
दुर्योधनस्य बलिवर्णनम् — Duryodhana’s Description of Tribute at the Rājasūya
Upa-parva: Rājasūyika (Rājasūya) Upa-Parva — Tribute Presentation Episode
Duryodhana addresses Dhṛtarāṣṭra, urging him to hear what he observed regarding the Pandavas’ wealth and the tribute brought by rulers from many regions. He describes high-value textiles and garments, horses and camels, and delegations waiting at the gate with offerings—sometimes being regulated or delayed in entry—illustrating the scale of administration around Yudhiṣṭhira’s sacrificial venue. The narration expands into a wide-ranging inventory: gold and silver, ivory and crafted vessels, weapons, chariots, beds and seats, perfumes, tastes, gems, and large counts of animals. Duryodhana notes groups from distant lands and border peoples, emphasizing variety and magnitude, and concludes with the image of an eastern ruler entering the sacrificial hall after presenting substantial gifts. The chapter’s function is both documentary (ritual-political economy) and psychological (spectacle as a driver of rivalry).
Chapter Arc: मय-निर्मित दिव्य सभाभवन में प्रवेश करते ही दुर्योधन की दृष्टि ऐसे अद्भुत दृश्यों पर पड़ती है जिन्हें उसने न कभी देखा था, न कल्पना की थी—और उसी क्षण से उसका अहंकार परीक्षा में पड़ जाता है। → सभामध्य में स्फटिक-भूमि को जल समझकर, और जल को भूमि समझकर, वह बार-बार भ्रमित होता है; पग-पग पर ठोकरें, गिरना, रुकना—और रक्षकों/सेवकों का उपहास—उसके भीतर जलती हुई ईर्ष्या को और भड़काता है। साथ ही वह धर्मराज युधिष्ठिर की अनुपम श्री और पाण्डव-वैभव को देख-देखकर भीतर ही भीतर दग्ध होता जाता है। → सभाभवन और युधिष्ठिर की ज्वलन्त-सी राजलक्ष्मी को देखकर, तथा उपहास से आहत होकर, दुर्योधन अमर्ष से भर उठता है—उसकी बुद्धि पाप की ओर मुड़ती है और वह भीतर-ही-भीतर प्रतिशोध का संकल्प पकाने लगता है। → सभासे निकलते समय वह अकेला, अनेक विचारों से व्याकुल, अपने अपमान और पाण्डव-समृद्धि का ही चिंतन करता रहता है; अंततः वह अपने मामाश्री शकुनि से कहता है कि वह असह्य दुःख और अमर्ष से घिर गया है और धृतराष्ट्र को सब निवेदित करने की अनुमति/आज्ञा चाहता है। → शकुनि के सामने दुर्योधन का यह संताप अब एक योजना का रूप लेने को है—धृतराष्ट्र के पास यह विषाद किस रूप में पहुँचेगा: विनाशकारी द्यूत-आह्वान के रूप में या खुली शत्रुता के रूप में?
Verse 1
/ ऑपन-माज बछ। -्:डि सप्तचत्वारिशो<्ध्याय: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग- पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्टिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना वैशम्पायन उवाच वसन् दुर्योधनस्तस्यां सभायां पुरुषर्षभ । शनैर्ददर्श तां सर्वां सभां शकुनिना सह,वैशम्पायनजी कहते हैं--नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा दुर्योधनने उस सभाभवनमें निवास करते समय शकुनिके साथ धीरे-धीरे उस सारी सभाका निरीक्षण किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜନମେଜୟ! ସେହି ସଭାଭବନରେ ବସବାସ କରୁଥିବା ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଶକୁନି ସହ ଧୀରେ ଧୀରେ ସମଗ୍ର ସଭାକୁ ଚାରିଦିଗରୁ ନିରୀକ୍ଷଣ କଲେ।
