कुण्डधारोपाख्यानम्
Kuṇḍadhāra-Upākhyāna: Dharma’s Superiority over Wealth and Desire
अहिंसादिकृतं कर्म इह चैव परत्र च | श्रद्धां निहन्ति वै ब्रह्मन् सा हता हन्ति त॑ नरम्,“अहिंसा और दया आदि भावोंसे प्रेरित होकर किया हुआ कर्म इहलोक और परलोकमें भी उत्तम फल देनेवाला है। ब्रह्म! यदि मनमें हिंसाकी भावना हो तो वह श्रद्धाका नाश कर देती है। फिर नष्ट हुई श्रद्धा कर्म करनेवाले इस हिंसक मनुष्यका ही सर्वनाश कर डालती है
ahiṃsādikṛtaṃ karma iha caiva paratra ca | śraddhāṃ nihanti vai brahman sā hatā hanti taṃ naram ||
ଅହିଂସା, ଦୟା ଆଦି ଭାବରୁ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ କରାଯାଇଥିବା କର୍ମ ଇହଲୋକ ଓ ପରଲୋକ—ଦୁହିଁଠାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଫଳ ଦେଇଥାଏ। କିନ୍ତୁ ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଯଦି ମନରେ ହିଂସାର ସଙ୍କଳ୍ପ ଥାଏ, ସେ ଶ୍ରଦ୍ଧାକୁ ନଶ୍ଟ କରେ; ଏବଂ ନଶ୍ଟ ହୋଇଥିବା ଶ୍ରଦ୍ଧା ପୁଣି ସେହି ହିଂସକ କର୍ତ୍ତାକୁ ହିଁ ପତନରେ ପକାଇଦିଏ।
भीष्म उवाच