
Śiśupāla-janma-lakṣaṇaṃ (Śiśupāla’s birth marks and the prophecy of his end)
Upa-parva: Śiśupāla-upākhyāna (Legend of Śiśupāla within Sabhā-parva)
Bhīṣma describes Śiśupāla’s birth in the Cedi royal line with anomalous features: three eyes and four arms, accompanied by braying-like cries. His parents and kin react with fear and consider abandonment, but a disembodied voice instructs the king to protect the child, declaring him fortunate and powerful, and clarifying that his death is not imminent; rather, his slayer has already been born. The mother requests further specificity, and the voice provides a recognition test: when the child is placed on someone’s lap, his extra arms will fall away and the third eye will recede; the person for whom these signs occur will be his eventual killer. Many kings attempt the test without result. Later, Saṃkarṣaṇa (Balarāma) and Janārdana (Kṛṣṇa) arrive in Cedi; when the child is placed on Kṛṣṇa’s lap, the signs resolve, confirming the prophecy. Alarmed, the mother petitions Kṛṣṇa for a boon of protection; Kṛṣṇa grants conditional forbearance—he will forgive a hundred offenses of Śiśupāla—thereby establishing a measured ethic of restraint. Bhīṣma concludes by characterizing Śiśupāla as morally errant and emboldened by this boon, actively challenging Kṛṣṇa.
Chapter Arc: शिशुपाल-वध के बाद सभा में राजाओं का “महान् नृपतिसागर” रोष से उफन पड़ता है; युधिष्ठिर उस चंचल क्रोध-समुद्र को देखकर भीष्म से मार्ग पूछते हैं। → युधिष्ठिर कहते हैं—“पितामह! ऐसा उपाय बताइए कि यज्ञ में विघ्न न पड़े, प्रजा का हित हो, और यह सभा सर्वत्र शान्त हो।” भीष्म स्थिति की जड़ बताते हैं: कृष्ण के प्रति अज्ञानजन्य उन्माद, और शिशुपाल के भीतर स्थित तेज का रहस्य। → भीष्म का निर्णायक कथन—कृष्ण ‘सुप्त सिंह’ नहीं, जगत् के प्रभव और निधन हैं; लोग उन्हें न समझकर कुत्तों की तरह सिंह के निकट भौंक रहे हैं, और शिशुपाल का तेज स्वयं भगवान् में लीन होने को था। → भीष्म की रूक्ष परन्तु हितकारी वाणी से युधिष्ठिर को धर्मसम्मत दिशा मिलती है: यज्ञ-शान्ति का आधार कृष्ण-तत्त्व की स्वीकृति और सभा का संयम है, न कि प्रतिशोध या पक्षपात। → चेदिराज (शिशुपाल-पक्ष) भीष्म के कठोर शब्द सुनकर भीतर-ही-भीतर खौल उठता है—सभा की शान्ति टिकेगी या नया विरोध भड़केगा?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापव॑के अन्तर्गत अर्घाभिद्दरणपर्वमें रुजाओंकी मन्त्रणाविषयक उनन््तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३९ ॥। ऑपन-माज बक। डे (शिशुपालवधपर्व) चत्वारिशो< ध्याय: युधिष्ठिरकी चिन्ता और भीष्मजीका उन्हें सान्त्वना देना वैशम्पायन उवाच तत: सागरसंकाशं दृष्टवा नृपतिमण्डलम् । संवर्तवाताभिह्ठतं भीम॑ क्षुब्धमिवार्णवम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर