Viṣṇor Māhātmya and Indriya-saṃyama (विष्णोर्माहात्म्यं तथा इन्द्रियसंयमः)
ऑपनआक्रात बछ। अं द्विसप्तत्याधिकद्विशततमो< ध्याय: यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा युधिछिर उवाच बहूनां यज्ञतपसामेकार्थानां पितामह । धर्मार्थ न सुखार्थार्थ कथं यज्ञ: समाहित:,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! यज्ञ और तप तो बहुत हैं और वे सब एकमात्र भगवत्प्रीतिके लिये किये जा सकते हैं; परंतु उनमेंसे जिस यज्ञका प्रयोजन केवल धर्म हो, स्वर्ग-सुख अथवा धनकी प्राप्ति न हो, उसका सम्पादन कैसे होता है?
yudhiṣṭhira uvāca | bahūnāṁ yajña-tapasām ekārthānāṁ pitāmaha | dharmārthaṁ na sukhārthārthaṁ kathaṁ yajñaḥ samāhitaḥ ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପିତାମହ! ଯଜ୍ଞ ଓ ତପ ବହୁ ପ୍ରକାର, ତଥାପି ସେମାନଙ୍କର ଏକ ଲକ୍ଷ୍ୟ—ଭଗବତ୍ପ୍ରୀତି—ହୋଇପାରେ। କିନ୍ତୁ ଯେ ଯଜ୍ଞର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କେବଳ ଧର୍ମ, ସ୍ୱର୍ଗସୁଖ କିମ୍ବା ଧନଲାଭ ନୁହେଁ, ସେ ଯଜ୍ଞ ଯଥାବିଧି କିପରି ସମ୍ପାଦିତ ହୁଏ?
युधिछिर उवाच