धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
एषोऊहं व्यक्तिमागत्य तिष्ठामि दिवि शाश्वत: । ततो युगसहस्रान्ते संहरिष्ये जगत् पुन:,“इस समय मैं सनातन परमात्मा ही व्यक्तरूप धारण करके आकाशमें स्थित हूँ। फिर एक सहखस् चतुर्युग व्यतीत होनेपर मैं ही इस जगत्का संहार करूँगा
eṣo ’haṁ vyaktim āgatya tiṣṭhāmi divi śāśvataḥ | tato yuga-sahasrānte saṁhariṣye jagat punaḥ ||
ଏହି ସମୟରେ ମୁଁ, ଶାଶ୍ୱତ ପରମାତ୍ମା, ବ୍ୟକ୍ତରୂପ ଧାରଣ କରି ଦିବ୍ୟ ଆକାଶରେ ଅବସ୍ଥିତ। ତାପରେ ସହସ୍ର ଯୁଗର ଅନ୍ତେ ମୁଁ ହିଁ ପୁନଃ ଏହି ଜଗତ୍କୁ ସଂହାର କରିବି।
भीष्म उवाच