Śānti-parva 206: Guṇa-hetu Moha, Kāma-krodha Chain, Indriya-utpatti, and Nirodha
अनागतं सुकृतवतां परां गतिं स्वयम्भुवं प्रभवनिधानमव्ययम् । सनातन यदमृतमव्ययं ध्रुवं निचाय्य तत् परममृतत्वमश्षुते,जो कहींसे आया हुआ नहीं है, नित्य विद्यमान है, पुण्यवानोंकी परमगति है, स्वयम्भू (अजन्मा) है, सबकी उत्पत्ति और प्रलयका स्थान है, अविनाशी एवं सनातन है, अमृत, अविकारी एवं अचल है, उस परमात्माका ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य परममोक्षको प्राप्त कर लेता है
Bhīṣma uvāca: anāgataṃ sukṛtavatāṃ parāṃ gatiṃ svayambhuvaṃ prabhavanidhānam avyayam | sanātanaṃ yad amṛtam avyayaṃ dhruvaṃ nicāyya tat paramamṛtatvam aśnute ||
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସେ ପରମ ସତ୍ୟ କେଉଁଠୁ ଆସିଥିବା ନୁହେଁ, ନୂତନ ଉତ୍ପନ୍ନ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ; ସେ ନିତ୍ୟ ବିଦ୍ୟମାନ। ପୁଣ୍ୟବାନଙ୍କର ପରମଗତି; ସ୍ୱୟଂଭୂ (ଅଜନ୍ମା); ସମସ୍ତଙ୍କ ଉତ୍ପତ୍ତି ଓ ପ୍ରଳୟର ଆଶ୍ରୟ; ଅବ୍ୟୟ ଓ ସନାତନ—ଅମୃତ, ଅବିକାରୀ ଓ ଧ୍ରୁବ। ତାହାକୁ ନିଚାୟ୍ୟ ଜାଣିଲେ ମଣିଷ ପରମ ମୋକ୍ଷ, ମୃତ୍ୟୁତୀତ ଅବସ୍ଥା, ପାଏ।
भीष्म उवाच