Adhyaya 33
Sabha ParvaAdhyaya 3356 Verses

Adhyaya 33

Adhyāya 33: Antarvedī-Samāgama, Arghya-Nirṇaya, and Śiśupāla’s Objection

Upa-parva: Rājasūya–Sabhā-Satkāra (Honor, Precedence, and Arghya in the Assembly)

Vaiśaṃpāyana describes the consecration-day gathering in Yudhiṣṭhira’s inner ritual precinct, where brāhmaṇas, kings, and mahārṣis assemble. Nāradā and other sages sit with rājarṣis; learned disputation and dharma-artha discourse unfold, and the vedī is portrayed as radiant with Veda-knowing elites. The narration notes a controlled ritual environment in the antarvedī. Nārada observes the grandeur and recalls a prior divine context connected to Nārāyaṇa’s descent and the gathering of powers, framing Kṛṣṇa’s presence as exceptional within a human court. Bhīṣma then instructs Yudhiṣṭhira to perform appropriate honoring (arhaṇa) for the arriving kings and lists categories of those worthy of arghya; he recommends offering it to the most eminent among them. Yudhiṣṭhira asks whom to choose. Bhīṣma decisively names Kṛṣṇa as the foremost; Kṛṣṇa is praised as outshining the assembly. With Bhīṣma’s approval, Sahadeva offers the arghya to Kṛṣṇa, who accepts according to śāstric procedure. Śiśupāla, unable to tolerate the honor shown to Vāsudeva, censures Bhīṣma and Yudhiṣṭhira in the assembly and directs a verbal attack at Kṛṣṇa, initiating a public rupture in the ritual-political order.

Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर के न्यायपूर्ण शासन से राज्य में अद्भुत समृद्धि का उदय होता है—मेघ ‘निकामवर्षी’ बनते हैं और जनपद स्फीत हो उठता है। → समृद्धि केवल प्रकृति की कृपा नहीं, राजधर्म की कसौटी बनती है: कर-ग्रहण ‘न्यायपूर्वक’ हो, दान ‘सम्यग्’ हो, और गोरक्षा, कृषि, वाणिज्य—सब ‘सुप्रवृत्त’ रहें। इसी बीच युधिष्ठिर अपने कोष-धान्यागार का परिमाण जानकर एक महान यज्ञ (राजसूय) की तैयारी का संकल्प करते हैं। → युधिष्ठिर देवकीसुत माधव से कहते हैं कि यह समस्त धन विधिवत् श्रेष्ठ ब्राह्मणों और हव्यवाहन (अग्नि) में अर्पित करना चाहते हैं—धन का शिखर अब ‘यज्ञ’ में रूपांतरित होने को तत्पर है। → युधिष्ठिर की बात समाप्त होते ही सहदेव तत्क्षण आवश्यक व्यवस्थाओं का निवेदन/प्रस्ताव रखते हैं; फिर युधिष्ठिर नकुल को हस्तिनापुर भेजते हैं—भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, विदुर, कृप तथा अन्य अनुरक्त कौरव-सम्बन्धियों को आमंत्रित/सूचित करने हेतु। दूर-दूर देशों से वेद-वेदांग पारंगत ब्राह्मणों का आगमन आरम्भ होता है। → राजसूय की विराट तैयारी के साथ यह प्रश्न हवा में रहता है—क्या यह यज्ञ केवल धर्म-प्रतिष्ठा बनेगा, या राजकीय ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा को भी जगा देगा?