प्रलयकालीन महावायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हुए भयंकर महासागरकी भाँति राजाओंके उस समुदायको क्रोधसे चंचल हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीसे उसी प्रकार बोले, जैसे शत्रुहन्ता महातेजस्वी इन्द्र बृहस्पतिजीसे कोई बात पूछते हैं--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାପରେ ନୃପମଣ୍ଡଳକୁ ଦେଖି—ପ୍ରଳୟକାଳୀନ ସଂବର୍ତ୍ତବାତର ଆଘାତରେ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ କ୍ଷୁବ୍ଧ ମହାସାଗର ପରି—କ୍ରୋଧରେ ଚଞ୍ଚଳ ହୋଇଉଠିଥିବା ସେ ସଭାକୁ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅନୁଭବ କଲେ। ତେବେ ସେ ବୁଦ୍ଧିମାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, କୁରୁବଂଶର ବୃଦ୍ଧ ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ, ଶତ୍ରୁହନ୍ତା ମହାତେଜସ୍ବୀ ଇନ୍ଦ୍ର ଯେପରି ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ ପଚାରନ୍ତି, ସେପରି ପରାମର୍ଶ ଚାହିଲେ।
Verse 2
रोषात् प्रचलितं सर्वमिदमाह युधिष्ठिर: । भीष्म मतिमतां मुख्यं वृद्धं कुरूपितामहम् । बृहस्पति बृहत्तेजा: पुरुहृत इवारिहा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर प्रलयकालीन महावायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हुए भयंकर महासागरकी भाँति राजाओंके उस समुदायको क्रोधसे चंचल हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीसे उसी प्रकार बोले, जैसे शत्रुहन्ता महातेजस्वी इन्द्र बृहस्पतिजीसे कोई बात पूछते हैं--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କ୍ରୋଧରେ ସମଗ୍ର ସଭା ଅଶାନ୍ତ ହୋଇଉଠିଲାବେଳେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ। ସେ ବୁଦ୍ଧିମାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୁଖ୍ୟ, କୁରୁବଂଶର ବୃଦ୍ଧ ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ସେପରି ସମ୍ବୋଧନ କଲେ, ଯେପରି ମହାତେଜସ୍ବୀ ଶତ୍ରୁହନ୍ତା ପୁରୁହୂତ ଇନ୍ଦ୍ର ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କରନ୍ତି।
Verse 3
असौ रोषात् प्रचलितो महान् नृपतिसागर: । अत्र यत् प्रतिपत्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह,“पितामह! यह देखिये, राजाओंका महासमुद्र रोषसे अत्यन्त चंचल हो उठा है। अब यहाँ इन सबको शान्त करनेका जो उचित उपाय जान पड़े, वह मुझे बताइये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦେଖ, କ୍ରୋଧରେ ରାଜାମାନଙ୍କର ଏହି ମହାସମୁଦ୍ର ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ଉତ୍ତାଳ ହୋଇଉଠିଛି। ପିତାମହ! ଏଠାରେ ଏମାନଙ୍କୁ ଶାନ୍ତ କରି ଶୃଙ୍ଖଳା ସ୍ଥାପନ ପାଇଁ ଯେ ଉପାୟ ଗ୍ରହଣୀୟ, ତାହା ମୋତେ କୁହ।
Verse 4
यज्ञस्य च न विध्न: स्यात् प्रजानां च हित॑ भवेत् । यथा सर्वत्र तत् सर्व ब्रूहि मेडद्य पितामह,“दादाजी! यज्ञमें विघ्न न पड़े और प्रजाओंका हित हो तथा जिस प्रकार सर्वत्र शान्ति भी बनी रहे, वह सब उपाय अब मुझे बतानेकी कृपा करें”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପିତାମହ! ଯଜ୍ଞରେ ବିଘ୍ନ ନ ହେଉ, ପ୍ରଜାମାନଙ୍କର ହିତ ସାଧିତ ହେଉ, ଏବଂ ସର୍ବତ୍ର ଶାନ୍ତି ରହୁ—ଏହା ସବୁ ପାଇଁ ଯେଉଁ ଉପାୟ ଅଛି, ସେ ସମସ୍ତ ମୋତେ କୁହ।
Verse 5
