Adhyaya 64
Sabha ParvaAdhyaya 6422 Verses

Adhyaya 64

अध्याय ६४ — सभामध्ये क्रोध-निवारणम् (Restraint of wrath in the royal assembly)

Upa-parva: Dyūta Parva (Dice-Match Episode within Sabhā Parva)

The chapter presents a sequence of courtly reactions following severe provocation. Karṇa opens by framing the situation as unprecedented conduct among women renowned for beauty, implying normative shock. In contrast, Draupadī (Kṛṣṇā, Pāñcālī) is described as a source of śānti for the Pāṇḍavas—metaphorically a boat carrying those sinking in unfordable waters, emphasizing stabilizing counsel amid institutional crisis. Vaiśaṃpāyana then narrates Bhīma’s intense indignation in the Kuru assembly and introduces a maxim attributed to Devala: a man’s three ‘lights’—offspring, action, and knowledge—persist beyond the body, linking personal injury to generational and reputational continuity. A question is raised about how lineage can arise if marital honor is violated, foregrounding anxiety about social order. Arjuna responds with a normative statement on noble speech: the eminent do not trade in harsh words; the virtuous remember merit rather than enmity, implying strategic restraint and moral self-verification. Bhīma, however, urges immediate elimination of assembled adversaries and offers sovereignty to Yudhiṣṭhira, escalating the rhetoric of retaliation. The narration intensifies Bhīma’s embodied rage through imagery of heat, smoke, sparks, and an apocalyptic countenance. Finally, Yudhiṣṭhira physically restrains Bhīma and approaches Dhṛtarāṣṭra with folded hands, reasserting procedural containment and hierarchical petition as the chosen mode of action within sabhā-dharma.

Chapter Arc: सभामण्डप में दुर्योधन का अहंकार उफनता है—वह विदुर पर ‘पराये यश’ की श्लाघा करने और अपने ही कुल के विरुद्ध झुकने का आरोप लगाकर कटु वाणी से आक्रमण करता है। → दुर्योधन विदुर को ‘पोषक का उपहास करने वाले’ और ‘भर्तृघ्न’ के समान बताकर उनकी निष्ठा पर प्रहार करता है; वह मित्रता और हितवचन को भी शत्रुता मानकर विदुर को दरबार से हट जाने का आदेश देता है। → विदुर प्रत्युत्तर में राजधर्म का कठोर सत्य रखते हैं—राजाओं के चित्त डगमगाते हैं; वे पहले सांत्वना देते हैं और फिर ‘मुसल’ समान प्रहार करते हैं। वे दुर्योधन को चेताते हैं कि विषधर सर्पों और नेत्र-विष वाले क्रोध को विद्वान् नहीं उकसाते—पर दुर्योधन उसी विष को जगाने पर तुला है। → दुर्योधन का निर्णय अटल रहता है—वह विदुर को स्पष्ट कह देता है कि जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जाएँ; हितवचन का स्थान सभा में नहीं, क्योंकि वह उसे अपमान प्रतीत होता है। विदुर सत्य कहकर भी राजहृदय को न मोड़ पाने की विवशता स्वीकारते हैं। → विदुर के निष्कासन/विमुखीकरण के साथ हस्तिनापुर में नीति की ज्योति मंद पड़ती है—अब द्यूत और विनाश की राह पर कौन रोकेगा?

Shlokas

Verse 1

2: छा 5 - कुरुकुलके एक पूर्वपुरुष । चतुष्षष्टितमो<5 ध्याय: दुर्योधनका विदुरको मा और विदुरका उसे चेतावनी ना दुर्योधन उवाच परेषामेव यशसा श्लाघसे त्वं सदा क्षत्त: कुत्सयन्‌ धार्तराष्ट्रानू | जानीमहे विदुर यत्‌ प्रियस्त्व॑ बालानिवास्मानवमन्यसे नित्यमेव,दुर्योधन बोला--विदुर! तुम सदा हमारे शत्रुओंके ही सुयशकी डींग हाँकते रहते हो और हम सभी धूृतराष्ट्रके पुत्रोंकी निन्दा किया करते हो। तुम किसके प्रेमी हो, यह हम जानते हैं, हमें मूर्ख समझकर तुम सदा हमारा अपमान ही करते रहते हो