Verse 2
तस्यां दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुरुनन्दन: । न दृष्टपूर्वा ये तेन नगरे नागसाह्दये,कुरुनन्दन दुर्योधन उस सभामें उन दिव्य अभिप्रायों (दृश्यों)-को देखने लगा, जिन्हें उसने हस्तिनापुरमें पहले कभी नहीं देखा था
ସେହି ଅଦ୍ଭୁତ ସଭାରେ କୁରୁନନ୍ଦନ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଏମିତି ଦିବ୍ୟ ଦୃଶ୍ୟ ଓ କୌଶଳ-ରଚିତ ଆଶ୍ଚର୍ୟ ଦେଖିଲେ, ଯାହା ସେ ନାଗସାହ୍ୱୟ (ହସ୍ତିନାପୁର) ନଗରରେ ପୂର୍ବେ କେବେ ଦେଖିନଥିଲେ।
Verse 3
स कदाचित् सभामध्ये धार्तराष्ट्री महीपति: । स्फाटिकं स्थलमासाद्य जलमित्यभिशड्कया,एक दिनकी बात है, राजा दुर्योधन उस सभाभवनमें घूमता हुआ स्फटिक-मणिमय स्थलपर जा पहुँचा और वहाँ जलकी आशंकासे उसने अपना वस्त्र ऊपर उठा लिया। इस प्रकार बुद्धिगमोह हो जानेसे उसका मन उदास हो गया और वह उस स्थानसे लौटकर सभामें दूसरी ओर चक्कर लगाने लगा
ଏକଦା ସଭାମଧ୍ୟରେ ଘୁରୁଥିବା ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ର ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସ୍ଫଟିକମଣି-ନିର୍ମିତ ଏକ ସ୍ଥଳକୁ ପହଞ୍ଚି, ତାହାକୁ ଜଳ ଭାବି ଶଙ୍କାରେ ନିଜ ବସ୍ତ୍ର ଉପରକୁ ଉଠାଇଲେ।
Verse 4
स्ववस्त्रोत्कर्षणं राजा कृतवान् बुद्धिमोहित: । दुर्मना विमुखश्वैव परिचक्राम तां सभाम्,एक दिनकी बात है, राजा दुर्योधन उस सभाभवनमें घूमता हुआ स्फटिक-मणिमय स्थलपर जा पहुँचा और वहाँ जलकी आशंकासे उसने अपना वस्त्र ऊपर उठा लिया। इस प्रकार बुद्धिगमोह हो जानेसे उसका मन उदास हो गया और वह उस स्थानसे लौटकर सभामें दूसरी ओर चक्कर लगाने लगा
ବୁଦ୍ଧିମୋହିତ ହୋଇ ରାଜା ନିଜ ବସ୍ତ୍ରକୁ ଉପରକୁ ଉଠାଇଲେ; ପରେ ମନ ଖିନ୍ନ ହୋଇ, ମୁହଁ ଫେରାଇ, ସେହି ସଭାରେ ଏଦିକ-ସେଦିକ ଘୁରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 5
ततः स्थले निपतितो दुर्मना व्रीडितो नृप: । निःश्वसन् विमुखश्चापि परिचक्राम तां सभाम्,तदनन्तर वह स्थलमें ही गिर पड़ा, इससे वह मन-ही-मन दुःखी और लज्जित हो गया तथा वहाँसे हटकर लम्बी साँसें लेता हुआ सभाभवनमें घूमने लगा
ତାପରେ ରାଜା ସେହି ସ୍ଥଳରେ ହିଁ ପଡ଼ିଗଲେ; ମନରେ ଦୁଃଖ ଓ ଲଜ୍ଜା ଭରି, ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ୁଥିବା ଏବଂ ମୁହଁ ଫେରାଇ, ସେହି ସଭାରେ ଘୁରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 6
ततः स्फाटिकतोयां वै स्फाटिकाम्बुजशोभिताम् । वापीं मत्वा स्थलमिव सवासा: प्रापतज्जले,तत्पश्चात् स्फटिकमणिके समान स्वच्छ जलसे भरी और स्फटिकमणिमय कमलोंसे सुशोभित बावलीको स्थल मानकर वह वस्त्रसहित जलमें गिर पड़ा
ତେବେ ସ୍ଫଟିକ ପରି ସ୍ୱଚ୍ଛ ଜଳରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ସ୍ଫଟିକମୟ ପଦ୍ମରେ ଶୋଭିତ ସେହି ବାପୀକୁ ଭୂମି ଭାବି, ସେ ବସ୍ତ୍ରସହିତ ଆଗକୁ ବଢ଼ି ଜଳରେ ପଡ଼ିଗଲା।
Verse 7
जले निपतितं दृष्टवा भीमसेनो महाबल: । जहास जहसुश्चैव किंकराश्न सुयोधनम्
ସୁୟୋଧନ ଜଳରେ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି ମହାବଳୀ ଭୀମସେନ ହସିପଡ଼ିଲେ ଏବଂ ‘କିଙ୍କରର ଅନ୍ନ’ ବୋଲି କହି ତାକୁ ଉପହାସ କଲେ।
