Vṛddha-kanyā-carita and Balarāma’s Kurukṣetra Inquiry (वृद्धकन्या-चरितम् / कुरुक्षेत्रफल-प्रश्नः)
ब्रह्मर्षे तव पुत्रो5यं त्वद्धक्त्या धारितो मया । दृष्टवा ते5प्सरसं रेतो यत् स्कन्न॑ प्रागलम्बुषाम्,प्रतिगृह्लीष्व पुत्र स््व॑ मया दत्तमनिन्दितम् | “ब्रह्मर्ष! यह आपका पुत्र है। इसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण किया था। ब्रह्मर्ष] पहले अलम्बुषा नामक अप्सराको देखकर जो आपका वीर्य स्खलित हुआ था, उसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण कर लिया था; क्योंकि मेरे मनमें यह विचार हुआ था कि आपका यह तेज नष्ट न होने पावे। अत: आप मेरे दिये हुए अपने इस अनिन्दनीय पुत्रको ग्रहण कीजिये”
brahmarṣe tava putro 'yaṁ tvadbhaktyā dhārito mayā | dṛṣṭvā te 'psarasaṁ reto yat skannaṁ prāgalambuṣām, pratigṛhṇīṣva putra svaṁ mayā dattam aninditam ||
“ହେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷେ, ଏହା ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ର। ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରତି ଭକ୍ତିରୁ ମୁଁ ଏହାକୁ ଗର୍ଭରେ ଧାରଣ କରିଥିଲି। ପୂର୍ବେ ଅଲମ୍ବୁଷା ନାମକ ଅପ୍ସରାକୁ ଦେଖି ଆପଣଙ୍କ ଯେ ବୀର୍ୟ ସ୍ଖଲିତ ହୋଇଥିଲା, ଆପଣଙ୍କ ତେଜ ନଷ୍ଟ ନ ହେଉ ବୋଲି ଭାବି, ମୁଁ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲି। ତେଣୁ ମୋ ଦ୍ୱାରା ଦିଆଯାଇଥିବା ଏହି ଅନିନ୍ଦ୍ୟ ନିଜ ପୁତ୍ରକୁ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ।”
वैशम्पायन उवाच