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ କ୍ଷତ୍ତା (ବିଦୁର)! ତୁମେ ସଦା ଆମ ପ୍ରତିପକ୍ଷମାନଙ୍କ ଯଶକୁ ହିଁ ପ୍ରଶଂସା କରୁଛ ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କରୁଛ। ବିଦୁର! ତୁମର ସ୍ନେହ କେଉଁଠି ଅଛି ଆମେ ଜାଣୁ; ଆମକୁ ଶିଶୁ ଭାବି ତୁମେ ସଦା ଅବମାନ କରୁଛ।

Verse 2

स विज्ञेय: पुरुषो<न्यत्रकामो निन्दाप्रशंसे हि तथा युनक्ति | जिह्दा कथं ते हृदयं व्यनक्ति यो न ज्यायस: कृथा मनस: प्रातिकूल्यम्‌,जो दूसरोंको चाहनेवाला है, वह मनुष्य पहचानमें आ जाता है; क्योंकि वह जिसके प्रति द्वेष होता है, उसकी निन्‍्दा और जिसके प्रति राग होता है, उसकी प्रशंसामें संलग्न रहता है। तुम्हारा हृदय हमारे प्रति किस प्रकार द्वेषसे परिपूर्ण है, यह बात तुम्हारी जिह्ना प्रकट कर देती है। तुम अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंके प्रति इस प्रकार हृदयका द्वेष न प्रकट करो

ଯେ ମଣିଷ ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷକୁ ଆକାଂକ୍ଷା କରେ, ସେ ସହଜେ ଚିହ୍ନାଯାଏ; କାରଣ ସେ ଯାହାକୁ ଦ୍ୱେଷ କରେ ତାହାର ନିନ୍ଦାରେ ଏବଂ ଯାହାକୁ ଆସକ୍ତି ରଖେ ତାହାର ପ୍ରଶଂସାରେ ଲାଗିଥାଏ। ଆମ ପ୍ରତି ତୁମ ହୃଦୟରେ କେମିତି ବିରୋଧ ଭରିଛି, ତାହା ତୁମ ଜିଭ ହିଁ ପ୍ରକାଶ କରୁଛି। ନିଜଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମନର ଏହି ପ୍ରତିକୂଳତା ଏଭଳି ଦେଖାଅ ନାହିଁ।

Verse 3

उत्सज्े च व्याल इवाहितोडसि माजरिवत्‌ पोषकं चोपहंसि । भर्तृघ्न॑ त्वां न हि पापीय आहु- स्तस्मात्‌ क्षत्त: कि न बिभेषि पापात्‌,हमारे लिये तुम गोदमें बैठे साँपके समान हो और बिलावकी भाँति पालनेवालेका ही गला घोंट रहे हो। तुम स्वामिद्रोह रखते हो, फिर भी तुम्हें लोग पापी नहीं कहते? विदुर! तुम इस पापसे डरते क्यों नहीं?

ତୁମେ ଆମ ପାଇଁ କୋଳରେ ପୋଷା ସାପ ପରି—ସୁଯୋଗ ମିଳିଲେ ଡ଼ଂଶ ମାର। ଏବଂ ବିଲେଇ ପରି ଯେ ତୁମକୁ ପୋଷେ, ସେଇ ଉପରେ ଝପଟି ପଡ଼ି ଉପକାରକଙ୍କୁ ହାନି କରିବାକୁ ଚାହ। ସ୍ୱାମୀଦ୍ରୋହୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଲୋକେ ତୁମକୁ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ପାପୀ ବୋଲି କହୁନାହାନ୍ତି! ତେଣୁ, ହେ କ୍ଷତ୍ତା (ବିଦୁର)! ଏହି ପାପକୁ ତୁମେ କାହିଁକି ଭୟ କରୁନାହ?

