न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते । सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतान् परिवर्तते,कभी (तमोगुणकी अधिकतासे मोहाच्छन्न होनेपर) उसका न सुखसे संयोग होता है न दुःखसे (वह निद्रा और आलस्य आदिमें मग्न रहती है)। इस प्रकार यह भावात्मिका बुद्धि इन तीन भावोंका अनुसरण करती है
ସେ କେବେ ସୁଖରେ ନୁହେଁ, କେବେ ଦୁଃଖରେ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ଏହି ଭାବାତ୍ମିକ ବୁଦ୍ଧି ଏଇ ତିନି ଭାବ (ଗୁଣ) ମଧ୍ୟରେ ହିଁ ପରିଭ୍ରମଣ କରେ।
भीष्म उवाच