Shlokas

Verse 1

नस्ममा न (0) आसजअन+- - इसीको आजकल रोहतक (पंजाब) कहते हैं। (राजसूयपर्व) त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना वैशम्पायन उवाच (एवं निर्जित्य पृथिवीं भ्रातर: कुरुनन्दन । वर्तमाना: स्वधर्मेण शशासु: पृथिवीमिमाम्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--कुशनन्दन! इस प्रकार सारी पृथ्वीको जीतकर अपने धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए पाँचों भाई पाण्डव इस भूमण्डलका शासन करने लगे। चतुर्भिर्भीमसेनाद्यैर्भ्रातृभि: सहितो नृप: । अनुग॒ृहा प्रजा: सर्वा: सर्ववर्णानगोपयत्‌ ।। भीमसेन आदि चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्छिर सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह करते हुए सब वर्णके लोगोंको संतुष्ट रखते थे। अविरोधेन सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिर: । प्रीयतां दीयतां सर्व मुक्त्वा कोषं बल॑ं विना ।। साधु धर्मेति पार्थस्य नान्यच्छुयेत भाषितम्‌ । युधिष्ठिर किसीका भी विरोध न करके सबके हितसाधनमें लगे रहते थे। “सबको तृप्त एवं प्रसन्न किया जाय, खजाना खोलकर सबको खुले हाथ दान दिया जाय, किसीपर बलप्रयोग न किया जाय, धर्म! तुम धन्य हो।” इत्यादि बातोंके सिवा युधिष्ठिरके मुखसे और कुछ नहीं सुनायी पड़ता था। एवंवृत्ते जगत्‌ तस्मिन्‌ पितरीवान्वरज्यत ।। न तस्य विद्यते द्वेष्ठा ततो5स्थाजात शत्रुता ।) उनके ऐसे बर्तावके कारण सारा जगत्‌ उनके प्रति वैसा ही अनुराग रखने लगा, जैसे पुत्र पिताके प्रति अनुरक्त होता है। राजा युधिष्ठिरसे द्वेष रखनेवाला कोई नहीं था, इसीलिये वे “अजातशत्रु' कहलाते थे। रक्षणाद्‌ धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात्‌ | शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरता: प्रजा:,धर्मराज युधिष्छिर प्रजाकी रक्षा, सत्यका पालन और शत्रुओंका संहार करते थे। उनके इन कार्योसे निश्चिन्त एवं उत्साहित होकर प्रजावर्गके सब लोग अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोके पालनमें संलग्न रहते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! ଏହିପରି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଜୟ କରି, ନିଜ-ନିଜ ଧର୍ମ ଅନୁସାରେ ଆଚରଣ କରୁଥିବା ସେ ଭ୍ରାତୃଗଣ ଏହି ଭୂମଣ୍ଡଳକୁ ଶାସନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ଭୀମସେନ ଆଦି ଚାରି ଭାଇଙ୍କ ସହିତ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସମସ୍ତ ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ଅନୁଗ୍ରହ କରି, ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରୁଥିଲେ। ଯୁଧିଷ୍ଠିର କାହା ସହିତ ବିରୋଧ ନ କରି ସମସ୍ତଙ୍କ ହିତ ସାଧନରେ ଲାଗି ରହୁଥିଲେ। “ସମସ୍ତଙ୍କୁ ତୃପ୍ତ ଓ ପ୍ରସନ୍ନ କର; କୋଷ ଖୋଲି ଦାନ ଦିଅ; ବଳପ୍ରୟୋଗ କରନି; ଧର୍ମ ଧନ୍ୟ”—ଏହା ଛଡ଼ା ପାର୍ଥଙ୍କ ମୁଖରୁ ଅନ୍ୟ କିଛି ଶୁଣାଯାଉ ନଥିଲା। ଏପରି ଆଚରଣରୁ ଜଗତ ପୁତ୍ର ପିତା ପ୍ରତି ଯେପରି ଅନୁରକ୍ତ ହୁଏ, ସେପରି ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଅନୁରକ୍ତ ହେଲା। ତାଙ୍କର କୌଣସି ଦ୍ୱେଷ୍ଟା ନଥିଲା; ତେଣୁ ସେ ‘ଅଜାତଶତ୍ରୁ’ ଭାବେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ହେଲେ। ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ରକ୍ଷା, ସତ୍ୟପାଳନ ଓ ଶତ୍ରୁନାଶ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରଜାମାନେ ନିଶ୍ଚିନ୍ତ ହୋଇ ନିଜ-ନିଜ ବର୍ଣ୍ଣାଶ୍ରମୋଚିତ କର୍ମରେ ନିରତ ରହିଲେ।