Verse 4

जित्वा शत्रून्‌ू फलमाप्तं महद्‌ वै मास्मान्‌ क्षत्त: परुषाणीह वोच: । द्विषद्धिस्त्वं सम्प्रयोगाभिनन्दी मुहुर्देषं यासि नः सम्प्रयोगात्‌,हमने शत्रुओंको जीतकर (धनरूप) महान्‌ फल प्राप्त किया है। विदुर! तुम हमसे यहाँ कटु वचन न बोलो। तुम शत्रुओंके साथ मेल करके प्रसन्न हो रहे हो और हमारे साथ मेल करके भी अब (हमारे शत्रुओंकी प्रशंसा करके) हमलोगोंके बारंबार द्वेषके पात्र बन रहे हो

ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଜିତି ଆମେ (ଧନରୂପ) ମହାନ ଫଳ ପାଇଛୁ। କ୍ଷତ୍ତା (ବିଦୁର), ଏଠାରେ ଆମ ପ୍ରତି କଠୋର କଥା କହିବା ନାହିଁ। ତୁମେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ସଂଯୋଗ କରି ଆନନ୍ଦ ପାଉଛ, ଏବଂ ଆମ ସହ ଥାଇ ମଧ୍ୟ—ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରି—ବାରମ୍ବାର ଆମ ଦ୍ୱେଷର ପାତ୍ର ହେଉଛ।

Verse 5

अमित्रतां याति नरो$क्षमं ब्रुवन्‌ निगूहते गुह्ममित्रसंस्तवे । तदाश्रितो5पत्रप कि नु बाधसे यदिच्छसि त्वं तदिहाभिभाषसे,अक्षम्य कटुवचन बोलनेवाला मनुष्य शत्रु बन जाता है। शत्रुकी प्रशंसा करते समय भी लोग अपने गूढ़ मनोभावको छिपाये रखते हैं। निर्लज्ज विदुर! तुम भी उसी नीतिका आश्रय लेकर चुप क्‍यों नहीं रहते? हमारे काममें बाधा क्‍यों डालते हो? तुम जो मनमें आता है, वही बक जाते हो

ଅକ୍ଷମ୍ୟ କଟୁବଚନ କହୁଥିବା ମଣିଷ ଶତ୍ରୁ ହୋଇଯାଏ। ଶତ୍ରୁକୁ ପ୍ରଶଂସା କରିବାବେଳେ ମଧ୍ୟ ଲୋକେ ନିଜ ଗୁପ୍ତ ମନୋଭାବ ଲୁଚାଇ ରଖନ୍ତି। ନିର୍ଲଜ୍ଜ ବିଦୁର! ତୁମେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ନୀତିକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଚୁପ୍ କାହିଁକି ରହୁନାହ? ଆମ କାମରେ ବାଧା କାହିଁକି ଦେଉଛ? ଯାହା ମନେ ଆସେ, ସେଇ ଏଠାରେ କହିଦେଉଛ।

Verse 6

मा नो5वमंस्था विद्य मनस्तवेदं शिक्षस्व बुद्धि स्थविराणां सकाशात्‌ । यशो रक्षस्व विदुर सम्प्रणीतं मा व्यापृत: परकार्येषु भूस्त्वम्‌,विदुर! तुम हमलोगोंका अपमान न करो, तुम्हारे इस मनको हम जान चुके हैं। तुम बड़े-बूढ़ोंके निकट बैठकर बुद्धि सीखो। अपने पूर्वार्जित यशकी रक्षा करो। दूसरोंके कामोंमें हस्तक्षेप न करो

ହେ ବିଦ୍ୱାନ ବିଦୁର, ଆମକୁ ଅବମାନ କରନି; ତୁମ ମନର ଏହି ଝୁକାଉ ଆମେ ଜାଣିସାରିଛୁ। ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ପାଖରେ ବସି ବିବେକ ଶିଖ। ତୁମ ପୂର୍ବାର୍ଜିତ ଯଶକୁ ରକ୍ଷା କର। ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ କାମରେ ବ୍ୟସ୍ତ ହୋଇ ହସ୍ତକ୍ଷେପ କରନି।

Verse 7

अहं कर्तेति विदुर मा च मंस्था मा नो नित्यं परुषाणीह वोच: । न त्वां पृच्छामि विदुर यद्धितं मे स्वस्ति क्षत्तर्मा तितिक्षून्‌ क्षिणु त्वम्‌