इत्युक्तवति धर्मज्ञे धर्मराजे युधिष्ठिरे । उवाचेदं वचो भीष्मस्तत: कुरुपितामह:,धर्मके ज्ञाता धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुरुकुलपितामह भीष्मजी इस प्रकार बोले--
ଧର୍ମଜ୍ଞ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏପରି କହିବା ପରେ, କୁରୁବଂଶର ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ ତାପରେ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।
Verse 6
मा भैस्त्वं कुरुशार्दूल श्वा सिंहं हन्तुमरहति । शिव: पन्था: सुनीतो<त्र मया पूर्वतरं वृत:,“कुरुवंशके वीर! तुम डरो मत, क्या कुत्ता कभी सिंहको मार सकता है? हमने कल्याणमय मार्ग पहले ही चुन लिया है (श्रीकृष्णका आश्रय ही वह मार्ग है जिसका मैंने वरण कर लिया है)
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କୁରୁଶାର୍ଦୂଳ! ଭୟ କରନି; କୁକୁର କେବେ ସିଂହକୁ ମାରିପାରେ କି? ଏଠାରେ ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ କଲ୍ୟାଣମୟ, ସୁନୀତ ପଥ ବାଛିନେଇଛି।
Verse 7
प्रसुप्ते हि यथा सिंहे श्वानस्तस्मिन् समागता: । भषेयु: सहिता: सर्वे तथेमे वसुधाधिपा:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେପରି ଶୁଇଥିବା ସିଂହ ପାଖକୁ କୁକୁରମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ସମସ୍ତେ ମିଶି ଭଉଁକନ୍ତି, ସେପରି ଏହି ବସୁଧାଧିପ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ (କ୍ଷଣିକ ନିଷ୍କ୍ରିୟତା ଦେଖି) ଏକତ୍ର ହୋଇ ଉଦ୍ଧତ ହୋଇଉଠିଛନ୍ତି।
Verse 8
भषन्ते तात संक्रुद्धा: श्वानः सिंहस्य संनिधौ,'क्रोधमें भरे हुए कुत्तोंके समान ये लोग सिंहके निकट तभीतक कोलाहल मचा रहे हैं, जबतक भगवान् श्रीकृष्ण सिंहकी तरह जाग नहीं उठते--इन्हें दण्ड देनेके लिये उद्यत नहीं हो जाते। राजाओंमें श्रेष्ठ चेदिकुलभूषण नृसिंह शिशुपाल भी अपनी विवेकशक्ति खो बैठा है, तभी इन सब नरेशोंको यमलोकमें भेज देनेकी इच्छासे कुत्तेसे सिंह बनानेकी कोशिश कर रहा है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରିୟ, ସିଂହର ସନ୍ନିଧିରେ କ୍ରୋଧରେ ଫୁଲିଥିବା କୁକୁରମାନେ ଯେପରି ଭଉଁକନ୍ତି, ସେପରି ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସିଂହସମ ଜାଗି ଦଣ୍ଡ ଦେବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଉନଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏମାନେ କୋଲାହଳ କରନ୍ତି। ଚେଦିବଂଶର ଭୂଷଣ, ରାଜସିଂହ ଶିଶୁପାଳ ମଧ୍ୟ ବିବେକ ହରାଇଛି; ଏହି ନରେଶମାନଙ୍କୁ ଯମଲୋକକୁ ପଠାଇବା ଇଚ୍ଛାରେ ସେ ଅସମ୍ଭବ କାମ କରୁଛି—କୁକୁରକୁ ସିଂହ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛି।
Verse 9
न हि सम्बुध्यते यावत् सुप्त: सिंह इवाच्युत: । तेन सिंहीकरोत्येतान् नृसिंहश्नेदिपुड्रवः,'क्रोधमें भरे हुए कुत्तोंके समान ये लोग सिंहके निकट तभीतक कोलाहल मचा रहे हैं, जबतक भगवान् श्रीकृष्ण सिंहकी तरह जाग नहीं उठते--इन्हें दण्ड देनेके लिये उद्यत नहीं हो जाते। राजाओंमें श्रेष्ठ चेदिकुलभूषण नृसिंह शिशुपाल भी अपनी विवेकशक्ति खो बैठा है, तभी इन सब नरेशोंको यमलोकमें भेज देनेकी इच्छासे कुत्तेसे सिंह बनानेकी कोशिश कर रहा है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅଚ୍ୟୁତ (କୃଷ୍ଣ) ଶୁଅଥିବା ସିଂହ ପରି ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଜାଗନ୍ତି ନାହିଁ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧରେ ଭରିଥିବା କୁକୁରମାନଙ୍କ ପରି ଏମାନେ ସିଂହର ସମୀପରେ କୋଲାହଳ କରନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ସେ ଦଣ୍ଡ ଦେବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇ ଜାଗିଉଠିଲେ ମାତ୍ରେ ଏମାନଙ୍କ ହୁଲୁସ୍ତୁଲ ଶାନ୍ତ ହେବ। ତଥାପି ଚେଦିବଂଶର ପୁଙ୍ଗବ, ନୃସିଂହ ଶିଶୁପାଳ, ବିବେକହୀନ ହୋଇ ‘ଏହି କୁକୁରମାନଙ୍କୁ ସିଂହ କରିବା’ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛି—ରାଜାମାନଙ୍କୁ ବିନାଶପଥେ ଠେଲି ନିଜେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଡାକୁଛି।
Verse 10
पार्थिवान् पार्थिवश्रेष्ठ;: शिशुपालो5प्यचेतन: । सर्वान् सर्वात्मना तात नेतुकामो यमक्षयम्,'क्रोधमें भरे हुए कुत्तोंके समान ये लोग सिंहके निकट तभीतक कोलाहल मचा रहे हैं, जबतक भगवान् श्रीकृष्ण सिंहकी तरह जाग नहीं उठते--इन्हें दण्ड देनेके लिये उद्यत नहीं हो जाते। राजाओंमें श्रेष्ठ चेदिकुलभूषण नृसिंह शिशुपाल भी अपनी विवेकशक्ति खो बैठा है, तभी इन सब नरेशोंको यमलोकमें भेज देनेकी इच्छासे कुत्तेसे सिंह बनानेकी कोशिश कर रहा है
ହେ ପାର୍ଥିବଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଶିଶୁପାଳ ମଧ୍ୟ ଚେତନା-ବିବେକ ହରାଇଥିଲା। ତାତ! ସେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ମନରେ ମାନୋ ସେଇ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ଯମଙ୍କ ଅକ୍ଷୟ ଧାମ—ମୃତ୍ୟୁ—ଦିଗକୁ ନେଇଯିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ଥିଲା।
Verse 11
नूनमेतत् समादातु पुनरिच्छत्यधोक्षज: । यदस्य शिशुपालस्य तेजस्तिष्ठति भारत,“भारत! अवश्य ही भगवान् श्रीकृष्ण इस शिशुपालके भीतर उनका जो तेज है, उसे पुनः समेट लेना चाहते हैं
ହେ ଭାରତ! ନିଶ୍ଚୟ ଅଧୋକ୍ଷଜ ଭଗବାନ୍ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଶିଶୁପାଳର ଭିତରେ ଯେ ତେଜ ଅବସ୍ଥିତ, ତାହାକୁ ପୁନଃ ନିଜ ମଧ୍ୟରେ ସମେଟି ନେବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛନ୍ତି।
Verse 12
विप्लुता चास्य भद्रं ते बुद्धिर्बुद्धमतां वर । चेदिराजस्य कौन्तेय सर्वेषां च महीक्षिताम्,“बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। अवश्य ही इस चेदिराज शिशुपालकी तथा इन समस्त भूपालोंकी बुद्धि मारी गयी है
ହେ ବୁଦ୍ଧିମାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କୌନ୍ତେୟ! ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ନିଶ୍ଚୟ ଏହି ଚେଦିରାଜଙ୍କର ଏବଂ ଏହି ସମସ୍ତ ଭୂପାଳମାନଙ୍କର ବୁଦ୍ଧି ବିପର୍ଯ୍ୟସ୍ତ ହୋଇଯାଇଛି।
Verse 13
आदातुं च नरव्याप्रो यं यमिच्छत्ययं तदा । तस्य विप्लवते बुद्धिरेवं चेदिपतेर्यथा,"क्योंकि नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण जिस-जिसको अपनेमें विलीन कर लेना चाहते हैं, उस-उस मनुष्यकी बुद्धि इसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे इस चेदिराज शिशुपालकी