Verse 2

बलीनां सम्यगादानादू धर्मतश्नानुशासनात्‌ | निकामवर्षी पर्जन्य: स्फीतो जनपदो5भवत्‌,न्यायपूर्वक कर लेने और धर्मपूर्वक शासन करनेसे उनके राज्यमें मेघ इच्छानुसार वर्षा करते थे। इस प्रकार युधिष्ठिरका सम्पूर्ण जनपद धन-धान्यसे सम्पन्न हो गया था

ବଳବାନମାନଙ୍କଠାରୁ ନ୍ୟାୟପୂର୍ବକ କର ଗ୍ରହଣ ଓ ଧର୍ମାନୁସାରେ ଶାସନ ହେବାରୁ ମେଘ ଇଚ୍ଛାମତେ ବର୍ଷା କରୁଥିଲେ। ଏଭଳି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସମଗ୍ର ଜନପଦ ଧନ-ଧାନ୍ୟରେ ସମୃଦ୍ଧ ହୋଇଉଠିଲା।

Verse 3

सर्वारम्भा: सुप्रवृत्ता गोरक्षा कर्षणं वणिक्‌ । विशेषात्‌ सर्वमेवैतत्‌ संजज्ञे राजकर्मण:,गोरक्षा, खेती और व्यापार आदि सभी कार्य अच्छे ढंगसे होने लगे। विशेषतः राजाकी सुव्यवस्थासे ही यह सब कुछ उत्तमरूपसे सम्पन्न होता था

ଗୋରକ୍ଷା, କୃଷି ଓ ବାଣିଜ୍ୟ ଆଦି ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟ ସୁଚାରୁ ଭାବେ ଫଳିବାକୁ ଲାଗିଲା। ବିଶେଷତଃ ରାଜାଙ୍କ ସୁସଂଗଠିତ ରାଜକର୍ମ ଦ୍ୱାରା ଏହି ସବୁ ଉତ୍ତମ ଭାବେ ସିଦ୍ଧ ହେଉଥିଲା।

Verse 4

दस्युभ्यो वज्चकेभ्यो वा राजन्‌ प्रति परस्परम्‌ । राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयन्त मृषा गिर:,राजन! औरोंकी तो बात ही क्‍या है, चोरों, ठगों, राजा अथवा राजाके विश्वासपात्र व्यक्तियोंके मुखसे भी वहाँ कोई झूठी बात नहीं सुनी जाती थी। केवल प्रजाके साथ ही नहीं, आपसमें भी वे लोग झूठ-कपटका बर्ताव नहीं करते थे

ହେ ରାଜନ୍! ସେଠାରେ ଚୋର କିମ୍ବା ଠକମାନଙ୍କଠାରୁ ତ ଦୂର କଥା, ରାଜାଙ୍କ ପ୍ରିୟ ଓ ବିଶ୍ୱାସପାତ୍ର ଲୋକମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ମଧ୍ୟ ମିଥ୍ୟା କଥା ଶୁଣାଯାଉନଥିଲା। ସେମାନେ ପ୍ରଜାଙ୍କ ପ୍ରତି ମାତ୍ର ନୁହେଁ, ପରସ୍ପର ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଛଳ-କପଟ ଓ ଅସତ୍ୟର ବ୍ୟବହାର କରୁନଥିଲେ।

Verse 5

अवर्ष चातिवर्ष च व्याधिपावकमूर्च्छनम्‌ । सर्वमेतत्‌ तदा नासीद्‌ धर्मनित्ये युधिषछिरे,धर्मपरायण युधिष्ठिरके शासनकालमें अनावृष्टि, अतिवृष्टि, रोग-व्याधि तथा आग लगने आदि उपद्रवोंका नाम भी नहीं था

ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶାସନକାଳରେ ନ ଅନାବୃଷ୍ଟି ଥିଲା, ନ ଅତିବୃଷ୍ଟି; ନ ରୋଗ-ବ୍ୟାଧିର ପ୍ରକୋପ, ନ ଅଗ୍ନି-ଉପଦ୍ରବ। ସେତେବେଳେ ଏହି ସବୁ ବିପତ୍ତିର ନାମ ମଧ୍ୟ ନଥିଲା।

Verse 6

प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वभावजम्‌ | अभिहर्तु नृपा जम्मुर्नान्यि: कार्य: कथंचन,राजा लोग उनके यहाँ स्वाभाविक भेंट देने अथवा उनका कोई प्रिय कार्य करनेके लिये ही आते थे, युद्ध आदि दूसरे किसी कामसे नहीं

