अध्याय ३३१: नारायणकथा-प्रशंसा तथा नारदस्य श्वेतद्वीप-निवृत्ति एवं बदरी-आगमनम् | Chapter 331: Praise of the Nārāyaṇa Narrative; Nārada’s Return from Śvetadvīpa and Arrival at Badarī
मृतं वा यदि वा नष्ट यो5तीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थो प्रपद्यते,जो मनुष्य भूतकालमें मरे हुए किसी व्यक्तिके लिये अथवा नष्ट हुई किसी वस्तुके लिये निरन्तर शोक करता है, वह एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता है। इस प्रकार उसे दो अनर्थ भोगने पड़ते हैं
mṛtaṃ vā yadi vā naṣṭaṃ yo'tītam anuśocati | duḥkhena labhate duḥkhaṃ dvāv anarthau prapadyate ||
ଯେ ମଣିଷ ଅତୀତକୁ—ମରିଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି ପାଇଁ କିମ୍ବା ହରାଇଯାଇଥିବା ବସ୍ତୁ ପାଇଁ—ନିରନ୍ତର ଶୋକ କରେ, ସେ ଗୋଟିଏ ଦୁଃଖରୁ ଆଉ ଗୋଟିଏ ଦୁଃଖକୁ ପାଏ; ଏଭଳି ସେ ଦ୍ୱିଗୁଣ ଅନର୍ଥ ଭୋଗେ।
नारद उवाच