शकुनि (हिरण्मय-पक्षी) उपदेशः — Vighasāśin and the Difficulty of Gārhasthya
शकुनिरुवाच यदि मां नाभिशंकध्वं विभज्यात्मानमात्मना | ततोऊहं व: प्रवक्ष्यामि याथातथ्यं हितं॑ वच:,पक्षीने कहा--यदि आपलोग मुझपर संदेह न करें तो मैं स्वयं ही अपने आपको वक्ताके रूपमें विभक्त करके आपलोगोंको यथावत्रूपसे हितकी बात बताऊँगा
śakunir uvāca yadi māṁ nābhiśaṅkadhvaṁ vibhajyātmānam ātmanā | tato ’haṁ vaḥ pravakṣyāmi yāthātathyaṁ hitaṁ vacaḥ ||
ଶକୁନି କହିଲା—ଯଦି ତୁମେ ମୋତେ ସନ୍ଦେହ କରିବ ନାହିଁ, ତେବେ ମୁଁ ନିଜ ମଧ୍ୟରେ ନିଜକୁ (ବକ୍ତାରୂପେ) ବିଭକ୍ତ କରି, ତୁମକୁ ଯଥାର୍ଥ ଓ ହିତକର ବଚନ କହିବି।
अजुन उवाच