ରାଜାମାନେ ସେଠାକୁ ସ୍ୱାଭାବିକ ଭାବେ ଦେୟ ଭେଟି-କର ଅର୍ପଣ କରିବା ଓ କିଛି ପ୍ରିୟ ସେବା କରିବା ପାଇଁ ମାତ୍ର ଆସୁଥିଲେ; ଯୁଦ୍ଧ କିମ୍ବା ବଳପ୍ରୟୋଗ ପରି ଅନ୍ୟ କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ କେବେ ନୁହେଁ।

Verse 7

धर्म्यर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचयो महान्‌ । कर्तु यस्य न शक्‍्येत क्षयो वर्षशतैरपि,धर्मपूर्वक प्राप्त होनेवाले धनकी आयसे उनका महान्‌ धन-भण्डार इतना बढ़ गया था कि सैकड़ों वर्षोतक खुले हाथ लुटानेपर भी उसे समाप्त नहीं किया जा सकता था

ଧର୍ମସମ୍ମତ ଓ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଉପାୟରେ ଲାଭିତ ଧନଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କର ମହା ଧନଭଣ୍ଡାର ଏତେ ବଢ଼ିଗଲା ଯେ ଶତଶତ ବର୍ଷ ମୁକ୍ତହସ୍ତେ ବ୍ୟୟ କଲେ ମଧ୍ୟ ତାହା ଶେଷ ହେବା ସମ୍ଭବ ନ ଥିଲା।

Verse 8

स्वकोष्ठस्य परीमाणं कोशस्य च महीपति: । विज्ञाय राजा कौन्तेयो यज्ञायैव मनो दथे,कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने अन्न-वस्त्रके भंडार तथा खजानेका परिमाण जानकर यज्ञ करनेका ही निश्चय किया

ନିଜ ଅନ୍ନ-ବସ୍ତ୍ର ଭଣ୍ଡାର ଓ ଖଜାନାର ପରିମାଣ ଜାଣି, କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମନକୁ କେବଳ ଯଜ୍ଞ କରିବାରେ ନିଶ୍ଚିତ କଲେ।

Verse 9

सुहृदश्चैव ये सर्वे पूृथक्‌ च सह चाब्रुवन्‌ | यज्ञकालस्तव विभो क्रियतामत्र साम्प्रतम्‌,उनके जितने हितैषी सुहृद्‌ थे, वे सभी अलग-अलग और एक साथ यही कहने लगे --'प्रभो! यह आपके यज्ञ करनेका उपयुक्त समय आया है; अत: अब उसका आरम्भ कीजिये”

ତାଙ୍କର ସମସ୍ତ ହିତେଷୀ ସୁହୃଦମାନେ—କେହି ପୃଥକ୍, କେହି ଏକସାଥି—ବାରମ୍ବାର କହିଲେ: “ବିଭୋ! ଆପଣଙ୍କ ଯଜ୍ଞର ଉଚିତ ସମୟ ଆସିଛି; ତେଣୁ ଏଠାରେ ଏବେଇ ତାହା ଆରମ୍ଭ କରନ୍ତୁ।”

Verse 10

अथीैवं ब्रुवतामेव तेषाम भ्याययौ हरि: । ऋषि: पुराणो वेदात्मादृश्यश्वैव विजानताम्‌,वे सुहृदू इस तरहकी बातें कर ही रहे थे कि उसी समय भगवान्‌ श्रीहरि आ पहुँचे। वे पुराणपुरुष, नारायण ऋषि, वेदात्मा एवं विज्ञानीजनोंके लिये भी अगम्य परमेश्वर हैं

ସେମାନେ ଏପରି କହୁଥିବା ସମୟରେ ହରି ସେଠାରେ ଆସି ପହଞ୍ଚିଲେ—ସେ ପୁରାତନ ଋଷି, ବେଦାତ୍ମା; ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଦୁର୍ଲଭ-ଦର୍ଶନ।

