
Adhyāya 48 — Duryodhana’s Account of Tribute and the Provisioned Court (सभा पर्व, अध्याय ४८)
Upa-parva: Rājasūyika (Rājasūya) Upa-Parva — Tribute and Courtly Enumeration Episode
Duryodhana reports to an interlocutor (addressing him as “anagha”) the magnitude and variety of wealth assembled for Yudhiṣṭhira’s sacrificial and royal purposes. The chapter enumerates tributary peoples and regions—especially northern and frontier zones—along with commodities such as gold, aromatic woods (candana, aguru), textiles, gems, skins, honey, medicines, horses, elephants, and attendants. Several groups arrive at the palace gates with offerings yet are held at the door under royal instruction, emphasizing controlled access and bureaucratic order. The narrative then expands into quantitative depictions of Yudhiṣṭhira’s household provisioning: large numbers of dependents, ascetics, and guests are fed and satisfied, with Draupadī overseeing distribution and ensuring no one is neglected. The account closes by noting exceptions to tribute obligations grounded in alliance and marriage ties (e.g., Pāñcālas by marital relation; Andhaka-Vṛṣṇis by friendship), underscoring a diplomatic logic distinct from subordination.
Chapter Arc: दुर्योधन पाण्डवों की बढ़ती प्रतिष्ठा और मय-सभा की चमक से भीतर-ही-भीतर जलता है; उसी संताप में वह अपने मामा शकुनि से विजय का उपाय पूछता है। → शकुनि दुर्योधन को समझाता है कि केवल ईर्ष्या से नहीं, नीति-चातुर्य से काम लेना होगा; वह पाण्डवों के भाग्य, अर्जुन द्वारा मय दानव की रक्षा और उससे बनी अद्भुत सभा का स्मरण कराकर दुर्योधन की हीन-ग्रंथि और क्रोध को दिशा देता है। फिर वह कौरव-पक्ष की शक्ति-श्रृंखला (भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा आदि) गिनाकर आत्मविश्वास जगाता है—पर संकेत देता है कि सीधी युद्ध-जीत कठिन है। → शकुनि निर्णायक रूप से कहता है कि वह ऐसा उपाय जानता है जिससे स्वयं युधिष्ठिर पराजित हो सकते हैं—अर्थात द्यूत (जुए) के माध्यम से। दुर्योधन तुरंत पूछता है कि यदि यह संभव है तो वह उपाय बताओ। → शकुनि दुर्योधन को निर्देश देता है कि यह योजना धृतराष्ट्र के सामने रखो; पिता की अनुमति मिलते ही वह निःसंदेह पाण्डवों को ‘जीत’ लेगा—यानी राज्य और वैभव को द्यूत से हड़पने का मार्ग प्रशस्त होगा। → दुर्योधन धृतराष्ट्र के पास यह प्रस्ताव ले जाने को तत्पर होता है—अब प्रश्न यह है कि अंधे राजा की स्वीकृति किस दिशा में इतिहास को मोड़ेगी।
Verse 1
भीकम (2 अमान अष्टचत्वारिशो< ध्याय: पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये शकुनि और दुर्योधनकी बातचीत शकुनिरुवाच दुर्योधन न तेअमर्ष: कार्य: प्रति युधिष्ठिरम् । भागधेयानि हि स्वानि पाण्डवा भुञ्जते सदा
ଶକୁନି କହିଲା—“ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପ୍ରତି ତୁମେ ରୋଷ ଧରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ପାଣ୍ଡବମାନେ ସଦା ନିଜ ଭାଗ୍ୟରେ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ନିଜ ଅଂଶକୁ ହିଁ ଭୋଗ କରୁଛନ୍ତି।”
Verse 2
विधान विविधाकारं परं तेषां विधानत: । अनेकैरशभ्युपायैश्न त्वया न शकिता: पुरा
