Atithi-satkāra and the Consolation of Wise Counsel (अतिथिसत्कारः प्रज्ञानवचनस्य च पराश्वासनम्)
कल्पयन्ति हि मां विप्रा अथर्वाणविदस्तथा । अथर्ववेदी ब्राह्मण मुझे ही कृत्याओं आभिचारिक प्रयोगोंसे सम्पन्न पंचकल्पात्मक “अथर्ववेद' मानते हैं ।। शाखाभेदाश्न ये केचिद् याश्व शाखासु गीतय:
ଅଥର୍ବବେଦଜ୍ଞ ବିପ୍ରମାନେ ମୋତେ ହିଁ—କୃତ୍ୟା, ଆଭିଚାରିକ ପ୍ରୟୋଗରେ ସମ୍ପନ୍ନ—ପଞ୍ଚକଳ୍ପାତ୍ମକ ‘ଅଥର୍ବ’ ବୋଲି ମାନନ୍ତି। ଏବଂ ଯେଯେ ଶାଖାଭେଦ ଅଛି, ଶାଖାମାନଙ୍କରେ ଯେଯେ ଗୀତି ଗାଯାଏ—(ସେସବୁ ମଧ୍ୟ ତାହିଁରେ ଗଣାଯାଏ)।
तामिन्द्र उवाच गच्छ नहुषस्त्वया वाच्योथ<पूर्वेण मामृषियुक्तेन यानेन त्वमधिरूढ