Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
घपच उवाच नैतत् खादन प्राप्तुते दीर्घमायु- नैंव प्राणान्नामृतस्थेव तृप्ति: । भिक्षामन्यां भिक्ष मा ते मनोस्तु श्वभक्षणे श्वा हाभक्ष्यो द्विजानाम्,चाण्डालने कहा--मुने! इसे खाकर कोई बहुत बड़ी आयु नहीं प्राप्त कर सकता। न तो इससे प्राणशक्ति प्राप्त होती है और न अमृतके समान तृप्ति ही होती है; अत: आप कोई दूसरी भिक्षा माँगिये। कुत्तेका मांस खानेकी ओर आपका मन नहीं जाना चाहिये। कुत्ता द्विजोंके लिये अभक्ष्य है
ghapaca uvāca | naitat khādan prāptute dīrgham āyuḥ naiva prāṇān nāmṛtas-theva tṛptiḥ | bhikṣām anyāṃ bhikṣa mā te manas tu śvabhakṣaṇe śvā hy abhakṣyo dvijānām |
ଘପଚ କହିଲା—ଏହା ଖାଇଲେ ଦୀର୍ଘାୟୁ ମିଳେ ନାହିଁ। ନ ଏଥିରୁ ପ୍ରାଣବଳ ମିଳେ, ନ ଅମୃତସଦୃଶ ତୃପ୍ତି ହୁଏ। ତେଣୁ ଅନ୍ୟ ଭିକ୍ଷା ମାଗନ୍ତୁ; କୁକୁର ମାଂସ ଭକ୍ଷଣ ପ୍ରତି ଆପଣଙ୍କ ମନ ଯାଉ ନାହିଁ। କୁକୁର ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅଭକ୍ଷ୍ୟ।
घपच उवाच