Adhyāya 283: Varṇa-vṛtti, Nyāya-ārjana, and the Decline-and-Restoration of Dharma (वर्णवृत्तिः न्यायार्जनं च)
आगतं पशुभर्तरं स्रष्टारं जगत: पतिम् | अध्वरे हााग्रभोक्तारं सर्वेषां पश्यत प्रभुम,“भगवान् शंकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेवाले, सम्पूर्ण जीवोंके रक्षक, स्वामी तथा सबके प्रभु हैं। तुम सब लोग देख लेना, वे इस यज्ञमें प्रधान भोक्ताके रूपमें उपस्थित होंगे!
ସମସ୍ତ ପଶୁ-ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ରକ୍ଷକ, ଜଗତର ସ୍ରଷ୍ଟା ଓ ପତି—ସେଇ ପ୍ରଭୁ ଆସିପହଞ୍ଚିଛନ୍ତି; ତୁମେ ସମସ୍ତେ ଦେଖ, ଏହି ଯଜ୍ଞରେ ସେଇ ମୁଖ୍ୟ ଭୋକ୍ତା ଭାବେ ଉପସ୍ଥିତ ହେବେ।
वैशम्पायन उवाच