अव्यक्त-मानस-सृष्टिवादः
Doctrine of Creation from the Unmanifest ‘Mānasa’
सुखं निराश: स्वपिति नैराश्यं परमं सुखम् । आशामनाशां कृत्वा हि सुखं स्वपिति पिड़ला,वास्तवमें जिसे किसी प्रकारकी आशा नहीं है, वही सुखसे सोता है। आशाका न होना ही परम सुख है। देखो, आशाको निराशाके रूपमें परिणत करके पिड़ला सुखकी नींद सोने लगी
sukhaṁ nirāśaḥ svapiti nairāśyaṁ paramaṁ sukham | āśām anāśāṁ kṛtvā hi sukhaṁ svapiti piḍalā ||
ଯେ ନିରାଶ—ଅର୍ଥାତ୍ ଯାହାର କୌଣସି ଆଶା ନାହିଁ—ସେଇ ସୁଖରେ ଶୁଏ। ନୈରାଶ୍ୟ ହିଁ ପରମ ସୁଖ। ଆଶାକୁ ଅନାଶା କରି ପିଡ଼ଳା ସୁଖରେ ନିଦ୍ରା କରେ।
ब्राह्मण उवाच