Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
श्षपच उवाच काम नरा जीवितं संत्यजन्ति न चाभक्ष्ये क्वचित् कुर्वन्ति बुद्धिम् । सर्वान् कामानू प्राप्तुवन्तीह विद्वन् प्रियस्व काम॑ सहित: क्षुधैव,चाण्डालने कहा--विद्वन्! अच्छे पुरुष अपने प्राणोंका परित्याग भले ही कर दें, परंतु वे कभी अभक्ष्य-भक्षणका विचार नहीं करते हैं। इसीसे वे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं; अत: आप भी भूखके साथ ही--उपवासद्दवारा ही अपनी मन:ःकामनाकी पूर्ति कीजिये
śvapaca uvāca: kāma narā jīvitaṃ saṃtyajanti na cābhakṣye kvacit kurvanti buddhim | sarvān kāmān prāpnuvantīha vidvan priyasva kāma-sahitaḥ kṣudhaiva ||
ଶ୍ୱପଚ କହିଲା— ହେ ବିଦ୍ୱାନ! କାମନା ପାଇଁ ଲୋକେ ପ୍ରାଣ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ଅଭକ୍ଷ୍ୟ ଭୋଜନ କରିବାକୁ କେବେ ମନ ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ। ସେହି ସଂଯମରେ ଏଠି ସମସ୍ତ ଇଚ୍ଛା ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ। ତେଣୁ, ହେ ଜ୍ଞାନୀ, ଭୁଖକୁ ହିଁ ସହ—ଉପବାସ ଦ୍ୱାରା ମନୋକାମନା ପୂରଣ କର; ଅପବିତ୍ର ଆହାରକୁ ଆଶ୍ରୟ କରନି।
श्षपच उवाच