Verse 11

जगतस्तस्थुषां श्रेष्ठ: प्रभवश्वाप्ययश्न ह । भूतभव्यभवन्नाथ: केशव: केशिसूदन:,वे ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके उत्तम उत्पत्ति-स्थान और लयके अधिष्ठान हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों कालोंके नियन्ता हैं। वे ही केशी दैत्यको मारनेवाले केशव हैं

କେଶୀ ଦାନବଙ୍କୁ ବଧ କରିଥିବା କେଶବ—ଚରାଚର ଜଗତରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ସୃଷ୍ଟିର ଉତ୍ସ ମଧ୍ୟ ସେ, ଲୟର ଆଧାର ମଧ୍ୟ ସେ। ଭୂତ, ବର୍ତ୍ତମାନ ଓ ଭବିଷ୍ୟତ—ତିନି କାଳର ନାଥ ମଧ୍ୟ ସେଇ।

Verse 12

प्राकार: सर्ववृष्णीनामापत्स्वभयदो<रिहा । बलाधिकारे निक्षिप्य सम्यगानकदुन्दुभिम्‌,वे सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंके परकोटेकी भाँति संरक्षक, आपत्तिमें अभय देनेवाले तथा उनके शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। पुरुषसिंह माधव अपने पिता वसुदेवजीको द्वारकाकी सेनाके आधिपत्यपर स्थापित करके धर्मराजके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट ले विशाल सेनाके साथ वहाँ आये थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ସମସ୍ତ ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀଙ୍କ ପାଇଁ ଯେନ ପ୍ରାକାର—ଆପଦରେ ଅଭୟଦାତା ଓ ଶତ୍ରୁନାଶକ। ଦ୍ୱାରକା ସେନାର ଅଧିକାରରେ ଆନକଦୁନ୍ଦୁଭି (ବସୁଦେବ)ଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରି, ପୁରୁଷସିଂହ ମାଧବ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ପାଇଁ ନାନାପ୍ରକାର ଧନ-ରତ୍ନ ଉପହାର ନେଇ, ବିଶାଳ ସେନା ସହ ସେଠାକୁ ଆସିଲେ।

Verse 13

उच्चावचमुपादाय धर्मराजाय माधव: । धनौघं पुरुषव्याप्रो बलेन महता55वृत:,वे सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंके परकोटेकी भाँति संरक्षक, आपत्तिमें अभय देनेवाले तथा उनके शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। पुरुषसिंह माधव अपने पिता वसुदेवजीको द्वारकाकी सेनाके आधिपत्यपर स्थापित करके धर्मराजके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट ले विशाल सेनाके साथ वहाँ आये थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମାଧବ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ପାଇଁ ନାନାପ୍ରକାର ଉପହାର ନେଇ, ଧନର ମହାପ୍ରବାହ ସମ ଅପାର ସମ୍ପଦ ସହ, ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର ପରି, ମହାବଳରେ ପରିବୃତ ହୋଇ ସେଠାକୁ ଆସିଲେ।

Verse 14

त॑ धनौघमपर्यन्तं रत्नसागरमक्षयम्‌ | नादयन्‌ रथघोषेण प्रविवेश पुरोत्तमम्‌,उस धनराशिकी कहीं सीमा नहीं थी, मानो रत्नोंका अक्षय महासागर हो। उसे लेकर रथोंकी आवाजसे समूची दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वे उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें प्रविष्ट हुए

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ଧନସମୂହର କୌଣସି ସୀମା ନଥିଲା—ଯେନ ରତ୍ନର ଅକ୍ଷୟ ସାଗର। ତାହା ନେଇ, ରଥଘୋଷରେ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ନାଦିତ କରି, ସେମାନେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନଗର ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।