Verse 8
वासांसि च शुभान्यस्मै प्रददू राजशासनात् | तथागतं तु तं दृष्टवा भीमसेनो महाबल:
ରାଜାଙ୍କ ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ ତାକୁ ଶୁଭ ଉତ୍ତମ ବସ୍ତ୍ର ଦିଆଗଲା; କିନ୍ତୁ ସେ ଏହି ଅବସ୍ଥାରେ ଆସିଥିବାକୁ ଦେଖି ମହାବଳୀ ଭୀମସେନଙ୍କ ମନ ଉତ୍ତେଜିତ ହେଲା।
Verse 9
अर्जुनश्व यमौ चोभौ सर्वे ते प्राहसंस्तदा । नामर्षयत् ततस्तेषामवहासममर्षण:
ତେବେ ଅର୍ଜୁନ ଓ ଦୁଇ ଯମଜ—ସମସ୍ତେ—ହସିପଡ଼ିଲେ; କିନ୍ତୁ ଯିଏ ଅପମାନ ସହିପାରେନି, ସେ ତାଙ୍କର ଉପହାସ ସହିଲା ନାହିଁ।
Verse 10
उसे जलमें गिरा देख महाबली भीमसेन हँसने लगे। उनके सेवकोंने भी दुर्योधनकी हँसी उड़ायी तथा राजाज्ञासे उन्होंने दुर्योधनको सुन्दर वस्त्र दिये। दुर्योधनकी यह दुरवस्था देख महाबली भीमसेन, अर्जुन और नकुल-सहदेव सभी उस समय जोर-जोरसे हँसने लगे। दुर्योधन स्वभावसे ही अमर्षशील था; अत: वह उनका उपहास न सह सका ।। आकार रक्षमाणस्तु न स तान् समुदैक्षत । पुनर्वसनमुत्त्षिप्य प्रतरिष्यन्निव स्थलम्,वह अपने चेहरेके भावको छिपाये रखनेके लिये उनकी ओर दृष्टि नहीं डालता था। फिर स्थलमें ही जलका भ्रम हो जानेसे वह कपड़े उठाकर इस प्रकार चलने लगा; मानो तैरनेकी तैयारी कर रहा हो
ମୁହଁର ଭାବ ଲୁଚାଇବାକୁ ସେ ତାଙ୍କ ଦିଗକୁ ଚାହିଲା ନାହିଁ। ପୁଣିଥରେ ଶୁଷ୍କ ଭୂମିକୁ ମଧ୍ୟ ଜଳ ଭାବି ଭ୍ରମିତ ହୋଇ, ସେ ବସ୍ତ୍ର ଉଠାଇ ଏମିତି ଚାଲିଲା ଯେନେ ତେରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ।
Verse 11
आरुरोह तत: सर्वे जहसुश्न पुनर्जना: । द्वारं तु पिहिताकारं स्फाटिकं प्रेक्ष्य भूमिप: । प्रविशन्नाहतो मूर्थ्नि व्याघूर्णित इव स्थित:
ତାପରେ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଉପରକୁ ଚଢ଼ିଲେ, ଲୋକେ ପୁଣି ହସିଲେ। ବନ୍ଦ ଭାବେ ଦେଖାଯାଉଥିବା ସ୍ଫଟିକ ଦ୍ୱାର ଦେଖି ରାଜା ପ୍ରବେଶ କରିବାକୁ ଯାଇ ମୁଣ୍ଡ ଠୋକିଲେ; ମୂର୍ଛିତ ଭଳି ଟଳମଳ କରି ସେଠାରେ ଠିଆ ହେଲେ।
Verse 12
इस प्रकार जब वह ऊपर चढ़ा, तब सब लोग उसकी भ्रान्तिपर हँसने लगे। उसके बाद राजा दुर्योधनने एक स्फटिकमणिका बना हुआ दरवाजा देखा, जो वास्तवमें बंद था, तो भी खुला दीखता था। उसमें प्रवेश करते ही उसका सिर टकरा गया और उसे चक््कर-सा आ गया ।। तादृशं च परं द्वारं स्फाटिकोरुकपाटकम् | विघटूटयन् कराभ्यां तु निष्क्रम्याग्रे पपात ह,ठीक उसी तरहका एक दूसरा दरवाजा मिला, जिसमें स्फटिकमणिके बड़े-बड़े किंवाड़ लगे थे। यद्यपि वह खुला था, तो भी दुर्योधनने उसे बंद समझकर उसपर दोनों हाथोंसे धक्का देना चाहा। किंतु धक्केसे वह स्वयं द्वारके बाहर निकलकर गिर पड़ा
ତାପରେ ସେ ଏହିପରି ଆଉ ଗୋଟିଏ ଦ୍ୱାର ପାଇଲେ, ଯେଉଁଥିରେ ବଡ଼ ବଡ଼ ସ୍ଫଟିକ ପଟ ଲାଗିଥିଲା। ଯାହା ପ୍ରକୃତରେ ଖୋଲା ଥିଲା, ତାହାକୁ ବନ୍ଦ ଭାବି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦୁଇ ହାତରେ ଧକ୍କା ଦେଲେ; ଧକ୍କାରେ ସେ ନିଜେ ଦ୍ୱାର ଟପି ବାହାରକୁ ଯାଇ ସାମ୍ନାକୁ ପଡ଼ିଲେ।
Verse 13
द्वारं तु वितताकारं समापेदे पुनश्च सः । तद्वत्तं चेति मन्वानो द्वारस्थानादुपारमत्,आगे जानेपर उसे एक बहुत बड़ा फाटक और मिला; परंतु कहीं पिछले दरवाजोंकी भाँति यहाँ भी कोई अप्रिय घटना न घटित हो इस भयसे वह उस दरवाजेके इधरसे ही लौट आया
