Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
श्षपच उवाच अस्थानतो हीनत: कुत्सिताद् वा तद् विद्वांसं बाधते साधुवृत्तम् । श्वानं पुनर्यो लभते5भिषज्भात् तेनापि दण्ड: सहितव्य एव,चाण्डालने कहा--जो अयोग्य स्थानसे, अनुचित कर्मसे तथा निन्दित पुरुषसे कोई निषिद्ध वस्तु लेना चाहता है, उस विद्वानको उसका सदाचार ही वैसा करनेसे रोकता है (अत: आपको तो ज्ञानी और धर्मात्मा होनेके कारण स्वयं ही ऐसे निन्द्य कर्मसे दूर रहना चाहिये); परंतु जो बारंबार अत्यन्त आग्रह करके कुत्तेका मांस ग्रहण कर रहा है, उसीको इसका दण्ड भी सहन करना चाहिये (मेरा इसमें कोई दोष नहीं है)
śvapaca uvāca | asthānato hīnataḥ kutsitād vā tad vidvāṁsaṁ bādhate sādhuvṛttam | śvānaṁ punar yo labhate 'bhiṣajbhāt tenāpi daṇḍaḥ sahitavya eva ||
ଶ୍ୱପଚ କହିଲା—ଅଯୋଗ୍ୟ ସ୍ଥାନରୁ, ହୀନ ଉପାୟରୁ କିମ୍ବା ନିନ୍ଦିତ ପୁରୁଷଠାରୁ ନିଷିଦ୍ଧ ବସ୍ତୁ ନେବାକୁ ଚାହିଲେ ମଧ୍ୟ, ବିଦ୍ୱାନକୁ ତାଙ୍କର ସଦାଚାର ହିଁ ବାଧା ଦିଏ। କିନ୍ତୁ ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ପୁନଃପୁନଃ ଅତ୍ୟଧିକ ଆଗ୍ରହରେ—ବୈଦ୍ୟଙ୍କ ହାତରୁ ମଧ୍ୟ—କୁକୁର ମାଂସ ଗ୍ରହଣ କରେ, ଦଣ୍ଡ ତାହାକୁ ହିଁ ସହିବାକୁ ପଡ଼ିବ; ଏଥିରେ ମୋର କୌଣସି ଦୋଷ ନାହିଁ।
श्षपच उवाच