
Śiśupāla-vadha in the Rājasūya-sabhā (शिशुपालवधः — राजसूयसभायाम्)
Upa-parva: Rājasūya Parva (Rājasūya-yajña episode within Sabhā Parva)
Vaiśaṃpāyana narrates an escalation in the Rājasūya assembly: Śiśupāla (Cedi king) challenges Vāsudeva-Kṛṣṇa and issues a direct summons to strategic combat, extending hostility toward the Pāṇḍavas. Kṛṣṇa responds in measured speech before the gathered kings, presenting a structured indictment: prior acts of aggression, abduction, and disruption attributed to Śiśupāla are cited as grounds for non-tolerance of present insolence in a public forum. After further provocation, Kṛṣṇa employs the discus (cakra) to neutralize Śiśupāla; observers report a luminous essence rising from the fallen king and entering Kṛṣṇa, interpreted by the assembly as extraordinary. The narrative then shifts to restoration and closure: the Cedi succession is regularized by installing Śiśupāla’s son, the Rājasūya proceeds to completion under protection, and the visiting kings depart with formal courtesies. Kṛṣṇa takes leave for Dvārakā, offering counsel to Yudhiṣṭhira on vigilant kingship and protection of subjects.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की सभा में शिशुपाल, कृष्ण पर जरासंध-वध के प्रसंग को लेकर ‘छल’ और ‘नीच कर्म’ का आरोप लगाता है, और राजाओं के सामने यदुवीर की कीर्ति को कलंकित करने का प्रयत्न करता है। → शिशुपाल बार-बार कृष्ण, भीम और अर्जुन के गुप्त प्रवेश, ब्राह्मण-वेष, और ‘अद्वारेण प्रविष्ट’ होने जैसी बातों को उछालकर सभा को उत्तेजित करता है। यह कटु वाणी सुनकर भीमसेन का रक्त खौल उठता है; उनकी कमल-सी आँखें क्रोध से लाल हो जाती हैं, भौंहों पर त्रिरेखाएँ उभरती हैं, और समस्त नरेश उनके उग्र रूप को देख सिहर उठते हैं। → भीमसेन, शिशुपाल को दंड देने के लिए उछल पड़ते हैं और भीष्म से कहते हैं कि इसे छोड़ दिया जाए ताकि सब राजा देखें—यह शिशुपाल मेरे तेज से ऐसे भस्म होगा जैसे पतंगा अग्नि से। सभा में क्षण भर को हिंसा का तूफान उठने लगता है। → कुरुकुल-तिलक भीष्म, स्थिति की गंभीरता समझकर भीम को रोकते हैं—सभा-धर्म, यज्ञ-धर्म और राजाओं की मर्यादा की रक्षा हेतु वे क्रोध को शमन करने का उपदेश देते हैं और तत्काल दंड की जगह संयम का मार्ग दिखाते हैं। → भीम का क्रोध दब तो जाता है, पर शिशुपाल की अपमानजनक वाणी का विष सभा में बना रहता है—आगे यह अपमान किसके हाथों और किस विधि से निर्णीत होगा, यह प्रश्न हवा में लटकता है।
Verse 1
अप्-#-रा+ द्विचत्वारिशोड ध्याय: शिशुपालकी बातोंपर भीमसेनका क्रोध और भीष्मजीका उन्हें शान्त करना शिशुपाल उवाच स मे बहुमतो राजा जरासंधो महाबल: । योडनेन युद्ध नेयेष दासो5यमिति संयुगे,शिशुपाल बोला--महाबली राजा जरासंध मेरे लिये बड़े ही सम्माननीय थे। वे कृष्णको दास समझकर इसके साथ युद्धमें लड़ना ही नहीं चाहते थे
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ମୋ ପାଇଁ ମହାବଳୀ ରାଜା ଜରାସନ୍ଧ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସମ୍ମାନନୀୟ ଥିଲେ। ଯୁଦ୍ଧରେ ‘ଏ ତ ଦାସ’ ବୋଲି ଭାବି ସେ ଏହା ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଚାହିଲେ ନାହିଁ।
Verse 2
केशवेन कृतं कर्म जरासंधवधे तदा । भीमसेनार्जुनाभ्यां च कस्तत् साध्विति मन्यते,तब इस केशवने जरासंधके वधके लिये भीमसेन और अर्जुनको साथ लेकर जो नीच कर्म किया है, उसे कौन अच्छा मान सकता है?