ବିଦୁର, ‘ମୁଁ ହିଁ କର୍ତ୍ତା’ ବୋଲି ଭାବନି, ଏବଂ ଏଠାରେ ଆମ ପ୍ରତି ନିତ୍ୟ କଟୁବଚନ କହନି। ବିଦୁର, ମୋ ପାଇଁ କ’ଣ ହିତକର—ମୁଁ ତୁମକୁ ପଚାରୁନି। କ୍ଷତ୍ତା, ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ—ଯାଅ; ଯେମାନେ ଧୈର୍ୟଶୀଳ ଓ ସହନଶୀଳ, ସେମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ।

Verse 8

विदुर! “मैं ही कर्ता-धर्ता हूँ" ऐसा न समझो और हमें प्रतिदिन कड़वी बातें न कहो। मैं अपने हितके सम्बन्धमें तुमसे कोई सलाह नहीं पूछता हूँ। तुम्हारा भला हो। हम तुम्हारी कठोर बातें सहते चले जाते हैं, इसलिये हम क्षमाशीलोंको तुम अपने वचनरूपी बाणोंसे छेदो मत ।। एक: शास्ता न द्वितीयो5स्ति शास्ता गर्भ शयानं पुरुषं शास्ति शास्ता । तेनानुशिष्ट: प्रवणादिवाम्भो यथा नियुक्तोडस्मि तथा भवामि,देखो, इस जगत्‌का शासन करनेवाला एक ही है, दूसरा नहीं। वही शासक माताके गर्भमें सोये हुए शिशुपर भी शासन करता है; उसीके द्वारा मैं भी अनुशासित हूँ। अतः जैसे जल स्वाभाविक ही नीचेकी ओर जाता है, वैसे ही वह जगन्नियन्ता मुझे जिस काममें लगाता है, मैं वैसे ही उसी काममें लगता हूँ

ବିଦୁର, ‘ମୁଁ ହିଁ କର୍ତ୍ତା-ଧର୍ତ୍ତା’ ବୋଲି ଭାବନି, ଏବଂ ଆମକୁ ପ୍ରତିଦିନ କଟୁ କଥା କହନି। ମୋ ହିତ ସମ୍ବନ୍ଧରେ ମୁଁ ତୁମ ପରାମର୍ଶ ଚାହୁଁନି। ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଆମେ ତୁମ କଠୋର ବାଣୀ ସହିଆସୁଛୁ; ତେଣୁ ଆମ ପରି ସହନଶୀଳମାନଙ୍କୁ ବଚନରୂପ ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କରନି। ଦେଖ—ଏହି ଜଗତର ଶାସକ ଏକମାତ୍ର, ଦ୍ୱିତୀୟ ନାହିଁ। ସେଇ ଶାସକ ମାତୃଗର୍ଭରେ ଶୟନ କରୁଥିବା ପୁରୁଷକୁ ମଧ୍ୟ ଶାସନ କରନ୍ତି। ତାଙ୍କ ଅନୁଶାସନରେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଅଛି; ତେଣୁ ଯେପରି ଜଳ ସ୍ୱଭାବତଃ ଢାଳ ଧରି ତଳକୁ ବହେ, ସେପରି ଜଗନ୍ନିୟନ୍ତା ମୋତେ ଯେ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ କରନ୍ତି, ମୁଁ ସେହିପରି କରେ।

Verse 9

भिनत्ति शिरसा शैलमहिं भोजयते च य: । धीरेव कुरुते तस्य कार्याणामनुशासनम्‌ | यो बलादनुशास्तीह सोअमित्रं तेन विन्दति,जिनसे प्रेरित होकर मनुष्य अपने सिरसे पर्वतको विदीर्ण करना चाहता है--अर्थात्‌ पत्थरपर सिर पटककर स्वयं ही अपनेको पीड़ा देता है तथा जिनकी प्रेरणासे मनुष्य सर्पको भी दूध पिलाकर पालता है, उसी सर्वनियन्ताकी बुद्धि समस्त जगत्‌के कार्योंका अनुशासन करती है। जो बलपूर्वक किसीपर अपना उपदेश लादता है, वह अपने उस व्यवहारके द्वारा उसे अपना शत्रु बना लेता है

