଅଟକିଯାଏ; ଜିଭ ଯେନେ ତାଳୁକୁ ଲାଗିଯାଏ। ଏମିତି ଅବସ୍ଥାରେ ମୁଁ କିପରି କଥା କହିବାକୁ ସାହସ କରିବି? ହେ ଦାଶାର୍ହକୁଳବର୍ଧନ, ମୋପରେ କୃପା କରି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅନ୍ତୁ।
वैशम्पायन उवाच