ସେତେବେଳେ ଜରାସନ୍ଧବଧ ପାଇଁ କେଶବ ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ସାଥି କରି ଯେ କର୍ମ କଲେ, ତାହାକୁ କିଏ ସାଧୁ—ଧର୍ମସମ୍ମତ—ବୋଲି ମାନିବ?
Verse 3
अद्वारेण प्रविष्टेन छद्मना ब्रह्म॒वादिना | दृष्ट: प्रभाव: कृष्णेन जरासंधस्य भूपते:,पहले तो (चैत्यकगिरिके शिखरको तोड़कर) बिना दरवाजेके ही इसने नगरमें प्रवेश किया। उसपर भी छटद्वावेष बना लिया और अपनेको ब्राह्मण प्रसिद्ध कर दिया। इस प्रकार इस कृष्णने भूपाल जरासंधका प्रभाव देखा
ସେ ଦ୍ୱାର ଦେଇ ନୁହେଁ, ଭେଦ କରି ନଗରେ ପ୍ରବେଶ କଲା; ପରେ ଛଦ୍ମବେଶ ଧାରଣ କରି ବ୍ରାହ୍ମଣ ଭାବେ ରହି ଏହି କୃଷ୍ଣ ରାଜା ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ପ୍ରଭାବ-ପ୍ରତାପ ଦେଖିଲା।
Verse 4
येन धर्मात्मना5>त्मानं ब्रह्मण्यमविजानता । नेषितं पाद्यमस्मै तद् दातुमग्रे दुरात्मने,उस धर्मात्मा जरासंधने जब इस दुरात्माके आगे ब्राह्मण अतिथिके योग्य पाद्य आदि प्रस्तुत किये, तब इसने यह जानकर कि मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, उसे ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं की
ସେ ଧର୍ମାତ୍ମା ମୋତେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଅତିଥି ବୋଲି ନ ଜାଣି, ଏହି ଦୁରାତ୍ମାକୁ ଆରମ୍ଭରୁ ଦେବାକୁ ଥିବା ପାଦ୍ୟାଦି (ଅତିଥିସତ୍କାର) ଦେଲେ ନାହିଁ।
Verse 5
भुज्यतामिति तेनोक्ता: कृष्णभीमधनंजया: । जरासंधेन कौरव्य कृष्णेन विकृतं कृतम्,कौरव्य भीष्म! तत्पश्चात् जब उन्होंने कृष्ण, भीम और अर्जुन तीनोंसे भोजन करनेका आग्रह किया, तब इस कृष्णने ही उसका निषेध किया था
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—କୌରବ୍ୟ ଭୀଷ୍ମ! ଯେତେବେଳେ ଜରାସନ୍ଧ ‘କୃଷ୍ଣ, ଭୀମ ଓ ଧନଞ୍ଜୟ ଭୋଜନ କରନ୍ତୁ’ ବୋଲି ଆମନ୍ତ୍ରଣ କଲା, ସେତେବେଳେ ସେଇ କୃଷ୍ଣ ହିଁ ସେ ବ୍ୟବସ୍ଥାକୁ ଅଟକାଇଲା। କୌରବ୍ୟ ଭୀଷ୍ମ! ଯାହା କରାଯାଉଥିଲା, କୃଷ୍ଣ ତାହାକୁ ବିକୃତ କରିଦେଲା।
Verse 6
यद्ययं जगत: कर्ता यथैनं मूर्ख मन्यसे । कमस्मान्न ब्राह्मणं सम्यगात्मानमवगच्छति,मूर्ख भीष्म! यदि यह कृष्ण सम्पूर्ण जगत्का कर्ता-धर्ता है, जैसा कि तुम इसे मानते हो तो यह अपनेको भलीभाति ब्राह्मण भी क्यों नहीं मानता?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ମୂର୍ଖ ଭୀଷ୍ମ! ତୁମେ ଯେପରି ମୂଢତାରେ ଭାବୁଛ, ଯଦି ଏହି କୃଷ୍ଣ ସମଗ୍ର ଜଗତର କର୍ତ୍ତା-ଧର୍ତ୍ତା, ତେବେ ସେ ନିଜକୁ ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ବୋଲି କାହିଁକି ଜାଣେ ନାହିଁ?
