Atithi-satkāra and the Consolation of Wise Counsel (अतिथिसत्कारः प्रज्ञानवचनस्य च पराश्वासनम्)
क्षत्रमपि च ब्राह्मणप्रसादादेव शाश्वतीमव्ययां च पृथिवीं पत्नीमभिगम्य बुभूजे,क्षत्रिय जाति भी ब्राह्मणोंकी कृपासे ही सदा रहनेवाली इस अविनाशिनी पृथ्वीको पत्नीकी भाँति पाकर इसका उपभोग करती है
କ୍ଷତ୍ରିୟ ଜାତି ମଧ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପ୍ରସାଦରେ ହିଁ ଏହି ଶାଶ୍ୱତ ଓ ଅବ୍ୟୟ ପୃଥିବୀକୁ ପତ୍ନୀ ପରି ପାଇ ତାହାର ଉପଭୋଗ କରେ।
तामिन्द्र उवाच गच्छ नहुषस्त्वया वाच्योथ<पूर्वेण मामृषियुक्तेन यानेन त्वमधिरूढ