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଯେ ନିଜ ମୁଣ୍ଡରେ ପର୍ବତ ଫାଟାଇବାକୁ ଚାହେ, ଏବଂ ଯେ ସର୍ପକୁ ଦୁଧ ପିଆଇ ପାଳେ, ସେ ଭ୍ରାନ୍ତ ପ୍ରେରଣାରେ ନିଜକୁ ନିଜେ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଦେଇଥାଏ। ତଥାପି ଧୀର, ସର୍ବନିୟନ୍ତା ବୁଦ୍ଧି ହିଁ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟର ଅନୁଶାସନ କରେ। କିନ୍ତୁ ଯେ ଏଠାରେ ବଳପୂର୍ବକ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଶାସନ କରେ, ସେ ଏହି ଆଚରଣରେ ତାଙ୍କୁ ନିଜ ଶତ୍ରୁ କରିନେଇଥାଏ।

Verse 10

मित्रतामनुवृत्तं तु समुपेक्षेतर पण्डित: । प्रदीप्य य: प्रदीप्ताग्निं प्राक्‌ चिरं नाभिधावति । भस्मापि न स विन्देत शिष्टं क्वचन भारत,इस प्रकार मित्रताका अनुसरण करनेवाले मनुष्यको दविद्वान्‌ पुरुष त्याग दे। भारत! जो पहले कपूरमें आग लगाकर उसके प्रज्वलित हो जानेपर देरतक उसे बुझानेके लिये नहीं दौड़ता, वह कहीं उसकी बची हुई राख भी नहीं पाता

ମିତ୍ରତାକୁ କେବଳ ନାମରେ ଅନୁସରି କାର୍ଯ୍ୟରେ ଉପେକ୍ଷା କରୁଥିବା ଲୋକକୁ ପଣ୍ଡିତ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ। ହେ ଭାରତ! ଯେ ଆଗୁନ ଜଳାଇ, ତାହା ଭଲଭାବେ ଜ୍ୱଳିଉଠିଲେ ସମୟରେ ନିବାଇବାକୁ ଦୌଡ଼େ ନାହିଁ, ସେ କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ ତାହାର ଅବଶିଷ୍ଟ ରାଖ ସୁଦ୍ଧା ପାଉନାହିଁ—ଏହିପରି ସଙ୍କଟକ୍ଷଣର ଅବହେଳା ରକ୍ଷାଯୋଗ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ନଷ୍ଟ କରେ।

Verse 11

न वासयेत्‌ पारवर्ग्य द्विषन्तं विशेषत: क्षत्तरहितं मनुष्यम्‌ | स यत्रेच्छसि विदुर तत्र गच्छ सुसान्त्विता हासती स्त्री जहाति,विदुर! जो शत्रुका पक्षपाती हो, अपनेसे द्वेष रखता हो और अहित करनेवाला हो, ऐसे मनुष्यको घरमें नहीं रहने देना चाहिये। अतः तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चले जाओ। कुलटा सत्रीको मीठी-मीठी बातोंद्वारा कितनी ही सान्त्वना दी जाय, वह पतिको छोड़ ही देती है

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ବିଦୁର! ଯେ ଶତ୍ରୁପକ୍ଷପାତୀ, ଆମପ୍ରତି ଦ୍ୱେଷୀ ଏବଂ ଅହିତ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ, ଏମିତି ଲୋକକୁ ଘରେ ରଖିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ତେଣୁ ତୁମେ ଯେଉଁଠି ଇଚ୍ଛା ସେଉଁଠି ଯାଅ। ଯେପରି କୁଲଟା ସ୍ତ୍ରୀକୁ କେତେ ମିଠା କଥାରେ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦିଆଯାଉ, ସେ ତଥାପି ପତିକୁ ଛାଡ଼ିଦିଏ।

