
Chapter Arc: द्यूत-अपमान के बाद सभा में धृतराष्ट्र के भीतर अपराध-बोध और पुत्र-स्नेह का द्वंद्व उभरता है; विदुर की पुरानी चेतावनी—दुर्योधन ‘कुलपांसन’ है—फिर से स्मरण कराई जाती है। → विदुर जन्म-क्षण के अपशकुन (गोमायु-ध्वनि) और दुर्योधन के स्वभाव को कुल-विनाश का कारण बताकर धृतराष्ट्र को कठोर निर्णय लेने को उकसाते हैं; धृतराष्ट्र स्वीकारते हैं कि वे भीतर उठती ‘कुलान्त’ की कामना/प्रवृत्ति को रोक नहीं पा रहे। → धृतराष्ट्र गान्धारी से कहते हैं कि वे इस विनाश-प्रवृत्ति को निवार नहीं कर सकते; गान्धारी के वाक्य/प्रभाव के बीच धृतराष्ट्र का निर्णय निर्णायक मोड़ लेता है। → धृतराष्ट्र आदेश देते हैं—पाण्डवों को लौटाया जाए; और ‘मामक’ पाण्डवों के साथ पुनः द्यूत करें—यानी क्षमा/प्रत्यावर्तन के साथ ही फिर उसी विनाशकारी खेल की पुनरावृत्ति। → पाण्डवों की वापसी के साथ ही ‘पुनर्द्यूत’ की घोषणा—अगला द्यूत किसे किस गर्त में गिराएगा?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्टिरप्रत्यानयनविषयक चौद्त्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७४ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६७३ श्लोक मिलाकर कुल ९४ ३ “लोक हैं।] न२््स्स्््ताि्य्सि (9) ४: पञ्चसप्ततितमोब ध्याय: गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना वैशम्पायन उवाच अथाब्रवीन्महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् | पुत्रहार्दाद् धर्मयुक्ता गान्धारी शोककर्षिता,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! उस समय भावी अनिष्टकी आशंकासे धर्मपरायणा गान्धारी पुत्र-स्नेहहश शोकसे कातर हो उठी और राजा धुृतराष्ट्रसे इस प्रकार बोली--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଧର୍ମନିଷ୍ଠା ଗାନ୍ଧାରୀ ପୁତ୍ରସ୍ନେହଜନିତ ଶୋକରେ କାତର ହୋଇ, ଜନେଶ୍ୱର ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଏହିପରି କହିଲେ।
Verse 2
जाते दुर्योधने क्षत्ता महामतिरभाषत । नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसन:,“आर्यपुत्र! दुर्योधनके जन्म लेनेपर परम बुद्धिमान् विदुरजीने कहा था--यह बालक अपने कुलका नाश करनेवाला होगा; अतः इसे त्याग देना चाहिये
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଜନ୍ମ ନେବା ସହିତ ମହାମତି କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁର କହିଲେ—“ଏହି ଶିଶୁ ପରଲୋକକୁ ପଠାଇବାଯୋଗ୍ୟ; ଏ କୁଳର କଳଙ୍କ। ତେଣୁ ଏହାକୁ ତ୍ୟାଗ କର।”
Verse 3
व्यनदज्जातमात्रो हि गोमायुरिव भारत । अन्तो नूनं कुलस्यास्य कुरवस्तन्निबोधत,“भारत! इसने जन्म लेते ही गीदड़की भाँति 'हुँआ-हुँआ” का शब्द किया था; अत: यह अवश्य ही इस कुलका अन्त करनेवाला होगा। कौरवो! आपलोग भी इस बातको अच्छी तरह समझ लें
ହେ ଭାରତ! ଜନ୍ମମାତ୍ରେ ସେ ଗୋମାୟୁ (ଗିଦଡ଼) ପରି ଚିତ୍କାର କଲା; ନିଶ୍ଚୟ ଏହି ଜଣେ ଏ କୁଳର ଅନ୍ତ କରିବ। ହେ କୁରୁମାନେ, ଏ କଥା ଭଲଭାବେ ବୁଝ।