ତାପରେ ସେ ପୁଣି ଏକ ବିଶାଳ ପ୍ରସାର ଥିବା ଫାଟକ ପାଖକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ। ପୂର୍ବ ଦ୍ୱାରମାନଙ୍କ ପରି ଏଠାରେ ମଧ୍ୟ କିଛି ଅପ୍ରିୟ ଘଟଣା ହେବ ବୋଲି ଭାବି, ସେ ଦ୍ୱାରଦେହଳିରୁ ହିଁ ରୁକି ପଛକୁ ଫେରିଗଲେ।
Verse 14
एवं प्रलम्भान् विविधानू प्राप्य तत्र विशाम्पते । पाण्डवेयाभ्यनुज्ञातस्ततो दुर्योधनो नृप:,राजन! इस प्रकार बार-बार धोखा खाकर राजा दुर्योधन राजसूय महायज्ञमें पाण्डवोंके पास आयी हुई अद्भुत समृद्धिपर दृष्टि डालकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर-की आज्ञा ले अप्रसन्न मनसे हस्तिनापुरको चला गया
ହେ ଜନପତେ! ସେଠାରେ ଏଭଳି ଭାବେ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ଅପମାନ ଓ ଭ୍ରମ ଭୋଗି, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ସେଇ ଅଦ୍ଭୁତ ସମୃଦ୍ଧି ଦେଖି, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅନୁମତି ନେଇ ଅପ୍ରସନ୍ନ ମନେ ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 15
अप्रह्ृष्टेन मनसा राजसूये महाक्रतौ । प्रेक्ष्य तामद्भुतामृद्धि जगाम गजसाह्दयम्,राजन! इस प्रकार बार-बार धोखा खाकर राजा दुर्योधन राजसूय महायज्ञमें पाण्डवोंके पास आयी हुई अद्भुत समृद्धिपर दृष्टि डालकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर-की आज्ञा ले अप्रसन्न मनसे हस्तिनापुरको चला गया
ରାଜସୂୟ ମହାକ୍ରତୁରେ ସେଇ ଅଦ୍ଭୁତ ସମୃଦ୍ଧି ଦେଖି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ମନ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲା ନାହିଁ; ଈର୍ଷ୍ୟା ଓ ଅପମାନର ଭାର ନେଇ ସେ ଗଜସାହ୍ୱୟ—ହସ୍ତିନାପୁରକୁ—ଚାଲିଗଲେ।
Verse 16
पाण्डवश्रीप्रतप्तस्य ध्यायमानस्य गच्छत: । दुर्योधनस्थ नृपते: पापा मतिरजायत,पाण्डवोंकी राजलक्ष्मीसे संतप्त हो उसीका चिन्तन करते हुए जानेवाले राजा दुर्योधनके मनमें पापपूर्ण विचारका उदय हुआ
ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀରେ ଅନ୍ତରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ, ସେହିକଥା ଚିନ୍ତା କରୁକରୁ ଯାଉଥିବା ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ମନରେ ପାପମୟ ଭାବ ଉଦୟ ହେଲା।
Verse 17
पार्थान् सुमनसो दृष्ट्वा पार्थिवांश्ष वशानुगान् । कृत्स्नं चापि हितं लोकमाकुमारं कुरूद्गह,कुरुश्रेष्ठ! यह देखकर कि कुन्तीके पुत्रोंका मन प्रसन्न है, भूमण्डलके सब नरेश उनके वशमें हैं तथा बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सारा जगत् उनका हितैषी है, इस प्रकार महात्मा पाण्डवोंकी महिमा अत्यन्त बढ़ी हुई देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनका रंग फीका पड़ गया
କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତ, ପୃଥିବୀର ରାଜମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ବଶାନୁଗତ, ଏବଂ ଶିଶୁଠାରୁ ବୃଦ୍ଧ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମଗ୍ର ଲୋକକୁ ତାଙ୍କ ହିତେଷୀ ଦେଖି, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ମୁହଁ ଫିକା ପଡ଼ିଗଲା।
Verse 18
महिमान परं चापि पाण्डवानां महात्मनाम् | दुर्योधनो धार्तराष्ट्रो विवर्ण: समपद्यत,कुरुश्रेष्ठ! यह देखकर कि कुन्तीके पुत्रोंका मन प्रसन्न है, भूमण्डलके सब नरेश उनके वशमें हैं तथा बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सारा जगत् उनका हितैषी है, इस प्रकार महात्मा पाण्डवोंकी महिमा अत्यन्त बढ़ी हुई देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनका रंग फीका पड़ गया
ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପରମ ମହିମା ଦେଖି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ବିବର୍ଣ୍ଣ ହେଲେ।
Verse 19
स तु गच्छन्ननेकाग्र: सभामेको<5न्वचिन्तयत् । श्रियं च तामनुपमां धर्मराजस्य धीमत:,रास्तेमें जाते समय वह नाना प्रकारके विचारोंसे चिन्तातुर था। वह अकेला ही परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिकी अलौकिक सभा तथा अनुपम लक्ष्मीके विषयमें सोच रहा था
ସେ ଯାଉଥିବାବେଳେ ମନ ନାନା ଚିନ୍ତାରେ ଅନେକାଗ୍ର ହୋଇଥିଲା; ଏକାକୀ ସେ ପ୍ରଜ୍ଞାବାନ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଦ୍ଭୁତ ସଭା ଓ ତାଙ୍କର ଅନୁପମ ଶ୍ରୀସମୃଦ୍ଧିକୁ ଚିନ୍ତା କରୁଥିଲା।
Verse 20
प्रमत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रो दुर्योधनस्तदा । नाभ्यभाषत् सुबलजं भाषमाणं पुन: पुन:,इस समय धूृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन उन्मत्त-सा हो रहा था। वह शकुनिके बार-बार पूछनेपर भी उसे कोई उत्तर नहीं दे रहा था
ସେ ସମୟରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ପ୍ରମତ୍ତ ଓ ଉଦ୍ବିଗ୍ନ ହୋଇପଡ଼ିଥିଲେ; ସୁବଲପୁତ୍ର ଶକୁନି ପୁନଃପୁନଃ କହିଲେ ମଧ୍ୟ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଉତ୍ତର ଦେଲେ ନାହିଁ।
Verse 21
अनेकाग्रं तु तं दृष्टवा शकुनि: प्रत्यभाषत । दुर्योधन कुतोमूलं नि:श्वसन्निव गच्छसि,उसे नाना प्रकारकी चिन्ताओंसे युक्त देख शकुनि-ने पूछा--'दुर्योधन! तुम्हें कहाँसे यह दुःखका कारण प्राप्त हो गया, जिससे तुम लंबी साँसें खींचते चल रहे हो”
ତାକୁ ନାନା ପ୍ରକାର ଚିନ୍ତାରେ ବ୍ୟାକୁଳ ଦେଖି ଶକୁନି କହିଲା—“ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! କେଉଁ ମୂଳରୁ ଏହି ଦୁଃଖ ତୋତେ ହେଲା, ଯେ ତୁ ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ି ଛାଡ଼ି ଚାଲୁଛୁ?”
Verse 22
दुर्योधन उवाच दृष्टवेमां पृथिवीं कृत्स्नां युधिष्ठिरवशानुगाम् । जितामस्त्रप्रतापेन श्वेताश्व॒स्य महात्मन:,दुर्योधनने कहा--मामाजी! मैंने देखा है, श्वेतवाहन महात्मा अर्जुनके अस्त्रोंके प्रतापसे जीती हुई यह सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके वशमें हो गयी है। महातेजस्वी युधिष्ठिरका वह राजसूययज्ञ उसी प्रकार सम्पन्न हुआ है, जैसे देवताओंमें देवराज इन्द्रका यज्ञ पूर्ण हुआ था। यह सब देखकर मैं दिन-रात ईष्यासे भरा ठीक उसी प्रकार जलता रहता हूँ, जैसे ग्रीष्म- ऋतुमें थोड़ा-ला जल जल्दी सूख जाता है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ମାମା! ଶ୍ୱେତାଶ୍ୱ-ଯୁକ୍ତ ମହାତ୍ମା ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଅସ୍ତ୍ର-ପ୍ରତାପରେ ଜିତାଯାଇଥିବା ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ବଶରେ ପଡ଼ିଛି—ମୁଁ ଦେଖିଛି।”
Verse 23
तं च यज्ञ तथाभूतं दृष्टवा पार्थस्य मातुल । यथा शक्रस्य देवेषु तथाभूतं महाद्युते:,दुर्योधनने कहा--मामाजी! मैंने देखा है, श्वेतवाहन महात्मा अर्जुनके अस्त्रोंके प्रतापसे जीती हुई यह सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके वशमें हो गयी है। महातेजस्वी युधिष्ठिरका वह राजसूययज्ञ उसी प्रकार सम्पन्न हुआ है, जैसे देवताओंमें देवराज इन्द्रका यज्ञ पूर्ण हुआ था। यह सब देखकर मैं दिन-रात ईष्यासे भरा ठीक उसी प्रकार जलता रहता हूँ, जैसे ग्रीष्म- ऋतुमें थोड़ा-ला जल जल्दी सूख जाता है