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ତାଙ୍କର ବ୍ୟବସ୍ଥା ବହୁରୂପୀ ଓ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ବିଧାତାଙ୍କ ରଚନା ପରି। ତଥାପି ପୂର୍ବେ ତୁମେ ଅନେକ ଅଶୁଭ ଉପାୟ ନେଇ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରିପାରିଲ ନାହିଁ।”
Verse 3
शकुनि बोला-दुर्योधन! तुम्हें युधिष्ठिरके प्रति ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये; क्योंकि पाण्डव सदा अपने भाग्यका ही उपभोग करते आ रहे हैं। तुमने उन्हें वशमें लानेके लिये अनेक प्रकारके उपायोंका अवलम्बन किया, परंतु उनके द्वारा तुम उन्हें अपने अधीन न कर सके ।। आरब्धाश्न महाराज पुन: पुनररिंदम । विमुक्ताश्न नरव्याप्रा भागधेयपुरस्कृता:,शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! तुमने बार-बार पाण्डवोंपर कुचक्र चलाये, परंतु वे नरश्रेष्ठ अपने भाग्यसे उन सभी संकटोंसे छुटकारा पाते गये
ଶକୁନି କହିଲା—“ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପ୍ରତି ତୁମେ ଈର୍ଷ୍ୟା କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; ପାଣ୍ଡବମାନେ ସଦା ନିଜ ଭାଗ୍ୟର ଅଂଶକୁ ହିଁ ଭୋଗ କରିଆସୁଛନ୍ତି। ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ ମହାରାଜ, ତୁମେ ପୁନଃପୁନଃ ସେମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ କୁଚକ୍ର ଆରମ୍ଭ କଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ନରବ୍ୟାଘ୍ରମାନେ ନିଜ ଭାଗ୍ୟବଳରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସଙ୍କଟରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇଗଲେ।”
Verse 4
तैर्लब्धा द्रौपदी भार्या द्रुपदश्न सुतैः सह | सहाय: पृथिवीलाभे वासुदेवश्च वीर्यवान्,उन पाँचोंने पत्नीरूपमें द्रौपदीको तथा पुत्रों-लहित राजा द्रुपद एवं सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्राप्तिमें कारण महापराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको सहायकरूपमें प्राप्त किया है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ସେମାନେ ଦ୍ରୌପଦୀକୁ ପତ୍ନୀରୂପେ ପାଇଛନ୍ତି; ଦ୍ରୁପଦ ମଧ୍ୟ ନିଜ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ତାଙ୍କର ସହାୟ ହୋଇଛନ୍ତି। ଏବଂ ପୃଥିବୀରାଜ୍ୟ ଲାଭରେ ମହାବୀର୍ୟବାନ ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ସମର୍ଥକ।”
Verse 5
(अजित: सो<पि सर्वरहिं सदेवासुरमानुषै: । तत्तेजसा प्रवृद्धोडसौ तत्र का परिदेवना ।।) श्रीकृष्णको सब देवता, असुर और मनुष्य मिलकर भी जीत नहीं सकते। उन्हींके तेजसे राजा युधिष्ठिरकी उन्नति हुई है; इसके लिये शोक करनेकी क्या बात है? लब्धश्नानभिभूतार्थ: पित्रयों3$श: पृथिवीपते । विवृद्धस्तेजसा तेषां तत्र का परिदेवना,पृथ्वीपते! पाण्डवोंने अपने उद्देश्यसे विचलित न होकर निरन्तर प्रयत्न करके राज्यमें अपना पैतृक अंश प्राप्त किया है और वह पैतृक सम्पत्ति आज उन्हींके तेजसे बहुत बढ़ गयी है, अत: उसके लिये चिन्ता करनेकी क्या आवश्यकता है?
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଅଜିତ; ସମସ୍ତ ଦେବ, ଅସୁର ଓ ମନୁଷ୍ୟ ଏକତ୍ର ହେଲେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କୁ ଜିତି ପାରିବେ ନାହିଁ। ତାଙ୍କର ତେଜରେ ହିଁ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସମୃଦ୍ଧିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି; ତେବେ ଶୋକ କାହିଁକି? ହେ ପୃଥିବୀପତି, ପାଣ୍ଡବମାନେ ଲକ୍ଷ୍ୟରୁ ନ ଡଗି ନିରନ୍ତର ପ୍ରୟାସରେ ରାଜ୍ୟରେ ନିଜ ପିତୃଭାଗ ଲାଭ କରିଛନ୍ତି; ଏବଂ ସେହି ପିତୃଦାୟ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ତେଜରେ ବହୁତ ବଢ଼ିଛି—ତେଣୁ, ହେ ରାଜା, ବିଲାପ କାହିଁକି?
