Adhyaya 36
Sabha ParvaAdhyaya 3635 Verses

Adhyaya 36

अर्हणनिर्णयः (Decision on the Highest Honor at the Assembly)

Upa-parva: Rājasūyārhaṇa (Honoring at the Rājasūya Assembly)

Vaiśaṃpāyana reports that after Bhīṣma concludes his statement, Sahadeva delivers a pointed, policy-laden endorsement of honoring Keśava-Kṛṣṇa, describing him as immeasurable in valor and fit for worship. Sahadeva frames the act as placing a ‘step’ upon the heads of the powerful—i.e., a formal precedence decision—and invites any rival king to offer a reasoned counterargument. He further urges that discerning rulers should authorize honoring one’s teacher, father, and guru, extending the logic of veneration to the political sphere. The assembly of eminent kings offers no verbal rebuttal; a symbolic पुष्पवृष्टि (flower-rain) and disembodied acclamations validate Sahadeva’s stance. Nārada appears as a doubt-dispeller and all-world knower, intensifying the sacral authority of the moment. Yet the text records visible agitation among certain groups led by Sunītha; some kings speak of Yudhiṣṭhira’s consecration and Vāsudeva’s honoring with resigned resolve. Kṛṣṇa perceives an inexhaustible ‘ocean of kings’ preparing for confrontation. After the honor is completed—especially toward brahma-kṣatra excellence—Sunītha, angered, urges the assembled rulers to arm and stand against the Vṛṣṇis and Pāṇḍavas, then consults about obstructing the sacrifice.

Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की अन्तर्वेदी में देवर्षि-राजर्षियों का तेजस्वी समागम—नक्षत्रमण्डित आकाश-सा दीप्तिमान यज्ञभवन—और उसी सभा में यह प्रश्न कि प्रथम अर्घ्य किसे मिले। → नारद आदि महर्षि पुरातन वृत्तान्त का स्मरण कराते हैं—नारायण-शम्भु की आज्ञा, देवताओं का विधान, और क्षत्र-समुदाय के उत्थान-पतन का संकेत—जिससे सभा समझती है कि यह केवल सम्मान नहीं, धर्म-निर्णय है। → धर्मज्ञों के बीच निर्णायक बोध उभरता है: श्रीकृष्ण ही समस्त यज्ञों के आराध्य, सर्वेश्वर नारायण हैं; अतः राजसूय में प्रथम अर्घ्य उन्हीं को अर्पित होना चाहिए—और युधिष्ठिर के महाध्वर में यह अर्घ्य-दान प्रतिष्ठित होता है। → यज्ञमण्डप में उपस्थित ब्राह्मण-देवर्षि-राजर्षि इस निर्णय को मान्यता देते हैं; युधिष्ठिर का यज्ञ-क्रम धर्मसम्मत दिशा पाता है और सभा का केन्द्र श्रीकृष्ण की सर्वोच्चता पर स्थिर हो जाता है। → यह सर्वोच्च सम्मान जिनके अहंकार को चुभेगा, वे मौन नहीं रहेंगे—सभा के भीतर ही विरोध का बीज अंकुरित होने लगता है।

Shlokas

Verse 1

अफत-८#-रू- जा - नीलकण्ठीकी टीकामें छः: अग्नियाँ इस प्रकार बतायी गयी हैं--आरम्भणीय, क्षत्र, धृति, व्युष्टि, द्विरात्र और दशपेय। (अर्घाभिहरण पर्व) षटत्रिशो<ध्याय: राजसूययज्ञमें ब्राह्मणों तथा राजाओंका समागम, श्रीनारदजीके द्वारा श्रीकृष्ण-महिमाका वर्णन और भीष्मजीकी अनुमतिसे श्रीकृष्णकी अग्रपूजा वैशम्पायन उवाच ततो<5भिषेचनीयेडट्रि ब्राह्मणा राजभि: सह । अन्तर्वेदीं प्रविविशु: सत्काराहा महर्षय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर अभिषेचनीय- कर्मके दिन सत्कारके योग्य महर्षिगण और ब्राह्मणलोग राजाओंके साथ यज्ञभवनमें गये इस प्रकार श्रीम्याभारत सभापतव॑के अन्तर्गत अर्घाभिद्दरणपर्वमें श्रीकृष्णको अ््यदानविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३६ ॥ है ० बछ। ] अति्ऑशाड<ह ३. जिसमें पूजनीय पुरुषोंका अभिषेक--अर्घध्य देकर सम्मान किया जाता है, उस कर्मका नाम अभिषेचनीय है। यह राजसूययज्ञका अंगभूत सोमयागविशेष है। २. यह एक प्रकारका वाद है, जिसमें वादी छल, जाति और निग्रहस्थानको लेकर अपने पक्षका मण्डन और विपक्षीके पक्षका खण्डन करता है। इसमें वादीका उद्देश्य तत्त्वनिर्णय नहीं होता, किंतु स्वपक्षस्थापन और परपक्षखण्डनमात्र होता है। वादके समान इसमें भी प्रतिज्ञा, हेतु आदि पाँच अवयव होते हैं। 3. जिस बहस या वाद-विवादका उद्देश्य अपने पक्षकी स्थापना या परपक्षका खण्डन न होकर व्यर्थकी बकवादमात्र हो, उसका नाम “वितण्डा' है। सप्तत्रिशो5ध्याय: शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन शिशुपाल उवाच नायमर्हति वार्ष्णेयस्तिष्ठत्स्विह महात्मसु । महीपतिषु कौरव्य राजवत्‌ पार्थिवार्हणम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଅଭିଷେଚନୀୟ କର୍ମର ଦିନେ ସତ୍କାରଯୋଗ୍ୟ ମହର୍ଷିମାନେ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ରାଜମାନଙ୍କ ସହ ଅନ୍ତର୍ବେଦୀରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।