“ଏବଂ ହେ ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ମାମା! ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ଯଜ୍ଞ ଯେପରି ସମ୍ପନ୍ନ ହୁଏ, ସେପରି ମହିମାରେ ସେଇ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ମଧ୍ୟ ସମ୍ପନ୍ନ ହେଉଥିବାକୁ ମୁଁ ଦେଖିଲି।”
Verse 24
अमर्षेण तु सम्पूर्णो दहममानो दिवानिशम् । शुचिशुक्रागमे काले शुष्येत् तोयमिवाल्पकम्,दुर्योधनने कहा--मामाजी! मैंने देखा है, श्वेतवाहन महात्मा अर्जुनके अस्त्रोंके प्रतापसे जीती हुई यह सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके वशमें हो गयी है। महातेजस्वी युधिष्ठिरका वह राजसूययज्ञ उसी प्रकार सम्पन्न हुआ है, जैसे देवताओंमें देवराज इन्द्रका यज्ञ पूर्ण हुआ था। यह सब देखकर मैं दिन-रात ईष्यासे भरा ठीक उसी प्रकार जलता रहता हूँ, जैसे ग्रीष्म- ऋतुमें थोड़ा-ला जल जल्दी सूख जाता है
“ମୁଁ ଅମର୍ଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ଦିନ-ରାତି ଜଳୁଛି ଏବଂ କ୍ଷୀଣ ହେଉଛି—ଯେପରି ନିର୍ମଳ, ପ୍ରଖର ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଆସିଲେ ଅଳ୍ପ ଜଳ ମଧ୍ୟ ଶୀଘ୍ର ଶୁଷ୍କ ହୋଇଯାଏ।”
Verse 25
पश्य सात्वतमुख्येन शिशुपालो निपातित: । न च तत्र पुमानासीत् कश्चित् तस्य पदानुग:,और भी देखिये, यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णने शिशुपालको मार गिराया, परंतु वहाँ कोई भी वीर पुरुष उसका बदला लेनेको तैयार नहीं हुआ
“ଦେଖ, ସାତ୍ୱତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଶିଶୁପାଳକୁ ନିପାତ କରିଦେଲେ; କିନ୍ତୁ ସେଠାରେ ତାହାର ପଦାନୁଗାମୀ—ଅର୍ଥାତ୍ ତାଙ୍କ ପକ୍ଷ ଧରି ପ୍ରତିଶୋଧକୁ ଉଠିଦାଉ—ଏମିତି କେହି ପୁରୁଷ ଥିଲେ ନାହିଁ।”
Verse 26
दहामाना हि राजान: पाण्डवोत्थेन वल्नलिना । क्षान्तवन्तो5पराध॑ ते को हि तत् क्षन्तुमहति,पाण्डवजनित आगसे दग्ध होनेवाले राजाओंने वह अपराध क्षमा कर दिया। अन्यथा इतने बड़े अन्यायको कौन सह सकता है?
ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ନେଇ ଉଦ୍ଭୂତ ଅଗ୍ନିରେ ଦଗ୍ଧ ହେଉଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ରାଜାମାନେ ସେଇ ଅପରାଧକୁ କ୍ଷମା କରିଦେଲେ; ନଚେତ୍ ପାଣ୍ଡବଜନିତ ଦୋଷରୁ ଘଟିଥିବା ଏତେ ବଡ଼ ଅନ୍ୟାୟକୁ କିଏ ସହି—କ୍ଷମା—କରିପାରିବ?
Verse 27
वासुदेवेन तत् कर्म यथायुक्त महत् कृतम् । सिद्ध च पाण्डुपुत्राणां प्रतापेन महात्मनाम्,वासुदेव श्रीकृष्णने जैसा महान् अनुचित कर्म किया था, वह महामना पाण्डवोंके प्रतापसे सफल हो गया
ବାସୁଦେବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ‘ଯଥାଯୁକ୍ତ’ ବୋଲି ଭାବି ଯେ ମହାକାର୍ଯ୍ୟ କଲେ—ଯାହା ପ୍ରକୃତରେ ଅନୁଚିତ—ତାହା ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପ୍ରତାପରେ ସିଦ୍ଧ ହେଲା।
Verse 28
तथा हि रत्नान्यादाय विविधानि नृपा नृपम् | उपातिष्ठन्त कौन्तेयं वैश्या इव करप्रदा:,जैसे कर देनेवाले व्यापारी वैश्य नाना प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर राजाकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार सब राजा अनेक प्रकारके उत्तम रत्न लेकर राजा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हुए थे
