Sarasvatī-Śāpavimokṣa, Rākṣasa-Mokṣa, and Aruṇā-Tīrtha
Indra–Namuci Expiation
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ४० $ “लोक हैं।) द्विचत्वारिशोड ध्याय: वसिष्छठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता जनमेजय उवाच वसिष्ठस्यापवाहो5सौ भीमवेग: कथं नु सः । किमर्थ च सरिच्छोष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत्
ଜନମେଜୟ କହିଲେ—ପ୍ରଭୋ! ବସିଷ୍ଠାପବାହ ତୀର୍ଥରେ ସେଇ ଭୟଙ୍କର ବେଗ କିପରି ହେଲା? ଏବଂ ସରିତାମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠା ସରସ୍ୱତୀ କେଉଁ କାରଣରୁ ସେଇ ମହର୍ଷିଙ୍କୁ ବହାଇନେଲେ?
जनमेजय उवाच