Verse 2

नारदप्रमुखास्तस्यामन्तर्वेद्यां महात्मन: । समासीना: शुशुभिरे सह राजर्षिभिस्तदा,महात्मा राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञभवनमें राजर्षियोंके साथ बैठे हुए नारद आदि महर्षि उस समय ब्रह्माजीकी सभामें एकत्र हुए देवताओं और देवर्षियोंके समान सुशोभित हो रहे थे। बीच-बीचमें यज्ञसम्वन्धी एक-एक कर्मसे अवकाश पाकर अत्यन्त प्रतिभाशाली विद्वान आपसमें जल्पः (वाद-विवाद) करते थे। “यह इसी प्रकार होना चाहिये”, “नहीं, ऐसे नहीं होना चाहिये", “यह बात ऐसी ही है, ऐसी ही है, इससे भिन्न नहीं है।” इस प्रकार कह- कहकर बहुत-से वितण्डावादीः5 द्विज वहाँ वाद-विवाद करते थे

ମହାତ୍ମା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେଇ ଅନ୍ତର୍ବେଦୀରେ ନାରଦପ୍ରମୁଖ ମହର୍ଷିମାନେ ରାଜର୍ଷିମାନଙ୍କ ସହ ଆସୀନ ହୋଇ ସେତେବେଳେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭିତ ହେଉଥିଲେ।

Verse 3

समेता ब्रह्मभवने देवा देवर्षयस्तथा । कर्मान्तरमुपासन्तो जजल्पुरमितौजस:,महात्मा राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञभवनमें राजर्षियोंके साथ बैठे हुए नारद आदि महर्षि उस समय ब्रह्माजीकी सभामें एकत्र हुए देवताओं और देवर्षियोंके समान सुशोभित हो रहे थे। बीच-बीचमें यज्ञसम्वन्धी एक-एक कर्मसे अवकाश पाकर अत्यन्त प्रतिभाशाली विद्वान आपसमें जल्पः (वाद-विवाद) करते थे। “यह इसी प्रकार होना चाहिये”, “नहीं, ऐसे नहीं होना चाहिये", “यह बात ऐसी ही है, ऐसी ही है, इससे भिन्न नहीं है।” इस प्रकार कह- कहकर बहुत-से वितण्डावादीः5 द्विज वहाँ वाद-विवाद करते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ସଭାଭବନରେ ଦେବତା ଓ ଦେବର୍ଷିମାନେ ସମେତ ହୋଇଥିଲେ। ଯଜ୍ଞକର୍ମର କ୍ରମରେ ମଧ୍ୟେମଧ୍ୟେ ଅବକାଶ ମିଳିଲେ ଅପରିମିତ ତେଜସ୍ବୀ ପଣ୍ଡିତମାନେ ପରସ୍ପର ତର୍କ-ବିତର୍କ କରୁଥିଲେ—“ଏହିପରି ହେବା ଉଚିତ”, “ନୁହେଁ, ଏଭଳି ନୁହେଁ”, “ଏହା ଏମିତି ହିଁ; ଅନ୍ୟଥା ନୁହେଁ” ବୋଲି। ଏହି ଶାସ୍ତ୍ରଚର୍ଚ୍ଚାରେ ଯଜ୍ଞସଭା ଅଧିକ ଶୋଭିତ ହେଲା।

