अध्याय १७८ — प्राणवायुगतिः तथा शारीराग्निव्यवस्था
Adhyāya 178 — The courses of prāṇa-vāyu and the regulation of the bodily fire
मणी वोष्टस्य लम्बेते प्रियौ वत्सतरो मम । शुद्ध हि दैवमेवेदं हठेनैवास्ति पौरुषम्,'यह ऊँट मेरे बछड़ोंको उछाल-उछालकर विषम मार्गसे ही जा रहा है। काकतालीयन्यायसे- (अर्थात् दैवसंयोगसे) इन्हें गर्दनपर उठाकर बुरे मार्गसे ही दौड़ रहा है। इस ऊँटके गलेमें मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियोंके समान लटक रहे हैं। यह केवल दैवकी ही लीला है। हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थसे क्या होता है?
maṇī voṣṭasya lambe te priyau vatsatarau mama | śuddhaṃ hi daivam evedaṃ haṭhenaivāsti pauruṣam ||
ମୋର ଦୁଇ ପ୍ରିୟ ବଛଡ଼ା ଏହି ଉଠର ଗଳାରେ ଦୁଇ ମଣି ପରି ଲଟକୁଛି। ଏହା ନିଶ୍ଚୟ ଦୈବର ହିଁ କାର୍ଯ୍ୟ; କେବଳ ହଠରେ କରା ପୁରୁଷାର୍ଥ କ’ଣ କରିପାରିବ?
भीष्म उवाच