योग–सांख्यसमन्वयः, रथोपमा, व्यक्त–अव्यक्तविवेकः
Yoga–Sāṃkhya Synthesis, Chariot Allegory, and the Vyakta–Avyakta Distinction
तावाप्लुत्य यतात्मानौ कृतजप्यौ समासत: । नद्या: पुलिनमासाद्य सूक्ष्मकाज्चनवालुकम्,फिर उन दोनोंने गंगाजीमें गोते लगाकर मनको एकाग्र करके संक्षेपसे गायत्रीजपका कार्य पूर्ण किया। इसके बाद सूक्ष्म सुवर्णमयी बालुकासे भरे हुए सुन्दर गंगातटपर आकर वे दोनों बैठ गये और पुण्यात्मा पुरुषों, देवर्षियों तथा महर्षियोंके मुखसे सुनी हुई कथाएँ कहने-सुनने लगे
tāv āplutya yatātmānau kṛtajapyau samāsataḥ | nadyāḥ pulinam āsādya sūkṣmakāñcanavālukam ||
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସେ ଦୁଇଜଣ ଗଙ୍ଗାରେ ଡୁବି ସ୍ନାନ କରି, ଆତ୍ମସଂୟମରେ ଥାଇ, ସଂକ୍ଷେପରେ ଜପ ସମାପ୍ତ କରି, ସୂକ୍ଷ୍ମ ସୁବର୍ଣ୍ଣାଭ ବାଲୁକା ଭରା ନଦୀତଟକୁ ଆସିଲେ। ସେଠାରେ ବସି ପୁଣ୍ୟାତ୍ମା, ଦେବର୍ଷି ଓ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ଶୁଣିଥିବା କଥାମାନେ କହିବା-ଶୁଣିବା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
भीष्म उवाच