Verse 4

एवमेतन्न चाप्येवमेवं चैतन्न चान्यथा । इत्यूचुर्बहवस्तत्र वितण्डा वै परस्परम्‌,महात्मा राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञभवनमें राजर्षियोंके साथ बैठे हुए नारद आदि महर्षि उस समय ब्रह्माजीकी सभामें एकत्र हुए देवताओं और देवर्षियोंके समान सुशोभित हो रहे थे। बीच-बीचमें यज्ञसम्वन्धी एक-एक कर्मसे अवकाश पाकर अत्यन्त प्रतिभाशाली विद्वान आपसमें जल्पः (वाद-विवाद) करते थे। “यह इसी प्रकार होना चाहिये”, “नहीं, ऐसे नहीं होना चाहिये", “यह बात ऐसी ही है, ऐसी ही है, इससे भिन्न नहीं है।” इस प्रकार कह- कहकर बहुत-से वितण्डावादीः5 द्विज वहाँ वाद-विवाद करते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଠାରେ ଅନେକ ବିତଣ୍ଡାବାଦୀ ପରସ୍ପରକୁ ଖଣ୍ଡନ କରି କହୁଥିଲେ—“ଏହିଁ ଠିକ୍”, “ନୁହେଁ, ଏହିପରି ନୁହେଁ”, “ହଁ, ଏହିପରି ହିଁ; ଅନ୍ୟଥା ନୁହେଁ।” ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞସଭାରେ କର୍ମମଧ୍ୟ ଅବକାଶରେ ବିଦ୍ୱାନ ଦ୍ୱିଜମାନେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ତର୍କ କରୁଥିଲେ; ସତ୍ୟନିର୍ଣ୍ଣୟଠାରୁ ଅଧିକ ପ୍ରତିପକ୍ଷକୁ ପରାଜିତ କରିବାରେ ଯେନ ତାଙ୍କର ଆଗ୍ରହ। ତଥାପି ନାରଦାଦି ମହର୍ଷିମାନେ ଶୋଭିତ କରିଥିବା ସେ ସଭା ବ୍ରହ୍ମସଭାର ଦେବ-ଦେବର୍ଷି ସମାଗମ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲା।

Verse 5

कृशानर्थास्तत: केचिदकृशांस्तत्र कुर्वते । अवृशांश्व व॒शांक्षक्रुहेतुभि: शास्त्रनिश्चयै:,कुछ विद्वान शास्त्रनिश्चित नाना प्रकारके तर्कों और युक्तियोंसे दुर्बल पक्षोंको पुष्ट और पुष्ट पक्षोंको दुर्बल सिद्ध कर देते थे

ତାପରେ ସେଠାରେ କେତେକ ଚତୁର ପଣ୍ଡିତ ଶାସ୍ତ୍ରନିଶ୍ଚିତ ହେତୁ ଓ ନାନା ତର୍କରେ ଦୁର୍ବଳ ପକ୍ଷକୁ ବଳବାନ ଏବଂ ବଳବାନ ପକ୍ଷକୁ ଦୁର୍ବଳ ବୋଲି ସାବ୍ୟସ୍ତ କରିଦେଉଥିଲେ; କେବଳ ବାଦକୌଶଳରେ ପକ୍ଷଗୁଡ଼ିକୁ ଉଲଟାଇ ଦେଉଥିଲେ।

Verse 6

तत्र मेधाविन: केचिदर्थमन्यैरुदीरितम्‌ । विचिक्षिपुर्यथा श्येना नभोगतमिवामिषम्‌,वहीं कुछ मेधावी पण्डित, जो दूसरोंके कथनमें दोष दिखानेके ही अभ्यासी थे, अन्य लोगोंके कहे हुए अनुमानसाधित विषयको उसी तरह बीचसे ही लोक लेते थे, जैसे बाज मांसके लोथड़ेको आकाशमें ही एक-दूसरेसे छीन लेते हैं

ସେଠାରେ କେତେକ ମେଧାବୀ ଲୋକ ଅନ୍ୟମାନେ କହିଥିବା ଅର୍ଥକୁ ମଧ୍ୟରେ ହିଁ ଛିନିନେଉଥିଲେ—ଯେପରି ଆକାଶରେ ଶ୍ୟେନମାନେ ପରସ୍ପରଠାରୁ ମାଂସଖଣ୍ଡ ଛିନିନେଇଥାନ୍ତି।

Verse 7

केचिद्‌ धर्मार्थकुशला: केचित्‌ तत्र महाव्रता: । रेमिरे कथयन्तश्न सर्वभाष्यविदां वरा:,उन्हींमें कुछ लोग धर्म और अर्थके निर्णयमें अत्यन्त निपुण थे। कोई महान्‌ व्रतका पालन करनेवाले थे। इस प्रकार सम्पूर्ण भाष्यके दिद्वानोंमें श्रेष्ठ वे महात्मा अच्छी कथाएँ और शिक्षाप्रद बातें कहकर स्वयं भी सुखी होते और दूसरोंको भी प्रसन्न करते थे

ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କେତେକ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ନିର୍ଣ୍ଣୟରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କୁଶଳ ଥିଲେ; କେତେକ ମହାବ୍ରତଧାରୀ ଥିଲେ। ଏଭଳି ଭାଷ୍ୟବିଦ୍ୟାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ ମହାତ୍ମାମାନେ ଉତ୍ତମ କଥା ଓ ଶିକ୍ଷାଦାୟକ ଉପଦେଶ କହି ନିଜେ ମଧ୍ୟ ଆନନ୍ଦିତ ହେଉଥିଲେ, ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସନ୍ନ କରୁଥିଲେ।