Verse 4
मा निमज्जी: स्वदोषेण महाप्सु त्वं हि भारत | मा बालानामशिष्टानामभिमंस्था मतिं प्रभो,'भरतकुलतिलक! आप अपने ही दोषसे इस कुलको विपत्तिके महासागरमें न डुबाइये। प्रभो! इन उद्दण्ड बालकोंकी हाँ-में-हाँ न मिलाइये
ହେ ଭାରତ! ନିଜ ଦୋଷରେ ଏ କୁଳକୁ ବିପତ୍ତିର ମହାଜଳରେ ଡୁବାଇ ଦିଅନି। ହେ ପ୍ରଭୁ! ଅଶିଷ୍ଟ ଉଦ୍ଦଣ୍ଡ ବାଳକମାନଙ୍କ ହାଁ-ରେ ହାଁ ମିଶାଇ ନିଜ ବୁଦ୍ଧିକୁ ଅସ୍ଥିର କରନି।
Verse 5
मा कुलस्य क्षये घोरे कारणं त्वं भविष्यसि । बद्धं सेतुं को नु भिन्द्याद् धमेच्छान्तं च पावकम्,“इस कुलके भयंकर विनाशमें स्वयं ही कारण न बनिये। भरतश्रेष्ठ! बँधे हुए पुलको कौन तोड़ेगा? बुझी हुई वैरकी आगको फिर कौन भड़कायेगा? कुन्तीके शान्तिपरायण पुत्रोंकी फिर कुपित करनेका साहस कौन करेगा? अजमीढकुलके रत्न! आप सब कुछ जानते और याद रखते हैं, तो भी मैं पुन आपको स्मरण दिलाती रहूँगी
ଏ କୁଳର ଘୋର କ୍ଷୟର କାରଣ ତୁମେ ନିଜେ ହେଉନି। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ବାନ୍ଧା ହୋଇଥିବା ସେତୁକୁ କିଏ ଭାଙ୍ଗିବ? ନିଭିଯାଇଥିବା ଅଗ୍ନିକୁ କିଏ ପୁଣି ଜ୍ୱଳାଇବ?
Verse 6
शमे स्थितान् को नु पार्थान् कोपयेद् भरतर्षभ | स्मरन्तं त्वामाजमीढ स्मारयिष्याम्यहं पुन:,“इस कुलके भयंकर विनाशमें स्वयं ही कारण न बनिये। भरतश्रेष्ठ! बँधे हुए पुलको कौन तोड़ेगा? बुझी हुई वैरकी आगको फिर कौन भड़कायेगा? कुन्तीके शान्तिपरायण पुत्रोंकी फिर कुपित करनेका साहस कौन करेगा? अजमीढकुलके रत्न! आप सब कुछ जानते और याद रखते हैं, तो भी मैं पुन आपको स्मरण दिलाती रहूँगी
ହେ ଭରତର୍ଷଭ! ଶମରେ ଅବସ୍ଥିତ ପାର୍ଥମାନଙ୍କୁ କିଏ କ୍ରୋଧିତ କରିବ? ହେ ଅଜମୀଢବଂଶଜ! ତୁମେ ସବୁ ସ୍ମରଣ କରୁଛ; ତଥାପି ମୁଁ ପୁଣି ତୁମକୁ ସ୍ମରଣ କରାଇବି।
Verse 7
शास्त्र न शास्ति दुर्बुद्धिं श्रेयसे चेतराय च | न वै वृद्धो बालमतिर्भवेद् राजन् कथंचन,“राजन! जिसकी बुद्धि खोटी है, उसे शास्त्र भी भला-बुरा कुछ नहीं सिखा सकता। मन्दबुद्धि बालक वृद्धों-जैसा विवेकशील किसी प्रकार नहीं हो सकता
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ଯାହାର ବୁଦ୍ଧି ଦୁଷ୍ଟ, ତାକୁ ଶାସ୍ତ୍ର ନ ଶ୍ରେୟସ୍ ପଥେ ନେଇପାରେ, ନ ଅନର୍ଥରୁ ରୋକିପାରେ। ବାଳବୁଦ୍ଧି ମନୁଷ୍ୟ କେବେ ମଧ୍ୟ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ପରି ବିବେକୀ ହୋଇପାରେ ନାହିଁ।
Verse 8
त्वन्नेत्रा: सन्तु ते पुत्रा मा त्वां दीर्णा: प्रहासिषु: । तस्मादयं मद्गचनात् त्यज्यतां कुलपांसन:,“आपके पुत्र आपके ही नियमन्त्रणमें रहें, ऐसी चेष्टा कीजिये। ऐसा न हो कि वे सभी मर्यादाका त्याग करके प्राणोंसे हाथ धो बैठें और आपको इस बुढ़ापेमें छोड़कर चल बसें। इसलिये आप मेरी बात मानकर इस कुलांगार दुर्योधनको त्याग दें