Verse 12

विदुर उवाच एतावता पुरुष ये त्यजन्ति तेषां वृत्तं साक्षिवद्‌ ब्रूहि राजन्‌ । राज्ञां हि चित्तानि परिप्लुतानि सान्त्वं दत्त्वा मुसलैर्घातयन्ति,विदुरने कहा--राजन्‌! जो इस प्रकार मनके प्रतिकूल किंतु हितभरी शिक्षा देनेमात्रसे अपने हितैषी पुरुषको त्याग देते हैं, उनका वह बर्ताव कैसा है, यह आप साक्षीकी भाँति पक्षपातरहित होकर बताइये; क्योंकि राजाओंके चित्त द्वेषसे भरे होते हैं, इसलिये वे सामने मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना देकर पीठ-पीछे मूसलोंसे आघात करवाते हैं

ବିଦୁର କହିଲେ—ରାଜନ! ମନକୁ ଅପ୍ରିୟ କିନ୍ତୁ ହିତକର ଉପଦେଶ ଦେଇଥିବା ମାତ୍ରେ ଯେମାନେ ନିଜ ହିତେଷୀକୁ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କର ସେହି ଆଚରଣ କେମିତି—ଆପଣ ସାକ୍ଷୀ ପରି ନିଷ୍ପକ୍ଷ ହୋଇ କହନ୍ତୁ। କାରଣ ରାଜାମାନଙ୍କ ଚିତ୍ତ ପ୍ରାୟ ଦ୍ୱେଷରେ ପ୍ଲାବିତ ଥାଏ; ସେମାନେ ସାମ୍ନାରେ ମିଠା କଥାରେ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଇ, ପଛରୁ ମୁସଳରେ ଆଘାତ କରାନ୍ତି।

Verse 13

अबालत्वं मन्यसे राजपुत्र बालो5हमित्येव सुमन्दबुद्धे । यः सौहदे पुरुषं स्थापयित्वा पश्चादेनं दूषयते स बाल:,राजकुमार दुर्योधन! तुम्हारी बुद्धि बड़ी मन्द है। तुम अपनेको विद्वान्‌ और मुझे मूर्ख समझते हो। जो किसी पुरुषको सुहृदके पदपर स्थापित करके फिर स्वयं ही उसपर दोषारोपण करता है, वही मूर्ख है

ରାଜପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ହେ ସୁମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି! ତୁମେ ନିଜକୁ ଅବାଳ ଭାବୁଛ ଏବଂ ମୋତେ ବାଳ ଭାବୁଛ। କିନ୍ତୁ ଯେ ଜଣେ ପୁରୁଷକୁ ସୁହୃଦର ପଦରେ ବସାଇ ପଛରେ ତାହାକୁ ଦୋଷାରୋପ କରେ, ସେଇ ହେଉଛି ପ୍ରକୃତ ମୂର୍ଖ।

Verse 14

न श्रेयसे नीयते मन्दबुद्धि: स्त्री श्रोत्रियस्थेव गृहे प्रदुष्टा । ध्रुवं न रोचेद्‌ भरतर्षभस्य पति: कुमार्या इव षष्टिवर्ष:,जैसे श्रोत्रियके घरमें दुराचारिणी स्त्री कल्याणमय अग्निहोत्र आदि कार्योंमें नहीं लगायी जा सकती, उसी प्रकार मन्दबुद्धि पुरुषको कल्याणके मार्गपर नहीं लगाया जा सकता। जैसे कुमारी कन्याको साठ वर्षका बूढ़ा पति नहीं पसंद आ सकता, उसी प्रकार भरतवंशशिरोमणि दुर्योधनको निश्चय ही मेरा उपदेश रुचिकर नहीं प्रतीत होता

ଯେପରି ଶ୍ରୋତ୍ରିୟଙ୍କ ଘରେ ଦୁରାଚାରିଣୀ ସ୍ତ୍ରୀକୁ କଲ୍ୟାଣକର ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର ଆଦି କର୍ମରେ ଲଗାଇହେବ ନାହିଁ, ସେପରି ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ପୁରୁଷକୁ ଶ୍ରେୟସ୍‌ର ପଥରେ ନେଇହେବ ନାହିଁ। ଆଉ ଯେପରି କୁମାରୀ କନ୍ୟାକୁ ଷାଠି ବର୍ଷର ବୃଦ୍ଧ ପତି ରୁଚେ ନାହିଁ, ସେପରି ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ମୋ ଉପଦେଶ ନିଶ୍ଚୟ ରୁଚିକର ଲାଗେ ନାହିଁ।