Verse 8

सा वेदिदवेंदसम्पन्नैदेवद्धिजमहर्षिभि: । आबभासे समाकीर्णा नक्षत्रैद्यौरिवायता,जैसे नक्षत्रमालाओंद्वारा मण्डित विशाल आकाश मण्डलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वेदज्ञ देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों और महर्षियोंसे वह वेदी सुशोभित हो रही थी

ବେଦଜ୍ଞ ଦେବର୍ଷି, ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି ଓ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ସେଇ ଯଜ୍ଞବେଦୀ ଏମିତି ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲା—ଯେପରି ନକ୍ଷତ୍ରମାଳାରେ ମଣ୍ଡିତ ବିଶାଳ ଆକାଶ ଶୋଭା ପାଏ।

Verse 9

न तस्यां संनिधौ शूद्र: कश्चिदासीज्न चाव्रती । अन्तर्वेद्यां तदा राजन्‌ युधिष्ठिरनिवेशने,राजन्‌ युधिष्ठिरकी यज्ञशालाके भीतर उस अन्तर्वेदीके आस-पास उस समय न तो कोई शूद्र था और न व्रतहीन द्विज ही

ହେ ରାଜନ୍! ସେ ସମୟରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞଶାଳାର ଅନ୍ତର୍ବେଦୀ ନିକଟେ ନ କୌଣସି ଶୂଦ୍ର ଥିଲେ, ନ ତ ଵ୍ରତହୀନ ଦ୍ୱିଜ।

Verse 10

तां तु लक्ष्मीवतो लक्ष्मीं तदा यज्ञविधानजाम्‌ | तुतोष नारद: पश्यन्‌ धर्मराजस्य धीमत:,परम बुद्धिमान्‌ राजलक्ष्मीसम्पन्न धर्मराज युधिष्ठिरके उस धन-वैभव और यज्ञविधिको देखकर देवर्षि नारदको बड़ी प्रसन्नता हुई

ଯଜ୍ଞବିଧାନରୁ ଜନିତ ସେଇ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀ—ଲକ୍ଷ୍ମୀବାନ ଓ ଧୀମାନ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଐଶ୍ୱର୍ଯ୍ୟ—ଦେଖି ଦେବର୍ଷି ନାରଦ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ।

Verse 11

जनमेजय! उस समय वहाँ समस्त क्षत्रियोंका सम्मेलन देखकर मुनिवर नारदजी सहसा चिन्तित हो उठे

ହେ ଜନମେଜୟ! ସେ ସମୟରେ ସେଠାରେ ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ମହାସମ୍ମିଳନ ଦେଖି ମୁନିବର ନାରଦ ହଠାତ୍ ଚିନ୍ତାଗ୍ରସ୍ତ ହେଲେ।

Verse 12

सस्मार च पुरा वृत्तां कथां तां पुरुषर्षभ । अंशावतरणे यासौ ब्रह्मणो भवने5भवत्‌,नरश्रेष्ठ भगवान्‌के सम्पूर्ण अंशों (देवताओं)-सहित अवतार लेनेके सम्बन्धमें ब्रह्मलोकमें पहले जो चर्चा हुई थी, वह प्राचीन घटना उन्हें याद आ गयी

ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତେବେ ତାଙ୍କୁ ସେଇ ପୁରାତନ କଥା ସ୍ମରଣ ହେଲା—ଯାହା ଏକଦା ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ଭବନରେ ଦେବାଂଶସହିତ ଭଗବାନଙ୍କ ଅବତରଣ ବିଷୟରେ ହୋଇଥିଲା।

Verse 13

अथ चिन्तां समापेदे स मुनिर्मनुजाधिप । नारदस्तु तदा पश्यन्‌ सर्वक्षत्रसमागमम्‌,देवानां संगमं तं तु विज्ञाय कुरुनन्दन । नारद: पुण्डरीकाक्षं सस्मार मनसा हरिम्‌ कुरुनन्दन! नारदजीने यह जानकर कि राजाओंके इस समुदायके रूपमें वास्तवमें देवताओंका ही समागम हुआ है, मन-ही-मन कमलनयन भगवान्‌ श्रीहरिका चिन्तन किया

ତେବେ ସେ ମୁନି, ହେ ମନୁଜାଧିପ, ଗଭୀର ଚିନ୍ତାରେ ପଡ଼ିଲେ। ନାରଦ ସେ ସମୟରେ ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ମହାସମାଗମ ଦେଖି, ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ, ତାହାକୁ ପ୍ରକୃତରେ ଦେବତାମାନଙ୍କ ସଙ୍ଗମ ବୋଲି ବୁଝିଲେ। ଏହା ଜାଣି ନାରଦ ମନେମନେ କମଳନୟନ ଭଗବାନ୍ ହରିଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କଲେ।

