Satya–Anṛta Viveka (Discrimination between Truth and Falsehood) | सत्य–अनृत विवेकः
ऑपन-माज बक। अऑसि्छऋाय-ज नवाधिकशततमो<्ध्याय: सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन युधिछिर उवाच कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् नरो वर्तेत भारत । विद्वन् जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ,युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! धर्ममें स्थित रहनेकी इच्छावाला मनुष्य कैसा बर्ताव करे? विद्वन्! मैं इस बातको जानना चाहता हूँ। भरतश्रेष्ठी आप मुझसे इसका वर्णन कीजिये
Yudhiṣṭhira uvāca | kathaṁ dharme sthātum icchan naro varteta bhārata | vidvan jijñāsamānāya prabrūhi bharatarṣabha ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଧର୍ମରେ ଅବସ୍ଥିତ ରହିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବା ମଣିଷ କିପରି ଆଚରଣ କରିବ? ହେ ବିଦ୍ୱାନ! ମୁଁ ଏହା ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୋତେ ଏହା ବର୍ଣ୍ଣନା କରନ୍ତୁ।
युधिछिर उवाच