Śukasya Janma-yoga-phalaṁ — Vyāsasya Tapasā Putrārthaḥ (Śānti-parva 310)
एता: प्रकृतयस्त्वष्टी विकारानपि मे शृणु । श्रोत्रं त्वक्चैव चक्षुश्व जिद्दा प्राणं च पडचमम्,ये आठ प्रकृतियाँ कही गयीं। अब मुझसे विकारोंका भी वर्णन सुनो-श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्ठा, पाँचवीं नासिका, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वाणी, हाथ, पैर, लिंग और गुदा
ଏହି ଆଠଟି ପ୍ରକୃତି; ଏବେ ମୋ ପାଖରୁ ବିକାରମାନଙ୍କ ବର୍ଣ୍ଣନା ଶୁଣ—ଶ୍ରୋତ୍ର (କାନ), ତ୍ୱକ୍, ଚକ୍ଷୁ, ଜିହ୍ୱା ଏବଂ ପଞ୍ଚମ ଘ୍ରାଣ (ନାସିକା)।
याज़्ञवल्क्य उवाच