Verse 14

साक्षात्‌ स विबुधारिघ्न: क्षत्रे नारायणो विभु: । प्रतिज्ञां पालयंश्वेमां जात: परपुरंजय:,वे सोचने लगे--“अहो! सर्वव्यापक देवशत्रु-विनाशक वैरिनगरविजयी साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायणने ही अपनी इस प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये क्षत्रियकुलमें अवतार ग्रहण किया है

ସେ ଚିନ୍ତା କଲେ—“ଆହା! ସର୍ବବ୍ୟାପୀ, ଦେବଶତ୍ରୁ-ବିନାଶକ, ଶତ୍ରୁନଗର-ବିଜୟୀ ସାକ୍ଷାତ୍ ଭଗବାନ୍ ନାରାୟଣ ହିଁ ଏହି ପ୍ରତିଜ୍ଞା ପାଳନ ପାଇଁ କ୍ଷତ୍ରିୟକୁଳରେ ଅବତୀର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଛନ୍ତି।”

Verse 15

संदिदेश पुरायोडसौ विबुधान्‌ भूतकृत्‌ स्वयम्‌ । अन्योन्यमभिनिध्नन्त: पुनर्लोकानवाप्स्यथ,'पूर्वकालमें सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक साक्षात्‌ उन्हीं भगवानने देवताओंको यह आदेश दिया था कि तुमलोग भूतलपर जन्म ग्रहण करके अपना अभीष्ट साधन करते हुए आपसमें एक-दूसरेको मारकर फिर देवलोकमें आ जाओगे

ପୂର୍ବକାଳରେ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କ ସ୍ରଷ୍ଟା ସେଇ ଭଗବାନ୍ ସ୍ୱୟଂ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ଏହି ଆଦେଶ ଦେଇଥିଲେ—“ତୁମେ ପୃଥିବୀରେ ଜନ୍ମ ଗ୍ରହଣ କରି ନିଜ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସାଧନ କର; ଏବଂ ପରସ୍ପର ଏକାପରକୁ ନିହତ କରି କରି ପୁନଃ ନିଜ ନିଜ ଲୋକକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବ।”

Verse 16

इति नारायण: शम्भुर्भगवान्‌ भूतभावन: । आदित्यविबुधान्‌ सर्वानजायत यदुक्षये,“कल्याणस्वरूप भूतभावन भगवान्‌ नारायणने सब देवताओंको यह आज्ञा देनेके पश्चात्‌ स्वयं भी यदुकुलमें अवतार लिया

“ଏହିପରି କଲ୍ୟାଣସ୍ୱରୂପ, ଭୂତଭାବନ ଭଗବାନ୍ ନାରାୟଣ (ଶମ୍ଭୁ) ସମସ୍ତ ଦେବତାଙ୍କୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଇ, ସ୍ୱୟଂ ମଧ୍ୟ ଯଦୁକୁଳରେ ଅବତୀର୍ଣ୍ଣ ହେଲେ।”

Verse 17

क्षितावन्‍न्धकवृष्णीनां वंशे वंशभूतां वर: । परया शुशुभे लक्ष्म्या नक्षत्राणामिवोडुराट्‌,“अन्धक और वृष्णियोंके कुलमें वंशधारियोंमें श्रेष्ठ वे ही भगवान्‌ इस पृथ्वीपर प्रकट हो अपनी सर्वोत्तम कान्तिसे उसी प्रकार शोभायमान हैं, जैसे नक्षत्रोंमें चन्द्रमा सुशोभित होते हैं

ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଅନ୍ଧକ ଓ ବୃଷ୍ଣିମାନଙ୍କ ବଂଶରେ, ବଂଶଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ ଭଗବାନ୍ ପରମ ଲକ୍ଷ୍ମୀରେ ଏମିତି ଶୋଭିତ ହେଲେ, ଯେପରି ନକ୍ଷତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଚନ୍ଦ୍ର ଶୋଭା ପାଏ।

Verse 18

यस्य बाहुबल सेन्द्रा: सुरा: सर्व उपासते । सो<यं मानुषवन्नाम हरिरास्तेडरिमर्दन:,“इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता जिनके बाहुबलकी उपासना करते हैं, वे ही शत्रुमर्दन श्रीहरि यहाँ मनुष्यके समान बैठे हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯାହାଙ୍କ ବାହୁବଳକୁ ଇନ୍ଦ୍ର ସହିତ ସମସ୍ତ ଦେବତା ଉପାସନା କରନ୍ତି, ସେଇ ଶତ୍ରୁମର୍ଦ୍ଦନ ହରି ମନୁଷ୍ୟସଦୃଶ ନାମ ଧାରଣ କରି ଏଠାରେ ମନୁଷ୍ୟରୂପେ ଉପବିଷ୍ଟ ଅଛନ୍ତି।

Verse 19

अहो बत महद्धूतं स्वयंभूर्यदिदं स्वयम्‌ । आदास्यति पुन: क्षत्रमेवं बलसमन्वितम्‌,“अहो! ये स्वयम्भू महाविष्णु ऐसे बलसम्पन्न क्षत्रियसमुदायको पुनः उच्छिन्न करना चाहते हैं!