ଯେପରି କରଦାତା ବୈଶ୍ୟ ବ୍ୟାପାରୀମାନେ ନାନାପ୍ରକାର ରତ୍ନଧନ ନେଇ ରାଜସେବାକୁ ଉପସ୍ଥିତ ହୁଅନ୍ତି, ସେପରି ସମସ୍ତ ରାଜା ଅନେକ ଉତ୍ତମ ରତ୍ନ ନେଇ କୌନ୍ତେୟ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ।
Verse 29
श्रियं तथा55गतां दृष्टवा ज्वलन्तीमिव पाण्डवे । अमर्षवशमापन्नो दह्मामि न तथोचित:,पाणए्डुपुत्र युधिष्ठिरके समीप प्राप्त हुई उस प्रकाश-मयी लक्ष्मीको देखकर मैं ईरष्यावश जल रहा हूँ। यद्यपि मेरी यह दुरवस्था उचित नहीं है
ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚିଥିବା ସେଇ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଶ୍ରୀକୁ ଦେଖି, ମୁଁ ଅସହ୍ୟ ଈର୍ଷ୍ୟାର ବଶରେ ପଡ଼ି ଭିତରେ ଭିତରେ ଜଳୁଛି; ତଥାପି ମୋର ଏହି ଅବସ୍ଥା ଯଥୋଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 30
एवं स निश्चयं कृत्वा ततो वचनमत्रवीत् । पुनर्गान््धारनृपतिं दहुमान इवाग्निना,ऐसा निश्चय करके दुर्योधन चिन्ताकी आगसे दग्ध-सा होता हुआ पुनः गान्धारराज शकुनिसे बोला
ଏପରି ନିଶ୍ଚୟ କରି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଚିନ୍ତାର ଅଗ୍ନିରେ ଦଗ୍ଧ ହେଉଥିବା ପରି, ପୁନଃ ଗାନ୍ଧାରରାଜ ଶକୁନିଙ୍କୁ କହିଲା।
Verse 31
वल्लिमेव प्रवेक्ष्यामि भक्षयिष्यामि वा विषम् | अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम्,मैं आगमें प्रवेश कर जाऊँगा, विष खा लूँगा अथवा जलमें डूब मरूँगा, अब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा
ମୁଁ ଅଗ୍ନିରେ ପ୍ରବେଶ କରିବି, କିମ୍ବା ବିଷ ଖାଇବି, ଅଥବା ଜଳରେ ପଡ଼ି ଡୁବି ମରିବି; ଏବେ ମୁଁ ବଞ୍ଚି ପାରିବି ନାହିଁ।
Verse 32
को हि नाम पुमॉल्लोके मर्षयिष्यति सत्त्ववान् । सपत्नानृद्धयतो दृष्टवा हीनमात्मानमेव च,संसारमें कौन ऐसा शक्तिशाली पुरुष होगा, जो शत्रुओंकी वृद्धि और अपनी हीन दशा होती देखकर भी चुपचाप सहन कर लेगा
ଏହି ସଂସାରରେ ସତ୍ତ୍ୱବାନ କେଉଁ ପୁରୁଷ, ସପତ୍ନମାନଙ୍କର ବୃଦ୍ଧି ଓ ନିଜର ହୀନ ଅବସ୍ଥା ଦେଖି ମଧ୍ୟ ନିରବରେ ସହିପାରିବ?
Verse 33
सोऊहं न स्त्री न चाप्यस्त्री न पुमान्नापुमानपि । योऊहं तां मर्षयाम्यद्य तादृशीं श्रियमागताम्,मैं इस समय न तो स्त्री हूँ, न अस्त्रबलसे सम्पन्न हूँ, न पुरुष हूँ और न नपुंसक ही हूँ, तो भी अपने शत्रुओंके पास आयी हुई वैसी उत्कृष्ट सम्पत्तिको देखकर भी चुपचाप सहन कर रहा हूँ?
ମୁଁ ଏବେ ନ ସ୍ତ୍ରୀ, ନ ନିରସ୍ତ୍ର, ନ ପୁରୁଷ, ନ ନପୁଂସକ—ତଥାପି ଆଜି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଥିବା ସେହି ଅତ୍ୟୁତ୍ତମ ଶ୍ରୀକୁ ଦେଖି ନିରବରେ ସହୁଛି!
Verse 34
ईश्वरत्वं पृथिव्याश्व॒ वसुमत्तां च तादृशीम् । यज्ञं च तादृशं दृष्टवा मादृश: को न संज्वरेत्,शत्रुओंके पास समस्त भूमण्डलका वह साम्राज्य, वैसी धन-रत्नोंसे भरी सम्पदा और उनका वैसा उत्कृष्ट राजसूययज्ञ देखकर मेरे-जैसा कौन पुरुष चिन्तित न होगा?
ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଖରେ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀର ଏମିତି ଐଶ୍ୱର୍ଯ୍ୟ, ଧନ-ରତ୍ନରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏମିତି ସମ୍ପଦା ଓ ଏମିତି ମହାଯଜ୍ଞ ଦେଖି ମୋ ପରି କିଏ ଉଦ୍ବିଗ୍ନ ହେବ ନାହିଁ?