Verse 6
धनंजयेन गाण्डीवमक्षय्यौ च महेषुधी । लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तोषयित्वा हुताशनम्,अर्जुनने अग्निदेवको संतुष्ट करके गाण्डीव धनुष, अक्षय तरकस तथा कितने ही दिव्य अस्त्र प्राप्त किये हैं। उस श्रेष्ठ धनुषके द्वारा तथा अपनी भुजाओंके बलसे उन्होंने समस्त राजाओंको वशमें किया है, अत: इसके लिये शोककी क्या आवश्यकता है?
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ହୁତାଶନ ଅଗ୍ନିଦେବଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରି ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁ, ଦୁଇଟି ଅକ୍ଷୟ ମହାତୂଣୀର ଓ ଅନେକ ଦିବ୍ୟ ଅସ୍ତ୍ର ଲାଭ କରିଛି। ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନୁ ଓ ନିଜ ଭୁଜବଳରେ ସେ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ବଶ କରିଛି; ତେବେ ଶୋକ କାହିଁକି?
Verse 7
तेन कार्मुकमुख्येन बाहुवीर्येण चात्मन: । कृता वशे महीपालास्तत्र का परिदेवना,अर्जुनने अग्निदेवको संतुष्ट करके गाण्डीव धनुष, अक्षय तरकस तथा कितने ही दिव्य अस्त्र प्राप्त किये हैं। उस श्रेष्ठ धनुषके द्वारा तथा अपनी भुजाओंके बलसे उन्होंने समस्त राजाओंको वशमें किया है, अत: इसके लिये शोककी क्या आवश्यकता है?
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନୁ ଓ ନିଜ ଭୁଜବଳରେ ଅର୍ଜୁନ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ବଶ କରିଛି; ତେବେ ଶୋକ କାହିଁକି?
Verse 8
अग्निदाहान्मयं चापि मोक्षयित्वा स दानवम् | सभां तां कारयामास सव्यसाची परंतप:,सव्यसाची परंतप अर्जुनने मय दानवको आगमें जलनेसे बचाया और उसीके द्वारा उस दिव्य सभाका निर्माण कराया
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପରନ୍ତପ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ଅଗ୍ନିଦାହରୁ ମୟ ଦାନବକୁ ଉଦ୍ଧାର କରି, ସେହି ମୟଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଏହି ଦିବ୍ୟ ସଭା ନିର୍ମାଣ କରାଇଲା।
Verse 9
तेन चैव मयेनोक्ता: किंकरा नाम राक्षसा: | वहन्ति तां सभां भीमास्तत्र का परिदेवना
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେହି ମୟ ହିଁ କହିଛି ଯେ ‘କିଙ୍କର’ ନାମର ଭୟଙ୍କର ରାକ୍ଷସ ଅଛନ୍ତି; ସେହି ଭୀମମାନେ ଏହି ସଭାକୁ ବହନ କରୁଛନ୍ତି—ତେବେ ଶୋକ କାହିଁକି?
Verse 10
यच्चासहायतां राजन्नुक्तवानसि भारत । तन्मिथ्या भ्रातरो हीमे तव सर्वे वशानुगा:
ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ରାଜନ୍, ଭାରତବଂଶଜ! ତୁମେ ଯେ ନିଜକୁ ଅସହାୟ କହିଛ, ସେ ମିଥ୍ୟା; କାରଣ ମୋର ଏହି ସମସ୍ତ ଭାଇ ତୁମ ଆଜ୍ଞାଧୀନ, ତୁମ ବଶାନୁଗ।
Verse 11
उस मयके ही कहनेसे किंकरनामधारी भयंकर राक्षसगण उस सभाको एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाते हैं। अतः इसके लिये भी शोक-संताप क्यों किया जाय? भारत! तुमने जो अपनेको असहाय बताया है, वह मिथ्या है; क्योंकि तुम्हारे ये सब भाई तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं ।। द्रोणस्तव महेष्वास: सह पुत्रेण वीर्यवान् सूतपुत्रश्न राधेयो गौतमश्न महारथ:,महान् धनुर्धर और पराक्रमी द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ तुम्हारी सहायताके लिये उद्यत हैं। राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण, महारथी कृपाचार्य, भाइयोंसहित मैं तथा राजा भूरिश्रवा--इन सबके साथ तुम भी सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त करो
ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମାୟାଙ୍କ ଆଦେଶରେ ‘କିଙ୍କର’ ନାମଧାରୀ ଭୟଙ୍କର ରାକ୍ଷସମାନେ ଏହି ସଭାଗୃହକୁ ଇଚ୍ଛାମତେ ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନରୁ ଅନ୍ୟ ସ୍ଥାନକୁ ବହନ କରିପାରନ୍ତି; ତେଣୁ ଏଥିପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଶୋକ କାହିଁକି? ହେ ଭାରତ! ତୁମେ ଯେ ନିଜକୁ ଅସହାୟ କହିଛ, ସେ ମିଥ୍ୟା; କାରଣ ତୁମ ଏହି ସମସ୍ତ ଭାଇ ତୁମ ଆଜ୍ଞାଧୀନ। ମହାଧନୁର୍ଧର ପରାକ୍ରମୀ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ତାଙ୍କ ବୀର ପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ସହ ତୁମ ସହାୟତାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ; ଏବଂ ରାଧାନନ୍ଦନ ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ, ଗୌତମବଂଶୀ ମହାରଥୀ କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ। ମୁଁ ମୋ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ, ଏବଂ ରାଜା ଭୂରିଶ୍ରବା—ଏ ସମସ୍ତଙ୍କ ସହ ତୁମେ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଜୟ କର।
Verse 12
अहं च सह सोदर्य: सौमदत्तिश्च पार्थिव: । एतैस्त्वं सहित: सर्वैर्जय कृत्स्नां वसुन्धराम्,महान् धनुर्धर और पराक्रमी द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ तुम्हारी सहायताके लिये उद्यत हैं। राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण, महारथी कृपाचार्य, भाइयोंसहित मैं तथा राजा भूरिश्रवा--इन सबके साथ तुम भी सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त करो
ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମୁଁ ମୋ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ, ଏବଂ ସୌମଦତ୍ତ ରାଜା (ଭୂରିଶ୍ରବା) ମଧ୍ୟ, ତୁମ ସହ ଅଛୁ। ଏ ସମସ୍ତଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ ତୁମେ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଜୟ କର।
Verse 13
दुर्योधन उवाच त्वया च सहितो राजजन्ेतैश्षान्यैर्महारथै: । एतानेव विजेष्यामि यदि त्वमनुमन्यसे,दुर्योधनने कहा--राजन्! यदि तुम्हारी अनुमति हो, तो तुम्हारे और इन द्रोण आदि अन्य महारथियोंके साथ इन पाण्डवोंको ही युद्धमें जीत लूँ। इनके पराजित हो जाने-पर अभी यह सारी पृथ्वी, समस्त भूपाल और वह महाधन-सम्पन्न सभा भी हमारे अधीन हो जायगी
ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ରାଜନ୍! ଯଦି ତୁମେ ଅନୁମତି ଦିଅ, ତେବେ ତୁମ ସହ ଏବଂ ଏହି ଅନ୍ୟ ମହାରଥୀମାନଙ୍କ ସହ ମିଶି ମୁଁ ଏହି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଜୟ କରିବି।
Verse 14
एतेषु विजितेष्वद्य भविष्यति मही मम । सर्वे च पृथिवीपाला: सभा सा च महाधना,दुर्योधनने कहा--राजन्! यदि तुम्हारी अनुमति हो, तो तुम्हारे और इन द्रोण आदि अन्य महारथियोंके साथ इन पाण्डवोंको ही युद्धमें जीत लूँ। इनके पराजित हो जाने-पर अभी यह सारी पृथ्वी, समस्त भूपाल और वह महाधन-सम्पन्न सभा भी हमारे अधीन हो जायगी
ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଯଦି ଆଜି ଏମାନେ ଜୟ ହେବେ, ତେବେ ଏହି ପୃଥିବୀ ମୋର ହେବ; ଏବଂ ସମସ୍ତ ଭୂପାଳମାନେ ଓ ସେଇ ମହାଧନସମ୍ପନ୍ନ ସଭାଗୃହ ମଧ୍ୟ ଆମ ଅଧୀନକୁ ଆସିବ।
Verse 15
शकुनिरुवाच धनंजयो वासुदेवो भीमसेनो युधिष्ठिर: । नकुल:ः सहदेवश्न द्रुपदश्च सहात्मजै:,शकुनि बोला--राजन्! अर्जुन, श्रीकृष्ण, भीमसेन, युधिष्ठिर नकुल, सहदेव तथा पुत्रोंसहित ट्रपद--इन्हें देवता भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते। ये सब-के-सब महारथी, महान् धनुर्धर, अस्त्रविद्यामें निपुण तथा युद्धमें उन््मत्त होकर लड़नेवाले हैं
