Sauptika Parva, Adhyaya 8 — Dhṛṣṭadyumna-vadha and the Camp’s Nocturnal Rout
वसाश्रैवापरे पीत्वा पर्यधावन् विकुक्षिका: । नानावक्त्रास्तथा रौद्रा: क्रव्यादा: पिशिताशना:,दूसरे कुक्षिरहित राक्षस चर्बियोंका पान करके चारों ओर दौड़ लगा रहे थे। कच्चा मांस खानेवाले उन भयंकर राक्षसोंके अनेक मुख थे
vasāś caivāpare pītvā paryadhāvan vikuṣikāḥ | nānāvaktrās tathā raudrāḥ kravyādāḥ piśitāśanāḥ ||
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଅନ୍ୟେ ବିକୃତ, କୁକ୍ଷିହୀନ ରାକ୍ଷସମାନେ ଚର୍ବି ପିଇ ସବୁ ଦିଗକୁ ଦୌଡ଼ୁଥିଲେ। ସେମାନେ ଅନେକମୁଖୀ, ରୌଦ୍ର, କ୍ରବ୍ୟାଦ ଓ କଚ୍ଚା ମାଂସ ଭକ୍ଷକ ଥିଲେ।
संजय उवाच