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହାୟ! କି ମହା ଅପଶକୁନ, ଯେ ସ୍ୱୟଂଭୂ ପ୍ରଭୁ ନିଜେ ଏପରି ବଳସମ୍ପନ୍ନ କ୍ଷତ୍ରିୟ-କ୍ରମକୁ ପୁନର୍ବାର ହରଣ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ଦେଖାଯାଉଛନ୍ତି।

Verse 20

इत्येतां नारदश्निन्तां चिन्तयामास सर्ववित्‌ । हरिं नारायणं ध्यात्वा यज्ैरीज्यन्तमी श्वरम्‌,धर्मज्ञ नारदजीने इसी पुरातन वृत्तान्तका स्मरण किया और ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही समस्त यज्ञोंके द्वारा आराधनीय, सर्वेश्वर नारायण हैं; ऐसा समझकर वे धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान्‌ देवर्षि मेधावी धर्मराजके उस महायज्ञमें बड़े आदरके साथ बैठे रहे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଏପରି ଚିନ୍ତାକୁ ସର୍ବଜ୍ଞ ନାରଦ ମନେ ଚିନ୍ତନ କଲେ। ପରେ ସମସ୍ତ ଯଜ୍ଞଦ୍ୱାରା ଆରାଧ୍ୟ ଈଶ୍ୱର ହରି-ନାରାୟଣଙ୍କୁ ଧ୍ୟାନ କରି ସେ ନିଶ୍ଚଳ ହେଲେ।

Verse 21

धर्मज्ञ नारदजीने इसी पुरातन वृत्तान्तका स्मरण किया और ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही समस्त यज्ञोंके द्वारा आराधनीय, सर्वेश्वर नारायण हैं; ऐसा समझकर वे धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान्‌ देवर्षि मेधावी धर्मराजके उस महायज्ञमें बड़े आदरके साथ बैठे रहे

ଧର୍ମଜ୍ଞ ନାରଦ ସେହି ପୁରାତନ ବୃତ୍ତାନ୍ତକୁ ସ୍ମରଣ କଲେ ଏବଂ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ ଯେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ହିଁ ସମସ୍ତ ଯଜ୍ଞଦ୍ୱାରା ଆରାଧ୍ୟ ସର୍ବେଶ୍ୱର ନାରାୟଣ। ଏହା ବୁଝି ପରମ ମେଧାବୀ ଦେବର୍ଷି, ଧର୍ମବିଦ୍ମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ସେହି ମହାଯଜ୍ଞରେ ମହାସମ୍ମାନ ସହିତ ଉପବିଷ୍ଟ ରହିଲେ।

Verse 22

ततो भीष्मोडब्रवीद्‌ राजन्‌ धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ । क्रियतामर्हणं राज्ञां यथाहमिति भारत,जनमेजय! तत्पश्चात्‌ भीष्मजीने धर्मराज युधिष्ठिससे कहा--“भरतकुलभूषण युधिष्ठिर! अब तुम यहाँ पधारे हुए राजाओंका यथायोग्य सत्कार करो”

ତାପରେ ଭୀଷ୍ମ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲେ— “ହେ ରାଜନ୍, ଭରତକୁଳଭୂଷଣ! ଏଠାରେ ଆସିଥିବା ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସତ୍କାର କର—ମୋ କଥା ଅନୁସାରେ।”

Verse 23

आचार्यमृत्विजं चैव संयुजं च युधिष्ठिर । स्नातकं च प्रियं प्राहुः षडर्घ्यारहान्‌ नृप॑ं तथा,आचार्य, ऋत्विजू, सम्बन्धी, स्नातक, प्रिय मित्र तथा राजा--इन छहोंको अर्घ्य देकर पूजनेयोग्य बताया गया है

ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଆଚାର୍ଯ୍ୟ, ଋତ୍ୱିଜ, ସମ୍ବନ୍ଧୀ/ସହାୟ, ସ୍ନାତକ, ପ୍ରିୟ ମିତ୍ର—ଏହି ପାଞ୍ଚଜଣ, ଏବଂ ସେହିପରି ରାଜା—ଏହି ଛଅଜଣଙ୍କୁ ଅର୍ଘ୍ୟ ଦେଇ ପୂଜ୍ୟ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି।

Verse 24

एतानर्घ्यानभिगतानाहु: संवत्सरोषितान्‌ । त इमे कालपूगस्य महतो<स्मानुपागता:,'ये यदि एक वर्ष बिताकर अपने यहाँ आवें तो इनके लिये अर्घ्य निवेदन करके इनकी पूजा करनी चाहिये, ऐसा शास्त्रज्ञ पुरुषोंका कथन है। ये सभी नरेश हमारे यहाँ सुदीर्घकालके पश्चात्‌ पधारे हैं

ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞମାନଙ୍କ କଥା ଅନୁସାରେ, ଯେମାନେ ଏକ ବର୍ଷ ପରେ ଆସନ୍ତି ସେମାନେ ଅର୍ଘ୍ୟାର୍ହ। ଏହି ସମସ୍ତ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୀର୍ଘକାଳ ପରେ ଆମ ପାଖକୁ ଆସିଛନ୍ତି।

Verse 25

एषामेकैकशो राजन्नर्ष्यमानीयतामिति । अथ चीैषां वरिष्ठाय समर्थायोपनीयताम्‌,इसलिये राजन! तुम बारी-बारीसे इन सबके लिये अर्घ्य दो और इन सबमें जो श्रेष्ठ एवं शक्तिशाली हो, उसको सबसे पहले अर्घ्य समर्पित करो”

ଏହେତୁ, ହେ ରାଜନ୍! ଏମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏକେକ କରି ଅର୍ଘ୍ୟ ଆଣାଯାଉ; ଏମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ସମର୍ଥ, ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଥମେ ଅର୍ଘ୍ୟ ନିବେଦନ କରାଯାଉ।

Verse 26

युधिछिर उवाच कस्मै भवान्‌ मन्यते<र्घ्यमेकस्मै कुरुनन्दन । उपनीयमान युक्त च तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--कुरुनन्दन पितामह! इन समागत नरेशोंमें किस एकको सबसे पहले अर्घ्य निवेदन करना आप उचित समझते हैं? यह मुझे बताइये

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ ପିତାମହ! ଏହି ଆଗତ ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କାହାକୁ ପ୍ରଥମେ ଅର୍ଘ୍ୟ ଦେବାକୁ ଆପଣ ଯୁକ୍ତ ମନେ କରନ୍ତି? ଅର୍ଘ୍ୟ ଆଣାଯାଉଛି; ଯାହା ଧର୍ମସମ୍ମତ, ତାହା ମୋତେ କହନ୍ତୁ।

Verse 27

वैशम्पायन उवाच ततो भीष्म: शान्तनवो बुद्धया निश्चित्य वीर्यवान्‌ | अमन्यत तदा कृष्णमर्हणीयतमं भुवि,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्मने अपनी बुद्धिसे निश्चय करके भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही भूमण्डलमें सबसे अधिक पूजनीय माना

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ମହାପରାକ୍ରମୀ ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ନିଜ ବୁଦ୍ଧିରେ ନିଶ୍ଚୟ କରି, ସେ ସମୟରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଭୂମଣ୍ଡଳରେ ସର୍ବାଧିକ ପୂଜନୀୟ ବୋଲି ମାନିଲେ।

Verse 28

भीष्म उवाच एष होषां समस्तानां तेजोबलपराक्रमै: । मध्ये तपन्निवाभाति ज्योतिषामिव भास्कर:,भीष्मने कहा--कुन्तीनन्दन! ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण इन सब राजाओंके बीचमें अपने तेज, बल और पराक्रमसे उसी प्रकार देदीप्यमान हो रहे हैं, जैसे ग्रह-नक्षत्रोंमें भुवनभास्कर भगवान्‌ सूर्य। अन्धकारपूर्ण स्थान जैसे सूर्यका उदय होनेपर ज्योतिसे जगमग हो उठता है और वायुहीन स्थान जैसे वायुके संचारसे सजीव-सा हो जाता है, उसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा हमारी यह सभा आह्वादित और प्रकाशित हो रही है (अतः ये ही अग्रपूजाके योग्य हैं)

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ! ଏହି ସମବେତ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ନିଜ ତେଜ, ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମରେ ଗ୍ରହ-ନକ୍ଷତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭୁବନଭାସ୍କର ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ହେଉଛନ୍ତି। ସୂର୍ଯ୍ୟୋଦୟରେ ଯେପରି ଅନ୍ଧକାର ଦୂର ହୁଏ, ଏବଂ ନିର୍ବାତ ସ୍ଥାନରେ ବାୟୁ ଚଳିଲେ ଯେପରି ସଜୀବତା ଆସେ, ସେପରି କୃଷ୍ଣଙ୍କ ସାନ୍ନିଧ୍ୟରେ ଏହି ରାଜସଭା ଆନନ୍ଦିତ ଓ ପ୍ରକାଶିତ ହେଉଛି। ତେଣୁ ଅଗ୍ରପୂଜାର ଯୋଗ୍ୟ ଏକମାତ୍ର ସେଇ।

Verse 29

असूर्यमिव सूर्येण निर्वातमिव वायुना । भासितं ह्वादितं चैव कृष्णेनेदं सदो हि न:,भीष्मने कहा--कुन्तीनन्दन! ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण इन सब राजाओंके बीचमें अपने तेज, बल और पराक्रमसे उसी प्रकार देदीप्यमान हो रहे हैं, जैसे ग्रह-नक्षत्रोंमें भुवनभास्कर भगवान्‌ सूर्य। अन्धकारपूर्ण स्थान जैसे सूर्यका उदय होनेपर ज्योतिसे जगमग हो उठता है और वायुहीन स्थान जैसे वायुके संचारसे सजीव-सा हो जाता है, उसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा हमारी यह सभा आह्वादित और प्रकाशित हो रही है (अतः ये ही अग्रपूजाके योग्य हैं)