Verse 15

अतः प्रियं चेदनुकाड्क्षसे त्वं सर्वेषु कार्येषु हिताहितेषु । स्त्रियश्ष राजन्‌ जडपडजुकांश्व पृच्छ त्वं वै तादृशांश्वैव सर्वान्‌,राजन! यदि तुम भले-बुरे सभी कार्योमें केवल चिकनी-चुपड़ी बातें ही सुनना चाहते हो, तो स्त्रियों, मूर्खों, पंगुओं तथा उसी तरहके अन्य सब मनुष्योंसे सलाह लिया करो

ରାଜନ୍! ଯଦି ହିତ-ଅହିତ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟରେ ତୁମେ କେବଳ କାନକୁ ମିଠା ଲାଗୁଥିବା କଥା ମାତ୍ର ଶୁଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ତେବେ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ, ଜଡବୁଦ୍ଧିମାନଙ୍କୁ, ପଙ୍ଗୁମାନଙ୍କୁ ଏବଂ ସେହିପରି ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପଚାରି ପରାମର୍ଶ ନିଅ।

Verse 16

लभ्यते खलु पापीयान्‌ नरो नु प्रियवागिह । अप्रियस्य हि पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:,इस संसारमें सदा मनको प्रिय लगनेवाले वचन बोलनेवाला महापापी मनुष्य भी अवश्य मिल सकता है; परंतु हितकर होते हुए भी अप्रिय वचनको कहने और सुननेवाले दोनों दुर्लभ हैं

ଏହି ସଂସାରରେ କାନକୁ ଭଲ ଲାଗୁଥିବା କଥା ମାତ୍ର କହୁଥିବା ମହାପାପୀ ମଣିଷ ମଧ୍ୟ ମିଳିଯାଏ; କିନ୍ତୁ ହିତକର ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଅପ୍ରିୟ କଥା କହୁଥିବା ଲୋକ ଓ ସେହି କଥା ଶୁଣୁଥିବା ଲୋକ—ଦୁହେଁ ଦୁର୍ଲଭ।

Verse 17

यस्तु धर्मपरश्न स्याद्धित्वा भर्तुः प्रियाप्रिये | अप्रियाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहायवान्‌,जो धर्ममें तत्पर रहकर स्वामीके प्रिय-अप्रियका विचार छोड़कर अप्रिय होनेपर भी हितकर वचन बोलता है, वही राजाका सच्चा सहायक है

ଯେ ଧର୍ମପରାୟଣ ହୋଇ, ସ୍ୱାମୀଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ କି ଅପ୍ରିୟ—ଏହି ଚିନ୍ତା ଛାଡ଼ି, ଅପ୍ରିୟ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ପଥ୍ୟ ଓ ହିତକର କଥା କହେ, ସେଇ ରାଜାଙ୍କ ସତ୍ୟ ସହାୟ; ଏମିତି ସହାୟ ଥିଲେ ରାଜା ପ୍ରକୃତରେ ସମର୍ଥ ହୁଏ।

Verse 18

अव्याधिजं कटुजं तीक्ष्णमुष्णं यशोमुषं परुष॑ पूतिगन्धि । सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य,महाराज! जो पी लेनेपर मानसिक रोगोंका नाश करनेवाला है, कड़वी बातोंसे जिसकी उत्पत्ति होती है, जो तीखा, तापदायक, कीर्तिनाशक, कठोर और दूषित प्रतीत होता है, जिसे दुष्टलोग नहीं पी सकते तथा जो सत्पुरुषोंके पीनेकी वस्तु है, उस क्रोधको पीकर शान्त हो जाइये