Verse 35
अशक्तश्नैक एवाहं तामाहर्तु नृपश्रियम् । सहायांश्व न पश्यामि तेन मृत्युं विचिन्तये,मैं अकेला उस राजलक्ष्मीको हड़प लेनेमें असमर्थ हूँ और अपने पास योग्य सहायक नहीं देखता हूँ, इसीलिये मृत्युका चिन्तन करता हूँ
ମୁଁ ଏକା ହୋଇ ସେହି ରାଜଶ୍ରୀକୁ ହରଣ କରିବାରେ ଅଶକ୍ତ, ଏବଂ ଯୋଗ୍ୟ ସହାୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁନାହିଁ; ତେଣୁ ମୁଁ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଚିନ୍ତା କରୁଛି।
Verse 36
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम् | दृष्टवा कुन्तीसुते शुद्धां श्रियं तामहतां तथा,कुन्तीपुत्र युधिष्ठिके पास उस अक्षय विशुद्ध लक्ष्मीका संचय देख मैं दैवको ही प्रबल मानता हूँ, पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— ମୁଁ ଦୈବକୁ ହିଁ ପରମ ମନେ କରେ, ଏବଂ ପୁରୁଷାର୍ଥକୁ ନିରର୍ଥକ। କାରଣ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ନିକଟରେ ମୁଁ ସେଇ ଶୁଦ୍ଧ, ଅଜେୟ, ଅକ୍ଷୟ ଲକ୍ଷ୍ମୀର ସଞ୍ଚୟ ଦେଖିଛି—ଯାହାକୁ କେହି କ୍ଷୟ କରିପାରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 37
कृतो यत्नो मया पूर्व विनाशे तस्यथ सौबल । तच्च सर्वमतिक्रम्य संवृद्धो5प्स्विव पड़कजम्,सुबलपुत्र! मैंने पहले धर्मराज युधिष्ठिरको नष्ट कर देनेका प्रयत्न किया था, किंतु उन सारे संकटोंको लाँध करके वे जलमें कमलकी भाँति उत्तरोत्तर बढ़ते गये
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— ହେ ସୌବଲ! ପୂର୍ବେ ମୁଁ ତାହାର ବିନାଶ ପାଇଁ ବହୁତ ଯତ୍ନ କରିଥିଲି; କିନ୍ତୁ ସେ ସମସ୍ତ ବିପଦକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ଜଳରେ ପଦ୍ମ ପରି ସେ ଉତ୍ତରୋତ୍ତର ବଢ଼ିଗଲା।
Verse 38
तेन दैवं परं मनन््ये पौरुषं च निरर्थकम् | धार्तराष्ट्राश्न॒ हीयन्ते पार्था वर्धन्ति नित्यश:,इसीसे मैं दैवको उत्तम मानता हूँ और पुरुषार्थको निरर्थक; क्योंकि हम धृतराष्ट्रपुत्र हानि उठा रहे हैं और ये कुन्तीके पुत्र प्रतिदिन उन्नति करते जा रहे हैं
ଏହି କାରଣରୁ ମୁଁ ଦୈବକୁ ହିଁ ପରମ ମନେ କରେ ଏବଂ ପୁରୁଷାର୍ଥକୁ ନିରର୍ଥକ; କାରଣ ଆମେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନେ ହ୍ରାସ ପାଉଛୁ, ଆଉ ପାର୍ଥମାନେ ନିତ୍ୟ ଉନ୍ନତି କରୁଛନ୍ତି।
Verse 39
सोहहं श्रियं च तां दृष्टवा सभां तां च तथाविधाम् | रक्षिभिश्षावहासं तं॑ परितप्ये यथाग्निना,मैं उस राजलक्ष्मीको, उस दिव्य सभाको तथा रक्षकोंद्वारा किये गये अपने उपहासको देखकर निरन्तर संतप्त हो रहा हूँ, मानो आगमें जलता होऊँ
ସେଇ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀକୁ ଓ ସେଇ ଅଦ୍ଭୁତ ସଭାକୁ ଦେଖି, ରକ୍ଷକମାନେ କରିଥିବା ମୋର ଉପହାସକୁ ସ୍ମରଣ କରି, ମୁଁ ନିରନ୍ତର ଦହିଯାଉଛି—ଯେନେ ଅଗ୍ନିରେ ଜଳୁଛି।
Verse 40
स मामभ्यनुजानीहि मातुलाद्य सुदुःखितम् | अमर्ष च समाविष्टं धृतराष्ट्रे निवेदय,मामाजी! अब मुझे (मरनेके लिये) आज्ञा दीजिये, क्योंकि मैं बहुत दुःखी हूँ और ईर्ष्यकी आगमें जल रहा हूँ। महाराज धृतराष्ट्रको मेरी यह अवस्था सूचित कर दीजियेगा
ହେ ମାତୁଳ! ଆଜି ମୋତେ ଅନୁମତି ଦିଅ। ମୁଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖିତ, ଅସହ୍ୟ ଅମର୍ଷରେ ଆବିଷ୍ଟ। ମୋର ଏହି ଅବସ୍ଥା ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ନିବେଦନ କର।
Verse 47
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे सप्तचत्वारिंशो 5ध्याय: ।। ४७ || इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापरववके अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ-ସନ୍ତାପବିଷୟକ ସତଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The tension between legitimate prosperity (earned through alliance, governance, and ritual order) and the corrosive reinterpretation of that prosperity as a threat—where perception and envy can override fair judgment and restraint.
Institutional legitimacy is not only moral intent but also visible administrative competence; however, spectacle without inner discipline can provoke status anxiety, making political stability contingent on ethical self-governance.
No explicit phalaśruti is presented here; the chapter operates as narrative documentation and psychological framing within the Rājasūya context rather than as a standalone soteriological instruction.