Verse 7
इदं त्वाश्वर्यभूतं मे यदिमे पाण्डवास्त्वया । अपकृष्टा: सतां मार्गान्मन्यन्ते तच्च साधथ्विति,मुझे सबसे बढ़कर आश्वर्यकी बात तो यह जान पड़ती है कि ये पाण्डव भी तुम्हारे द्वारा सन्मार्गसे दूर हटा दिये गये हैं; इसलिये ये भी कृष्णके इस कार्यको ठीक समझते हैं
ମୋ ପାଇଁ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ଏହି—ଏହି ପାଣ୍ଡବମାନେ ତୁମ ଦ୍ୱାରା ସତ୍ଜନଙ୍କ ମାର୍ଗରୁ ଅପକୃଷ୍ଟ ହୋଇ, କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଏହି କର୍ମକୁ ମଧ୍ୟ ଯଥୋଚିତ ଓ ପ୍ରଶଂସନୀୟ ବୋଲି ମାନୁଛନ୍ତି।
Verse 8
अथ वा नैतदाश्षर्य येषां त्वमसि भारत । स्त्रीसधर्मा च वृद्धश्न सर्वार्थानां प्रदर्शक:,अथवा भारत! स्त्रीके समान धर्मवाले (नपुंसक) और बूढ़े तुम-जैसे लोग जिनके सभी कार्योमें पथ-प्रदर्शन करते हैं, उनका ऐसा समझना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है
କିମ୍ବା, ହେ ଭାରତ! ଏଥିରେ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ କ’ଣ? ଯାହାଙ୍କ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟରେ ତୁମ ପରି (ମୋ ଅଭିଯୋଗ ଅନୁସାରେ) ସ୍ତ୍ରୀସଦୃଶ ସ୍ୱଭାବବାନ୍ ଓ ବୃଦ୍ଧ ଲୋକ ମାର୍ଗଦର୍ଶକ, ସେମାନଙ୍କର ଏପରି ବିଚାର ସ୍ୱାଭାବିକ।
Verse 9
वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचन श्रुत्वा रूक्ष॑ रूक्षाक्षरं बहु | चुकोप बलिनां श्रेष्ठो भीमसेन: प्रतापवान्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शिशुपालकी बातें बड़ी रूखी थीं। उनका एक- एक अक्षर कटुतासे भरा हुआ था। उन्हें सुनकर बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रतापी भीमसेन क्रोधाग्निसे जल उठे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତାହାର ସେଇ କଥା ଶୁଣି, ଯାହା ଅତ୍ୟନ୍ତ ରୂକ୍ଷ ଓ ଅନେକ କଟୁ ଅକ୍ଷରରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା, ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିଉଠିଲେ।
Verse 10
तथा पद्मप्रतीकाशे स्वभावायतविस्तृते । भूय: क्रोधाभिताम्राक्षे रक्ते नेत्रे बभूवतु:,उनकी आँखें स्वभावत: बड़ी-बड़ी और कमलके समान सुन्दर थीं। वे क्रोधके कारण अधिक लाल हो गयीं; मानो उनमें खून उतर आया हो
ତାଙ୍କର ଆଖି ସ୍ୱଭାବତଃ ବଡ଼, ବିସ୍ତୃତ ଓ ପଦ୍ମପତ୍ର ସଦୃଶ ସୁନ୍ଦର ଥିଲା; କିନ୍ତୁ କ୍ରୋଧରେ ସେଗୁଡ଼ିକ ଆହୁରି ଜ୍ୱଳି ଉଠିଲା—ଲାଲ ହୋଇଗଲା, ଯେପରି ତାହାରେ ରକ୍ତ ଚଢ଼ିଆସିଥାଏ।
Verse 11
त्रिशिखां भ्रुकु्टी चास्य ददृशु: सर्वपार्थिवा: । ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गड़ां त्रिपथगामिव,सब राजाओंने देखा, उनके ललाटमें तीन रेखाओंसे युक्त भ्रुकुटी तन गयी है; मानो त्रिकूटपर्वतपर त्रिपथगामिनी गंगा लहरा उठी हों