ଶକୁନି କହିଲା—ହେ ରାଜନ୍! ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ), ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ), ଭୀମସେନ, ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ନକୁଳ, ସହଦେବ ଏବଂ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ଦ୍ରୁପଦ—ଏମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଦେବଗଣ ମଧ୍ୟ ପରାଜିତ କରିପାରିବେ ନାହିଁ। ସମସ୍ତେ ମହାରଥୀ, ମହାଧନୁର୍ଧର, ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ନିପୁଣ ଏବଂ ରଣୋନ୍ମତ୍ତ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧ କରନ୍ତି।
Verse 16
नैते युधि पराजेतुं शक््या देवगणैरपि । महारथा महेष्वासा: कृतास्त्रा युद्धदुर्मदा:,शकुनि बोला--राजन्! अर्जुन, श्रीकृष्ण, भीमसेन, युधिष्ठिर नकुल, सहदेव तथा पुत्रोंसहित ट्रपद--इन्हें देवता भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते। ये सब-के-सब महारथी, महान् धनुर्धर, अस्त्रविद्यामें निपुण तथा युद्धमें उन््मत्त होकर लड़नेवाले हैं
ଏମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଦେବଗଣ ମଧ୍ୟ ପରାଜିତ କରିପାରିବେ ନାହିଁ। ସମସ୍ତେ ମହାରଥୀ, ମହାଧନୁର୍ଧର, ଅସ୍ତ୍ରରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରଶିକ୍ଷିତ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧୋନ୍ମତ୍ତ।
Verse 17
अहं तु तद् विजानामि विजेतुं येन शक््यते । युधिष्ठिरं स्वयं राजंस्तन्निबोध जुषस्व च,राजन! मैं वह उपाय जानता हूँ, जिससे युधिष्ठिर स्वयं पराजित हो सकते हैं। तुम उसे सुनो और उसका सेवन करो
କିନ୍ତୁ ମୁଁ ସେହି ଉପାୟ ଜାଣେ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ସ୍ୱୟଂ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରାଯାଇପାରେ। ହେ ରାଜନ୍, ତାହା ଭଲଭାବେ ବୁଝ; ଶୁଣ ଏବଂ ତାହାକୁ ଅନୁଷ୍ଠାନ କର।
Verse 18
दुर्योधन उवाच अप्रमादेन सुह्ृदामन्येषां च महात्मनाम् । यदि शक््या विजेतुं ते तन््ममाचक्ष्व मातुल,दुर्योधनने कहा--मामाजी! यदि मेरे सगे-सम्बन्धियों तथा अन्य महात्माओंकी सतत सावधानीसे किसी उपायद्वारा पाण्डवोंको जीता जा सके तो वह मुझे बताइये
ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ମାତୁଳ! ମୋର ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଓ ଅନ୍ୟ ମହାତ୍ମାମାନଙ୍କ ନିରନ୍ତର ସତର୍କତା ସହ, ଯଦି କୌଣସି ଉପାୟରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଜିତିହେବ, ତେବେ ସେହି ଉପାୟ ମୋତେ କୁହ।
Verse 19
शकुनिरुवाच द्यूतप्रियश्न॒ कौन्तेयो न स जानाति देवितुम् । समाहूतश्न राजेन्द्रो न शक्ष्यति निवर्तितुम्,शकुनि बोला--राजन्! कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको जुएका खेल बहुत प्रिय है, किंतु वे उसे खेलना नहीं जानते। यदि महाराज युधिष्ठिरको द्यूतक्रीड़ाके लिये बुलाया जाय तो वे पीछे नहीं हट सकेंगे
ଶକୁନି କହିଲା—ହେ ରାଜନ୍! କୌନ୍ତେୟ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦ୍ୟୂତକୁ ପ୍ରିୟ କରନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ଖେଳିବା ତାଙ୍କୁ ଭଲଭାବେ ଜଣା ନାହିଁ। ସେହି ରାଜେନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ପାଶକ୍ରୀଡା ପାଇଁ ଡାକିଲେ, ସେ ପଛୁଆ ହୋଇପାରିବେ ନାହିଁ।
Verse 20