Verse 15

पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहो 5भवत्‌ | असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना । कृष्णेन समुपेतेन जहृषे भारतं पुरम्‌,पाण्डवोंका धन-भण्डार तो यों ही भरा-पूरा था, भगवानने (उन्हें अक्षय धनकी भेंट देकर) उसे और भी पूर्ण कर दिया। उनका शुभागमन पाण्डवोंके शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाला था। बिना सूर्यका अन्धकारपूर्ण जगत्‌ सूर्योदय होनेसे जिस प्रकार प्रकाशसे भर जाता है, बिना वायुके स्थानमें वायुके चलनेसे जैसे नूतन प्राण-शक्तिका संचार हो उठता है, उसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्णके पदार्पण करनेपर समस्त इन्द्रप्रस्थमें हर्षोल्लास छा गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ତାଙ୍କର ସମୃଦ୍ଧିକୁ ଆହୁରି ପୂର୍ଣ୍ଣ କଲେ; କିନ୍ତୁ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସେ ଆଗମନ ଶୋକକାରଣ ହେଲା। ଯେପରି ସୂର୍ଯ୍ୟ ଉଦୟ ହେଲେ ସୂର୍ଯ୍ୟହୀନ ଜଗତ ଆଲୋକରେ ପୂରିଯାଏ, ଏବଂ ଯେପରି ପବନ ବହିଲେ ନିର୍ବାତ ନିଶ୍ଚଳତା ନୂତନ ପ୍ରାଣଶକ୍ତିରେ ଜାଗିଉଠେ, ସେପରି କୃଷ୍ଣ ଆସିଲେ ଭାରତମାନଙ୍କ ନଗର (ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥ) ହର୍ଷରେ ଉଲ୍ଲସିତ ହେଲା।

Verse 16

त॑ मुदाभिसमागम्य सत्कृत्य च यथाविधि । स पृष्टवा कुशलं चैव सुखासीनं युधिष्ठिर:,नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा युधिष्छिर बड़े प्रसन्न होकर उनसे मिले। उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार करके कुशलमंगल पूछा और जब वे सुखपूर्वक बैठ गये, तब धौम्य, द्वैपायन आदि ऋत्विजों तथा भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव--चारों भाइयोंके साथ निकट जाकर युधिष्ठिरने श्रीकृष्णसे कहा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜନମେଜୟ! ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଆନନ୍ଦରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ି ତାଙ୍କୁ ମିଶିଲେ। ଯଥାବିଧି ସ୍ୱାଗତ-ସତ୍କାର କରି କୁଶଳମଙ୍ଗଳ ପଚାରିଲେ; ଅତିଥି ସୁଖାସୀନ ହେବା ପରେ, ଧୌମ୍ୟ, ଦ୍ୱୈପାୟନ ଆଦି ଋତ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ସହ ଏବଂ ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନ, ନକୁଳ, ସହଦେବ—ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ନିକଟକୁ ଯାଇ, ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 17

धौम्यद्वैपायनमुखैर्त्विग्भि: पुरुषर्षभ । भीमार्जुनयमैश्वैव सहित: कृष्णमब्रवीत्‌,नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा युधिष्छिर बड़े प्रसन्न होकर उनसे मिले। उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार करके कुशलमंगल पूछा और जब वे सुखपूर्वक बैठ गये, तब धौम्य, द्वैपायन आदि ऋत्विजों तथा भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव--चारों भाइयोंके साथ निकट जाकर युधिष्ठिरने श्रीकृष्णसे कहा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପୁରୁଷର୍ଷଭ, ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜନମେଜୟ! ଧୌମ୍ୟ ଓ ଦ୍ୱୈପାୟନ ପ୍ରମୁଖ ଋତ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ସହ, ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନ ଓ ଯମଜ (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ସହିତ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର କୃଷ୍ଣଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ। ସେ ବିଧିପୂର୍ବକ ସ୍ୱାଗତ-ସତ୍କାର କରି କୁଶଳମଙ୍ଗଳ ପଚାରିଲେ; ସେମାନେ ସୁଖାସୀନ ହେବା ପରେ ଗୁରୁଜନ ଓ ଭ୍ରାତୃମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଧର୍ମାନୁସାରେ କଥା କହିଲେ।

Verse 18

युधिछिर उवाच त्वत्कृते पृथिवी सर्वा मद्वशे कृष्ण वर्तते । धनं च बहु वार्ष्णेय त्वत्प्रसादादुपार्जितम्‌,युधिष्ठिरने कहा--श्रीकृष्ण/ आपकी दयासे आपकी सेवाके लिये सारी पृथ्वी इस समय मेरे अधीन हो गयी है। वार्ष्णेय! मुझे धन भी बहुत प्राप्त हो गया है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ତୁମ ଦ୍ୱାରା ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଏବେ ମୋ ବଶରେ ରହି ସେବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ତୁମ କୃପାରୁ ମୋତେ ବହୁ ଧନ ମଧ୍ୟ ଲଭିଛି।