ସମସ୍ତ ରାଜା ଦେଖିଲେ—ତାଙ୍କର ଲଲାଟରେ ତିନି ରେଖାଯୁକ୍ତ ଭୃକୁଟି ଟାଣି ହୋଇଉଠିଲା; ଯେପରି ତ୍ରିକୂଟ ପର୍ବତରେ ତ୍ରିପଥଗାମିନୀ ଗଙ୍ଗା ତରଙ୍ଗିତ ହୋଇଉଠେ।
Verse 12
दन्तान् संदशतस्तस्य कोपादू ददृशुराननम् | युगान्ते सर्वभूतानि कालस्येव जिघत्सत:,वे दाँतोंसे दाँत पीसने लगे, रोषकी अधिकतासे उनका मुख ऐसा भयंकर दिखायी देने लगा; मानो प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको निगल जानेकी इच्छावाला विकराल काल ही प्रकट हो गया हो
ସେ ଦାନ୍ତ ଚେପି ଘଷିଲେ; କ୍ରୋଧର ତୀବ୍ରତାରେ ତାଙ୍କର ମୁହଁ ଭୟଙ୍କର ଦେଖାଗଲା—ଯେପରି ଯୁଗାନ୍ତରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀକୁ ଗିଳିବାକୁ ଉତ୍ସୁକ ବିକରାଳ କାଳ ନିଜେ ପ୍ରକଟ ହୋଇଯାଇଛି।
Verse 13
उत्पतन्तं तु वेगेन जग्राहैनं मनस्विनम् । भीष्म एव महाबाहुर्महासेनमिवेश्वर:,वे उछलकर शिशुपालके पास पहुँचना ही चाहते थे कि महाबाहु भीष्मने बड़े वेगसे उठकर उन मनस्वी भीमको पकड़ लिया, मानो महेश्वरने कार्तिकेियको रोक लिया हो
ଭୀମ ମହାବେଗରେ ଉଛଳି ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ଦିଗକୁ ଧାଇଯିବାକୁ ଯେତେବେଳେ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ, ସେତେବେଳେ ମହାବାହୁ ଭୀଷ୍ମ ଉଠି ସେଇ ମନସ୍ବୀ ବୀରଙ୍କୁ ଧରି ରୋକିଲେ—ଯେପରି ମହେଶ୍ୱର ମହାସେନ (କାର୍ତ୍ତିକେୟ)ଙ୍କୁ ନିବାରିଥିଲେ।
Verse 14
तस्य भीमस्य भीष्मेण वार्यमाणस्य भारत । गुरुणा विविधैर्वाक्यै: क्रोध: प्रशममागत:,भारत! पितामह भीष्मके द्वारा अनेक प्रकारकी बातें कहकर रोके जानेपर भीमसेनका क्रोध शान्त हो गया
ହେ ଭାରତ! ଗୁରୁସ୍ୱରୂପ ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ବାକ୍ୟରେ ରୋକିଦେବାରୁ, ଭୀମସେନଙ୍କ କ୍ରୋଧ ଶମି ଶାନ୍ତ ହେଲା।
Verse 15
नातिचक्राम भीष्मस्य स हि वाक्यमरिंदम: । समुदवृत्तो घनापाये वेलामिव महोदधि:,शत्रुदमन भीम भीष्मजीकी आज्ञाका उल्लंघन उसी प्रकार न कर सके, जैसे वर्षकि अन्तमें उमड़ा हुआ होनेपर भी महासागर अपनी तटभूमिसे आगे नहीं बढ़ता है
ଶତ୍ରୁଦମନ ଭୀମ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଆଜ୍ଞାକୁ ଅତିକ୍ରମ କଲେ ନାହିଁ; ବର୍ଷାଋତୁର ଶେଷରେ ସମୁଦ୍ର ଫୁଲିଉଠିଲେ ମଧ୍ୟ ମହାସାଗର ନିଜ ତଟସୀମା ଛାଡ଼େ ନାହିଁ।
Verse 16
शिशुपालस्तु संक्रुद्धे भीमसेने जनाधिप । नाकम्पत तदा वीर: पौरुषे स्वे व्यवस्थित:,राजन! भीमसेनके कुपित होनेपर भी वीर शिशुपाल भयभीत नहीं हुआ। उसे अपने पुरुषार्थका पूरा भरोसा था
ହେ ରାଜନ୍! ଭୀମସେନ କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ବୀର ଶିଶୁପାଳ କମ୍ପିଲେ ନାହିଁ; ନିଜ ପୌରୁଷରେ ଦୃଢ଼ ହୋଇ ଅଚଳ ରହିଲେ।
Verse 17
उत्पतन्तं तु वेगेन पुन: पुनररिंदम: । नस तं॑ चिन्तयामास सिंह: क्रुद्धो मृगं यथा,भीमको बार-बार वेगसे उछलते देख शत्रुदमन शिशुपालने उनकी कुछ भी परवाह नहीं की, जैसे क्रोधमें भरा हुआ सिंह मृगको कुछ भी नहीं समझता