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ! ସୂର୍ଯ୍ୟ ନଥିବା ଆକାଶ ସୂର୍ଯ୍ୟରେ ଯେପରି ଆଲୋକିତ ହୁଏ, ଏବଂ ବାୟୁ ନଥିବା ସ୍ଥାନ ବାୟୁ ଚଳିଲେ ଯେପରି ସଜୀବ ଲାଗେ, ସେପରି କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଆମର ଏହି ସଭା ପ୍ରକାଶିତ ଓ ଆହ୍ଲାଦିତ ହୋଇଛି।

Verse 30

तस्मै भीष्माभ्यनुज्ञात: सहदेव: प्रतापवान्‌ | उपजद्वेडथ विधिवद्‌ वार्ष्णेयायार्घ्यमुत्तमम्‌,भीष्मजीकी आज्ञा मिल जानेपर प्रतापी सहदेवने वृष्णिकुलभूषण भगवान्‌ श्रीकृष्णको विधिपूर्वक उत्तम अर्घ्य निवेदन किया

ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଅନୁମତି ପାଇ ପ୍ରତାପବାନ ସହଦେବ ବିଧିପୂର୍ବକ ବୃଷ୍ଣିକୁଳଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ଉତ୍ତମ ଅର୍ଘ୍ୟ ନିବେଦନ କଲା।

Verse 31

रु |। ४७ ७-९२ ५ £९3९६*९९३६ '! >> >> 0. */| प्रतिजग्राह तत्‌ कृष्ण: शास्त्रदृष्टेन कर्मणा । शिशुपालस्तु तां पूजां वासुदेवे न चक्षमे,श्रीकृष्णने शास्त्रीय विधिके अनुसार वह अर्घ्य स्वीकार किया। वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीहरिकी वह पूजा राजा शिशुपाल नहीं सह सका

କୃଷ୍ଣ ଶାସ୍ତ୍ରଦୃଷ୍ଟ କର୍ମାନୁସାରେ ସେଇ ଅର୍ଘ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କଲେ; କିନ୍ତୁ ବାସୁଦେବଙ୍କୁ ଦିଆଯାଇଥିବା ସେଇ ପୂଜାକୁ ଶିଶୁପାଳ ସହି ପାରିଲା ନାହିଁ।

Verse 32

स उपालभ्य भीष्मं॑ च धर्मराजं च संसदि । अपाक्षिपद्‌ वासुदेवं चेदिराजो महाबल:,महाबली चेदिराज भरी सभामें भीष्म और धर्मराज युधिष्ठिरको उलाहना देकर भगवान्‌ वासुदेवपर आक्षेप करने लगा

ତେବେ ମହାବଳୀ ଚେଦିରାଜ ଶିଶୁପାଳ ସଭାମଧ୍ୟରେ ଭୀଷ୍ମ ଓ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଉଲାହନା ଦେଇ, ବାସୁଦେବଙ୍କ ଉପରେ ଆକ୍ଷେପ କରିବାକୁ ଲାଗିଲା।

Verse 35

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापवके अन्तर्गत राजस्‌यपर्वमें यज्ञकरणविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ରାଜସୂୟପର୍ବରେ ଯଜ୍ଞକରଣବିଷୟକ ପଞ୍ଚତ୍ରିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 36

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि श्रीकृष्णार्घ्यदाने षट्त्रिंशो 5 ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବରେ ଅର୍ଘ୍ୟାଭିହରଣପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣାର୍ଘ୍ୟଦାନବିଷୟକ ଷଟ୍ତ୍ରିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 231

तस्मिन्‌ धर्मविदां श्रेष्ठो धर्मराजस्य धीमत: । महाध्वरे महाबुद्धिस्तस्थौ स बहुमानत:

ସେହି ଧୀମାନ୍ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ମହାଯଜ୍ଞରେ ଧର୍ମବିଦମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ସେ ପୁରୁଷ ମହାସମ୍ମାନରେ ସେଠାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଲେ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether public precedence should follow intrinsic worth (as argued for Kṛṣṇa) or political rank and rivalry, given that honoring one figure can be read as diminishing others in a competitive assembly.

The chapter teaches that legitimacy in public life depends on reasoned endorsement, ritual propriety, and consensus management; it also warns that unaddressed envy can convert symbolic honor into strategic destabilization.

No explicit phalaśruti is presented here; the meta-significance is conveyed indirectly through omens (flower-rain, acclamations) and the narrative function of Nārada as an authoritative validator within the epic’s ethical frame.