Śrī–Indra–Bali Saṃvāda: The Departure and Fourfold Placement of Lakṣmī
स तेषां प्रेत्यभावे च प्रेत्यजातौ विनिश्षये । आगमस्थ: स भूयिष्ठमात्मतत्त्वे न तुष्यति,“इस शरीरको त्याग देनेके पश्चात् जीवकी सत्ता रहती है या नहीं, अथवा देह-त्यागके बाद उसका पुनर्जन्म होता है या नहीं", इस विषयमें उन आचार्योंका जो सुनिश्चित सिद्धान्त था, वे लोग आत्मतत्त्वके विषयमें जैसा विचार उपस्थित करते थे, उससे शास्त्रानुयायी राजा जनदेवको विशेष संतोष नहीं होता था
sa teṣāṃ pretyabhāve ca pretyajātau viniśṣaye | āgamasthaḥ sa bhūyiṣṭham ātmatattve na tuṣyati ||
ଶାସ୍ତ୍ରପ୍ରମାଣରେ ଅବସ୍ଥିତ ସେହି ଆଚାର୍ୟମାନେ ଦେହତ୍ୟାଗ ପରେ ଆତ୍ମାର ସତ୍ତା ରହେ କି ନାହିଁ ଏବଂ ଦେହ ଛାଡ଼ିଲା ପରେ ପୁନର୍ଜନ୍ମ ହୁଏ କି ନାହିଁ—ଏ ବିଷୟରେ ନିଶ୍ଚିତ ସିଦ୍ଧାନ୍ତକୁ ପହଞ୍ଚିଥିଲେ; ତଥାପି ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ୱ ବିଷୟରେ ତାଙ୍କର ପ୍ରତିପାଦନରୁ ରାଜା ଜନଦେବ ବିଶେଷ ସନ୍ତୋଷ ପାଇଲେ ନାହିଁ।
भीष्म उवाच