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତୁମ ପୁଅମାନେ ତୁମ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ ଓ ପଥପ୍ରଦର୍ଶନରେ ରୁହନ୍ତୁ; ଏମିତି ନ ହେଉ ଯେ ସେମାନେ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଭଙ୍ଗ କରି ନାଶକୁ ପହଞ୍ଚନ୍ତି ଏବଂ ବୃଦ୍ଧାବସ୍ଥାରେ ତୁମକୁ ଛାଡ଼ି ଯାଆନ୍ତି। ତେଣୁ ମୋ କଥା ମାନି ଏହି କୁଳକଳଙ୍କ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ତ୍ୟାଗ କର।
Verse 9
तथा ते न कृतं राजन पुत्रस्नेहान्नराधिप । तस्य प्राप्तं फलं विद्धि कुलान्तकरणाय यत्,“महाराज! आपको जो करना चाहिये था, वह आपने पुत्रस्नेहवश नहीं किया। अतः समझ लीजिये, उसीका यह फल प्राप्त हुआ है, जो समूचे कुलके विनाशका कारण होने जा रहा है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ନରାଧିପ! ପୁତ୍ରସ୍ନେହରୁ ତୁମେ ଯାହା କରିବା ଉଚିତ୍ ଥିଲା, ତାହା କରିଲ ନାହିଁ। ଜାଣ, ଆଜି ଯେ ଫଳ ତୁମେ ପାଇଛ, ସେହି ଅବହେଳାର ଫଳ—ଏବଂ ଏହା ସମଗ୍ର କୁଳନାଶ ଦିଗକୁ ଯାଉଛି।
Verse 10
शमेन धर्मेण नयेन युक्ता या ते बुद्धि: सास्तु ते मा प्रमादी: । प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्री- मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान्,'शान्ति, धर्म तथा उत्तम नीतिसे युक्त जो आपकी बुद्धि थी, वह बनी रहे। आप प्रमाद मत कीजिये। क्रूरतापूर्ण कर्मोंसे प्राप्त की हुई लक्ष्मी विनाशशील होती है और कोमलतापूर्ण बर्तावसे बढ़ी हुई धन-सम्पत्ति पुत्र-पौत्रोंतक चली जाती है'
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶମ, ଧର୍ମ ଓ ସୁନୀତିରେ ଯୁକ୍ତ ତୁମ ବୁଦ୍ଧି ଦୃଢ଼ ରହୁ; ତୁମେ ପ୍ରମାଦ କରନି। କ୍ରୂର କର୍ମରେ ଲାଭିତ ଶ୍ରୀ ଧ୍ୱଂସଶୀଳ; କିନ୍ତୁ ମୃଦୁ ତଥା ଦୃଢ଼ ଆଚରଣରେ ପୋଷିତ ସମ୍ପଦ ପୁତ୍ର-ପୌତ୍ର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଯାଏ।
Verse 11
अथाब्रवीन्महाराजो गान्धारीं धर्मदर्शिनीम् । अन्त: काम॑ कुलस्यास्तु न शक्नोमि निवारितुम्,तब महाराज धूृतराष्ट्रने धर्मपर दृष्टि रखनेवाली गान्धारीसे कहा--“देवि! इस कुलका अन्त भले ही हो जाय, परंतु मैं दुर्योधनको रोक नहीं सकता
ତାପରେ ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଧର୍ମଦର୍ଶିନୀ ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଦେବି! ଏହି କୁଳର ଅନ୍ତ ହେଉ ଯଦି ହେଉ; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ନିବାରି ପାରୁନି।”
Verse 12
यथेच्छन्ति तथैवास्तु प्रत्यागच्छन्तु पाण्डवा: । पुनर्द्यूतं च कुर्वन्तु मामका: पाण्डवै: सह,“ये सब जैसा चाहते हैं, वैसा ही हो। पाण्डव लौट आयें और मेरे पुत्र उनके साथ फिर जूआ खेलें”
ସେମାନେ ଯେପରି ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେପରି ହେଉ। ପାଣ୍ଡବମାନେ ପୁନଃ ଫେରିଆସୁନ୍ତୁ, ଏବଂ ମୋ ପୁଅମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହିତ ପୁନର୍ବାର ପାଶା ଖେଳୁନ୍ତୁ।
Verse 75
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि गान्धारीवाक्ये पञ्चसप्ततितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଗାନ୍ଧାରୀବାକ୍ୟ-ପ୍ରସଙ୍ଗର ପଞ୍ଚସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।