Tapas as the Root of Attainment (तपः—साधनमूलप्रशंसा)
आत्मनो बलमास्थाय कथं वर्तेत मानव: । आगच्छतो>तिक्रुद्धस्य तस्योद्धरणकाम्यया,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो बलवान, नित्य निकटवर्ती, उपकार और अपकार करनेमें समर्थ तथा नित्य उद्योगशील है, ऐसे शत्रुके साथ यदि कोई अल्प बलवान, असार एवं सभी बातोंमें छोटी हैसियत रखनेवाला मनुष्य मोहवश शेखी बघारते हुए अयोग्य बातें कहकर वैर बाँध ले और वह बलवान शत्रु अत्यन्त कुपित हो उस दुर्बल मनुष्यको उखाड़ फेंकनेके लिये आक्रमण कर दे, तब वह आक्रान्त मनुष्य अपने ही बलका भरोसा करके उस आक्रमणकारीके साथ कैसा बर्ताव करे? (जिससे उसकी रक्षा हो सके)
ātmano balam āsthāya kathaṁ varteta mānavaḥ | āgacchato 'tikruddhasya tasyoddharaṇakāmyayā ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପଚାରିଲେ—ପିତାମହ! ନିଜ ବଳକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ମଣିଷ କିପରି ବ୍ୟବହାର କରିବ, ଯେତେବେଳେ ତାକୁ ଉପାଡ଼ି ଫେଙ୍କିବା ଇଚ୍ଛାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୁଦ୍ଧ ବଳବାନ ଶତ୍ରୁ ତାଙ୍କ ଦିଗକୁ ଆଗେଇ ଆସୁଛି? କେଉଁ ଆଚରଣ ତାକୁ ରକ୍ଷା କରିପାରିବ?
युधिछिर उवाच