ଭୀମ ବେଗରେ ପୁନଃପୁନଃ ଉଛଳୁଥିବାକୁ ଦେଖିଲେ ମଧ୍ୟ ଶତ୍ରୁଦମନ ଶିଶୁପାଳ ତାଙ୍କୁ କିଛିମାତ୍ର ଗଣନା କଲେ ନାହିଁ; ଯେପରି କ୍ରୋଧିତ ସିଂହ ମୃଗକୁ ଗଣେ ନାହିଁ।
Verse 18
प्रहसंश्षाब्रवीद् वाक््यं चेदिराज: प्रतापवान् । भीमसेनमभिक्रुद्धं दृष्टयवा भीमपराक्रमम्,उस समय भयानक पराक्रमी भीमसेनको कुपित देख प्रतापी चेदिराज हँसते हुए बोला --
ସେତେବେଳେ ଭୟଙ୍କର ପରାକ୍ରମୀ ଭୀମସେନ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇଥିବାକୁ ଦେଖି ପ୍ରତାପୀ ଚେଦିରାଜ ହସିହସି କହିଲେ।
Verse 19
मुज्चैनं भीष्म पश्यन्तु यावदेनं नराधिपा: । मत्प्रभावविनिर्दग्ध॑ पतड़मिव वल्निना,'भीष्म! छोड़ दो इसे, ये सभी राजा देख लें कि यह भीम मेरे प्रभावसे उसी प्रकार दग्ध हो जायगा जैसे फतिंगा आगके पास जाते ही भस्म हो जाता है”
“ଭୀଷ୍ମ! ଏହାକୁ ଛାଡ଼ିଦିଅ, ଯେପରି ଏହି ସମସ୍ତ ରାଜା ଦେଖନ୍ତୁ। ମୋ ପ୍ରଭାବରେ ଏ ଅଗ୍ନିକୁ ଧାଇଯାଉଥିବା ପତଙ୍ଗ ପରି ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ନଶିଯିବ।”
Verse 20
ततश्रैदिपतेर्वाक्यं श्रुत्वा तत् कुरुसत्तम: । भीमसेनमुवाचेदं भीष्मो मतिमतां वर:,तब चेदिराजकी वह बात सुनकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुरुकुलतिलक भीष्मने भीमसे यह कहा
ଚେଦିରାଜଙ୍କ କଥା ଶୁଣି, କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭୀଷ୍ମ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଏହିପରି କହିଲେ।
Verse 42
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि भीमक्रोधे द्विचत्वारिंशो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापवके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें भीमक्रोधविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଶିଶୁପାଳବଧପର୍ବରେ ଭୀମକ୍ରୋଧ-ବିଷୟକ ବୟାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
How to balance restraint in speech and action with the duty to prevent disruption and intimidation in a public, multi-king assembly—especially when ritual order and political legitimacy are at stake.
Legitimacy in governance is sustained by accountable reasoning (publicly stated grounds) followed by proportionate enforcement that restores order, protects communal proceedings, and regularizes succession rather than prolonging disorder.
Yes: the reported radiance rising from Śiśupāla and entering Kṛṣṇa is presented as an interpretive sign to the witnesses, marking the event as more than a political outcome and inviting theological-philosophical reflection within the epic’s narrative register.