अव्यक्त-मानस-सृष्टिवादः
Doctrine of Creation from the Unmanifest ‘Mānasa’
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्य॑ति जीर्यत: । योडसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजत: सुखम्,खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो मनुष्यके जीर्ण (वृद्ध) हो जानेपर भी स्वयं कभी जीर्ण नहीं होती, तथा जो प्राणोंके साथ जानेवाला रोग बनकर रहती है, उस तृष्णाको जो त्याग देता है, उसीको सुख मिलता है
yā dustyajā durmatibhir yā na jīryati jīryataḥ | yo ’sau prāṇāntiko rogās tāṃ tṛṣṇāṃ tyajataḥ sukham ||
ଯେ ତୃଷ୍ଣା ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧିମାନଙ୍କ ପାଇଁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଦୁଷ୍କର, ମଣିଷ ଜୀର୍ଣ୍ଣ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଯାହା ନିଜେ ଜୀର୍ଣ୍ଣ ହୁଏ ନାହିଁ, ଏବଂ ପ୍ରାଣାନ୍ତ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ରୋଗ ପରି ଲାଗି ରହେ—ସେଇ ତୃଷ୍ଣାକୁ ଯେ ତ୍ୟାଗ କରେ, ସେଇ ନିଜେ ସୁଖ ପାଏ।
ब्राह्मण उवाच