Draupadī’s Exhortation on Rājadharma and Daṇḍa (द्रौपद्याः राजधर्मोपदेशः)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं) अपन ह< बक। ] अति: चतुर्दशो 5 ध्याय: द्रोपदीका युधिष्ठिरको राजदण्डधारणपूर्वक पृथ्वीका शासन करनेके लिये प्रेरित करना वैशम्पायन उवाच अव्याहरति कौन्तेये धर्मराजे युधिष्ठिरे । भ्रातृणां ब्रुवतां तांस्तान् विविधान् वेदनिश्चयान्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! अपने भाइयोंके मुखसे नाना प्रकारके वेदोंके सिद्धान्तोंको सुनकर भी जब कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर कुछ नहीं बोले, तब महान् कुलमें उत्पन्न हुई, युवतियोंमें श्रेष्ठ, स्थूल, नितम्ब और विशाल नेत्रोंवाली, पतियों एवं विशेषत: राजा युधिष्ठिरके प्रति अभिमान रखनेवाली, राजाकी सदा ही लाड़िली, धर्मपर दृष्टि रखनेवाली तथा धर्मको जाननेवाली श्रीमती महारानी द्रौपदी हाथियोंसे घिरे हुए यूथपति गजराजकी भाँति सिंहशार्दूल-सदृश पराक्रमी भाइयोंसे घिरकर बैठे हुए पतिदेव नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरकी ओर देखकर उन्हें सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण परम मधुर वाणीमें इस प्रकार बोलीं
vaiśampāyana uvāca | avyāharati kaunteye dharmarāje yudhiṣṭhire | bhrātṝṇāṁ bruvatāṁ tāṁs tān vividhān vedaniścayān ||
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ! ଭାଇମାନେ ବେଦସମ୍ମତ ନାନାପ୍ରକାର ନିଷ୍କର୍ଷ ଓ ନିର୍ଣ୍ଣୟ କହୁଥିବାକୁ ଶୁଣିଲେ ମଧ୍ୟ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କିଛି କହିଲେ ନାହିଁ।
वैशम्पायन उवाच