अध्याय २८६ — पराशर-उपदेशः
Ethical Restraint, Mortality, and Karma
सहस्रिणो5पि जीवन्ति जीवन्ति शतिनस्तथा । शाकेन चान्ये जीवन्ति पश्यास्मानपि जीवत:,जिनके पास हजारों रुपये हैं, वे भी जीते हैं। जिनके पास सैकड़ों रुपयोंका संग्रह है, वे भी जीवन धारण करते हैं। दूसरे लोग सागसे ही जीवन-निर्वाह करते हैं। उसी तरह हमें भी जीवित समझिये
sahasriṇo 'pi jīvanti jīvanti śatino tathā | śākena cānye jīvanti paśyāsmān api jīvataḥ ||
ହଜାର ଥିବା ଲୋକ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚନ୍ତି; ଶତ ଥିବା ଲୋକ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ବଞ୍ଚନ୍ତି। କେହି କେହି ଶାକପାତରେ ହିଁ ଜୀବନ ଚାଲାନ୍ତି—ସେହିପରି ଆମକୁ ମଧ୍ୟ ଜୀବିତ ଓ ସ୍ୱାବଲମ୍ବୀ ଭାବେ ଦେଖ।
समड़ उवाच