देवने कुशलश्षाहं न मे5स्ति सदृशो भुवि । त्रिषु लोकेषु कौरव्य त॑ त्वं द्यूते समाह्दय,मैं जूआ खेलनेमें बहुत निपुण हूँ। इस कलामें मेरी समानता करनेवाला पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है। केवल यहीं नहीं, तीनों लोकोंमें मेरे-जैसा द्यूतविद्याका जानकार नहीं है। अतः कुरुनन्दन! तुम द्यूतक्रीड़ाके लिये युधिष्ठिरको बुलाओ
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମୁଁ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାରେ କୁଶଳ; ପୃଥିବୀରେ ମୋ ସମାନ କେହି ନାହିଁ। ତିନି ଲୋକରେ ମଧ୍ୟ ଦ୍ୟୂତବିଦ୍ୟାରେ ମୋ ପରି ଜଣେ ନାହିଁ। ତେଣୁ, କୁରୁନନ୍ଦନ, ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡା ପାଇଁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଏଠାକୁ ଡାକ।
Verse 21
तस्याक्षकुशलो राजन्नादास्येडहमसंशयम् | राज्यं श्रियं च तां दीप्तां त्वदर्थ पुरुषर्षभ,नरश्रेष्ठ! मैं पासा फेंकनेमें कुशल हूँ; अतः युधिष्ठिरके राज्य तथा देदीप्यमान राजलक्ष्मीको तुम्हारे लिये अवश्य प्राप्त कर लूँगा, इसमें संशय नहीं है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ରାଜନ୍, ମୁଁ ଅକ୍ଷକ୍ରୀଡାରେ କୁଶଳ; ନିଶ୍ଚୟ ମୁଁ ଜିତିବି। ହେ ପୁରୁଷର୍ଷଭ, ତୁମ ପାଇଁ ମୁଁ ରାଜ୍ୟ ଓ ସେ ଦୀପ୍ତ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀକୁ ନିଶ୍ଚୟ ହାସଲ କରିବି।
Verse 22
इदं तु सर्व त्वं राज्ञे दुर्योधन निवेदय । अनुज्ञातस्तु ते पित्रा विजेष्ये तान्ू न संशय:
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଏହି ସବୁ କଥା ରାଜାଙ୍କୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଜଣାଅ। ପିତାଙ୍କ ଅନୁମତି ମିଳିଲେ ତୁମେ ନିଶ୍ଚୟ ସେମାନଙ୍କୁ ଜିତିବ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 23
दुर्योधन! तुम ये सारी बातें पिताजीसे कहो। उनकी आज्ञा मिल जानेपर मैं निःसंदेह पाण्डवोंको जीत लूँगा ।। दुर्योधन उवाच त्वमेव कुरुमुख्याय धृतराष्ट्राय सौबल । निवेदय यथान्यायं नाहं शक्ष्ये निवेदितुम्,दुर्योधनने कहा--सुबलनन्दन! आप ही कुरुकुलके प्रधान महाराज धृतराष्ट्रसे इन सब बातोंको यथोचित रूपसे कहिये। मैं स्वयं कुछ नहीं कह सकूँगा
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ସୌବଲ, କୁରୁମୁଖ୍ୟ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଏହି ସବୁ କଥା ଯଥାନ୍ୟାୟ ତୁମେ ନିଜେ ନିବେଦନ କର; ମୁଁ ନିଜେ କହିପାରିବି ନାହିଁ।
Verse 48
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे अष्टचत्वारिंशो5ध्याय: ।। ४८ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନସନ୍ତାପବିଷୟକ ଅଷ୍ଟଚତ୍ୱାରିଂଶ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା॥୪୮॥
The chapter implies a tension between prosperity and restraint: public abundance can validate sovereignty, yet it can also intensify rivalry and distort judgment when viewed through competitive status comparison.
Effective kingship is portrayed as logistical and distributive competence—regulated access, orderly reception of offerings, and reliable hospitality—so that diverse groups remain secure and recognized within the sovereign’s domain.
No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions primarily as administrative-ethical description and political characterization within the Rājasūya court setting.