Verse 19

सो5हमिच्छामि तत्‌ सर्व विधिवद्‌ देवकीसुत । उपय क्तुं द्विजाग्रयेभ्यो हव्यवाहे च माधव,देवकीनन्दन माधव! वह सारा धन मैं विधिपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा हव्यवाहन अग्निके उपयोगमें लाना चाहता हूँ

ଏହେତୁ, ହେ ଦେବକୀସୁତ ମାଧବ! ସେ ସମସ୍ତ ଧନକୁ ମୁଁ ବିଧିପୂର୍ବକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ (ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ) ଦାନରେ ଏବଂ ହବ୍ୟବାହନ ଅଗ୍ନିରେ ଆହୁତିରେ ବ୍ୟବହାର କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି।

Verse 20

तदहं यटष्टमिच्छामि दाशा्ह सहितस्त्वया । अनुजैश्न महाबाहो तन्मानुज्ञातुमहसि,महाबाहु दाशार्ह! अब मैं आप तथा अपने छोटे भाइयोंके साथ यज्ञ करना चाहता हूँ। इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें

ଏହେତୁ, ହେ ମହାବାହୁ ଦାଶାର୍ହ! ମୁଁ ତୁମ ସହିତ ଏବଂ ମୋ ଅନୁଜ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କ ସହ ଯଜ୍ଞ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ଦୟାକରି ତାହାକୁ ଅନୁମୋଦନ କର।

Verse 21

तद्‌ दीक्षापय गोविन्द त्वमात्मानं महाभुज । त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता हाहम्‌,विशाल भुजाओंवाले गोविन्द! आप स्वयं यज्ञकी दीक्षा ग्रहण कीजिये। दाशाहई! आपके यज्ञ करनेपर मैं पापरहित हो जाऊँगा

ଏହେତୁ, ହେ ମହାଭୁଜ ଗୋବିନ୍ଦ! ତୁମେ ନିଜେ ଯଜ୍ଞଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କର। ହେ ଦାଶାର୍ହ! ତୁମେ ଯଜ୍ଞ କରିଲେ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ପାପରହିତ ହେବି।

Verse 22

मां वाप्यभ्यनुजानीहि सहैभिरनुजैर्विभो | अनुज्ञातस्त्वया कृष्ण प्राप्त॒यां क्रतुमुत्तमम्‌,प्रभो! अथवा मुझे अपने इन छोटे भाइयोंके साथ दीक्षा ग्रहण करनेकी आज्ञा दीजिये। श्रीकृष्ण! आपकी अनुज्ञा मिलनेपर ही मैं उस उत्तम यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करूँगा

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଭୁ, ମୋ ଛୋଟ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଅନୁମତି ଦିଅନ୍ତୁ। ହେ କୃଷ୍ଣ, ଆପଣଙ୍କ ଅନୁଜ୍ଞା ମିଳିଲେ ମାତ୍ର ମୁଁ ସେଇ ଉତ୍ତମ ଯଜ୍ଞର ଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରିବି; କାରଣ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମତି ଓ କ୍ରମରୁ ହିଁ ମୋର ଧର୍ମକାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ।

Verse 23

वैशम्पायन उवाच त॑ं कृष्ण: प्रत्युवाचेदं बहूकत्वा गुणविस्तरम्‌ । त्वमेव राजशार्दूल सम्राडहों महाक्रतुम्‌ । सम्प्राप्रुहि त्वया प्राप्ते कृतकृत्यास्ततो वयम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने राजसूययज्ञके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करके उनसे इस प्रकार कहा--'राजसिंह! आप सम्राट होने योग्य हैं, अतः आप ही इस महान्‌ यज्ञकी दीक्षा ग्रहण कीजिये। आपके दीक्षा लेनेपर हम सबलोग कृतकृत्य हो जायँगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତେବେ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞର ଗୁଣମହିମାକୁ ବିସ୍ତାରରେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରି କହିଲେ—“ହେ ରାଜଶାର୍ଦୂଳ, ସମ୍ରାଟ ହେବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ତୁମେ ହିଁ; ତେଣୁ ଏହି ମହାକ୍ରତୁର ଦୀକ୍ଷା ତୁମେ ଗ୍ରହଣ କର। ତୁମେ ଦୀକ୍ଷିତ ହେଲେ ଆମେ ସମସ୍ତେ କୃତକୃତ୍ୟ ହେବୁ।”

