अध्याय १ — न्यग्रोधवनोपवेशनम् तथा द्रौणिनिश्चयः
Night at the Banyan and Drauṇi’s Resolve
भवतोस्तु यदि प्रज्ञा न मोहादपनीयते । व्यापन्नेडस्मिन् महत्यर्थ यन्नः श्रेयस्तदुच्यताम्,“यदि आप दोनोंकी बुद्धि मोहसे नष्ट न हो गयी हो तो इस महान् संकटके समय अपने बिगड़े हुए कार्यको बनानेके उद्देश्यसे हमारे लिये क्या करना श्रेष्ठ होगा? यह बताइये”
bhavatoḥ tu yadi prajñā na mohād apanīyate | vyāpanne 'smin mahaty arthe yan naḥ śreyas tad ucyatām ||
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯଦି ଆପଣମାନଙ୍କ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ପ୍ରଜ୍ଞା ମୋହରେ ଅପହୃତ ହୋଇନଥାଏ, ତେବେ ଏହି ମହାସଙ୍କଟରେ—ଯେତେବେଳେ ଆମ କାର୍ଯ୍ୟ ବିଗଡ଼ିଗଲା—ଆମ ପାଇଁ କ’ଣ ଶ୍ରେୟସ୍କର, ତାହା କହନ୍ତୁ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ଆମର ବିଗଡ଼ିଥିବା କାର୍ଯ୍ୟ ସୁଧାରିପାରିବ।
संजय उवाच