କାରଣ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯାହାକୁ ଯାହାକୁ ନିଜ ମଧ୍ୟରେ ଲୀନ କରିନେବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେ ସେ ମନୁଷ୍ୟର ବୁଦ୍ଧି ଏହିପରି ଭାବେ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ—ଯେପରି ଚେଦିରାଜ ଶିଶୁପାଳଙ୍କର ହୋଇଥିଲା।
Verse 14
चतुर्विधानां भूतानां त्रिषु लोकेषु माधव: । प्रभवश्वैव सर्वेषां निधनं च युधिष्ठिर:,'युधिष्ठिर! माधव श्रीकृष्ण तीनों लोकोंमें जो स्वेदज, अण्डज, उद्धिज्ज और जरायुज --ये चार प्रकारके प्राणी हैं, उन सबकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं
ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତିନି ଲୋକରେ ମାଧବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ହେଉଛନ୍ତି ସ୍ୱେଦଜ, ଅଣ୍ଡଜ, ଉଦ୍ଭିଜ୍ଜ ଓ ଜରାୟୁଜ—ଏହି ଚାରି ପ୍ରକାର ଜନ୍ମଧାରୀ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କର ଉତ୍ପତ୍ତି ଓ ପ୍ରଳୟ।
Verse 15
वैशम्पायन उवाच इति तस्य वच: श्रुत्वा ततश्रेदिपतिर्नुप: । भीष्म रूक्षाक्षरा वाच: श्रावयामास भारत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मजीकी यह बात सुनकर चेदिराज शिशुपाल उनको बड़ी कठोर बातें सुनाने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜା ଜନମେଜୟ! ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସେହି କଥା ଶୁଣି, ତାପରେ ଚେଦିର ଅଧିପତି (ଶିଶୁପାଳ) ହେ ଭାରତବଂଶଜ, ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ରୁକ୍ଷ ଓ କଟୁ ଶବ୍ଦରେ କହିବାକୁ ଲାଗିଲା।
Verse 40
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि युधिष्ठिरा श्वासने चत्वारिंशो5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଶିଶୁପାଳବଧପର୍ବରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର-ଆଶ୍ୱାସନ ପ୍ରକରଣର ଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
Verse 76
वृष्णिसिंहस्य सुप्तस्य तथामी प्रमुखे स्थिता: । 'जैसे सिंहके सो जानेपर बहुत-से कुत्ते उसके निकट आकर एक साथ भूकने लगते हैं, उसी प्रकार ये सामने खड़े हुए राजा भी तभीतक भूक रहे हैं, जबतक वृष्णिवंशका सिंह सो रहा है
ଯେପରି ସିଂହ ଶୋଇଥିଲେ ଅନେକ କୁକୁର ତାହାର ନିକଟକୁ ଆସି ଏକାସାଥି ଭଉଁକିଥାନ୍ତି, ସେପରି ଭାବେ ବୃଷ୍ଣିବଂଶର ସିଂହ ନିଦ୍ରାସ୍ଥ ଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମାତ୍ର ସାମ୍ନାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଏହି ରାଜାମାନେ ଶବ୍ଦ କରୁଛନ୍ତି।
The chapter stages a conflict between fear-driven exclusion (abandoning a child marked as abnormal) and rājadharma’s protective obligation, later extending to the dilemma of how long public provocation should be met with principled restraint.
It frames restraint as an intentional discipline rather than passivity: tolerance can be vowed for social reasons, yet accountability remains, and repeated transgression eventually exhausts the moral credit created by forbearance.
No explicit phalaśruti appears in this unit; its interpretive function is etiological and juridical—explaining later conduct and delimiting ethical patience—rather than promising a ritual merit for recitation.