ମହାରାଜ! ଯାହାକୁ ‘ପିଇ’ ନେଲେ ମନସିକ ରୋଗ ନାଶ ହୁଏ, ଯାହା କଟୁ କଥାରୁ ଜନ୍ମ ନେଇଛି; ଯାହା ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଓ ଦାହକ, ଯଶ ହରଣକାରୀ, କଠୋର ଓ ଦୁର୍ଗନ୍ଧମୟ ପ୍ରତୀତ ହୁଏ; ଯାହାକୁ ଅସତ୍ ଲୋକ ପିଇ ପାରନ୍ତି ନାହିଁ ଏବଂ ଯାହା ସତ୍ପୁରୁଷଙ୍କ ପାନୀୟ—ସେହି କ୍ରୋଧକୁ ପିଇ ଆପଣ ଶାନ୍ତ ହୁଅନ୍ତୁ।

Verse 19

वैचित्रवीर्यस्थ यशो धनं च वाञ्छाम्यहं सहपुत्रस्य शश्वत्‌ यथा तथा ते>स्तु नमश्न ते<स्तु ममापि च स्वस्ति दिशन्तु विप्रा:,मैं तो चाहता हूँ कि विचित्रवीर्यनन्दन धृतराष्ट्र और उनके पुत्रोंकोी सदा यश और धन दोनों प्राप्त हो, परंतु दुर्योधन! तुम जैसे रहना चाहते हो, वैसे रहो, तुम्हें नमस्कार है। ब्राह्मणलोग मेरे लिये भी कल्याणका आशीर्वाद दें

ବିଦୁର କହିଲେ—ବିଚିତ୍ରବୀର୍ୟନନ୍ଦନ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଓ ତାଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ସଦା ଯଶ ଓ ଧନ ଲାଭ ହେଉ—ଏହି ମୋର ନିରନ୍ତର କାମନା। ତଥାପି, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ତୁମେ ଯେପରି ଚାହ, ସେପରି ରୁହ; ତୁମକୁ ନମସ୍କାର। ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ମୋ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ କଲ୍ୟାଣର ଆଶୀର୍ବାଦ ଦିଅନ୍ତୁ।

Verse 20

आशीविषान्‌ नेत्रविषान्‌ कोपयेन्न च पण्डित: । एवं ते5हं वदामीदं प्रयतः कुरुनन्दन,कुरुनन्दन! मैं एकाग्र हृदयसे तुमसे यह बात बता रहा हूँ, 'विद्वान्‌ पुरुष उन सर्पोंको कुपित न करें, जो दाँतों और नेत्रोंसे भी विष उगलते रहते हैं (अर्थात्‌ ये पाण्डव तुम्हारे लिये सर्पोंसे भी अधिक भयंकर हैं, इन्हें मत छेड़ो)”

କୁରୁନନ୍ଦନ! ମୁଁ ଏକାଗ୍ରଚିତ୍ତରେ ତୁମକୁ କହୁଛି—ଯେ ସର୍ପମାନେ ଦାନ୍ତରୁ ମାତ୍ର ନୁହେଁ, ନେତ୍ରରୁ ମଧ୍ୟ ବିଷ ଝରାନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ପଣ୍ଡିତ ପୁରୁଷ କଦାପି କ୍ରୋଧିତ କରେନାହିଁ।

Verse 63

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्वूतपर्वमें विदुरवाक्यविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ବିଦୁରବାକ୍ୟବିଷୟକ ତ୍ରିଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 64

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि विदुरहितवाक्ये चतुष्षष्टितमो5ध्याय: ।। ६४ ।। इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापवके अन्तर्गत ट्यूतपर्वमें विदुरके हितकारक वचनविषयक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ‘ବିଦୁରହିତବାକ୍ୟ’ ବିଷୟକ ଚତୁଷ୍ଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ (64) ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

Whether immediate retaliatory force is justified under extreme provocation, or whether restraint within the assembly—preserving procedural legitimacy and preventing uncontrolled escalation—better serves dharma and long-term political stability.

The chapter contrasts reactive anger with disciplined conduct: noble speech avoids corrosive harshness, virtue remembers merit over hostility, and leadership may require restraining even justified rage to protect order and future outcomes.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is narrative-ethical—using authoritative maxim (Devala) and vivid characterization to frame restraint and speech-ethics as integral to sabhā-dharma and dynastic continuity.