Adhyāya 270 — Yudhiṣṭhira’s inquiry on saṃnyāsa; Bhīṣma on calculable time, tamas, and karma
Vṛtra–Uśanā exemplum begins
ततः: प्रह्षष्टदनो भूय आरब्धवांस्तप: । भूयश्वाचिन्तयत् सिद्धो यत्परं सोडभिमन्यते,यह विचार आते ही उसका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उसने बड़े उत्साहके साथ पुनः तपस्या आरम्भ की। पुनः सिद्धि प्राप्त होनेपर उसने देखा कि वह मनमें जो-जो संकल्प करता है, वह अत्यन्त महान् होनेपर भी सामने प्रस्तुत हो जाता है। यह देखकर ब्राह्मणने पुनः यों विचार किया--
tataḥ prahṛṣṭa-dhano bhūya ārabdhavāṁs tapaḥ | bhūyaś cācintayat siddho yat-paraṁ so ’bhimanyate ||
ତେବେ ଧନ ପାଇ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ସେ ପୁନର୍ବାର ନୂତନ ଉତ୍ସାହରେ ତପସ୍ୟା ଆରମ୍ଭ କଲା। ପୁଣି ସିଦ୍ଧି ପ୍ରାପ୍ତ କରି ସେ ଦେଖିଲା—ମନରେ ଯେଉଁ ପରମ ସଙ୍କଳ୍ପ କରେ, ସେ ଯେତେ ମହାନ ହେଉ ନାହିଁ, ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଭାବେ ସାମ୍ନାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇଯାଏ। ଏହା ଦେଖି ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ପୁନର୍ବାର ଏପରି ଚିନ୍ତା କଲା।
भीष्म उवाच