Verse 24

यजस्वाभीप्सितं यज्ञ मयि श्रेयस्यवस्थिते । नियुद्धक्ष्व त्वं च मां कृत्ये सर्व कर्तास्मि ते वच:,आप अपने इस अभीष्ट यज्ञको प्रारम्भ कीजिये। मैं आपका कल्याण करनेके लिये सदा उद्यत हूँ। मुझे आवश्यक कार्यमें लगाइये, मैं आपकी सब आज्ञाओंका पालन करूँगा”

“ତୁମ ଅଭୀଷ୍ଟ ଯଜ୍ଞ ଆରମ୍ଭ କର; ତୁମ ଶ୍ରେୟସ୍ ପାଇଁ ମୁଁ ସଦା ପ୍ରସ୍ତୁତ। ଯେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ, ସେଥିରେ ମୋତେ ନିଯୁକ୍ତ କର—ମୁଁ ତୁମ ସମସ୍ତ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କରିବି।”

Verse 25

युधिछिर उवाच सफल: कृष्ण संकल्प: सिद्धिश्व नियता मम । यस्य मे त्वं हृषीकेश यथेप्सितमुपस्थित:,युधिष्ठिर बोले--श्रीकृष्ण मेरा संकल्प सफल हो गया, मेरी सिद्धि सुनिश्चित है; क्योंकि हृषीकेश! आप मेरी इच्छाके अनुसार स्वयं ही यहाँ उपस्थित हो गये हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ, ମୋର ସଙ୍କଳ୍ପ ସଫଳ ହେଲା, ମୋର ସିଦ୍ଧି ନିଶ୍ଚିତ; କାରଣ ହେ ହୃଷୀକେଶ, ମୋ ଇଚ୍ଛାଅନୁସାରେ ଆପଣ ସ୍ୱୟଂ ଏଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇଛନ୍ତି।

Verse 26

वैशम्पायन उवाच अनुज्ञातस्तु कृष्णेन पाण्डवो भ्रातृभि: सह | ईजितुं राजसूयेन साधनान्युपचक्रमे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान्‌ श्रीकृष्णसे आज्ञा लेकर भाइयोंसहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने राजसूययज्ञ करनेके लिये साधन जुटाना आरम्भ किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଅନୁମତି ପାଇ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ କରିବା ପାଇଁ ଆବଶ୍ୟକ ସାଧନସାମଗ୍ରୀ ସଂଗ୍ରହ କରିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।

Verse 27

ततस्त्वाज्ञापयामास पाण्डवो5रिनिबर्हण: । सहदेवं युधां श्रेष्ठ मन्त्रिणश्वैव सर्वश:,उस समय शशत्रुओंका संहार करनेवाले पाण्डुकुमारने योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेव तथा सम्पूर्ण मन्त्रियोंको आज्ञा दी

ତେବେ ଶତ୍ରୁନିବାରକ ପାଣ୍ଡବ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସହଦେବଙ୍କୁ ଏବଂ ସମସ୍ତ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଆଜ୍ଞା ଦେଲେ।

Verse 28

अस्मिन्‌ क्रतौ यथोक्तानि यज्ञाड़नि द्विजातिभि: । तथोपकरणं सर्व मड़लानि च सर्वश:,“इस यज्ञके लिये ब्राह्मणोंके बताये अनुसार यज्ञके अंगभूत सामान, आवश्यक उपकरण, सब प्रकारकी मांगलिक वस्तुएँ तथा धौम्यजीकी बतायी हुई यज्ञोपयोगी सामग्री >-इन सभी वस्तुओंको क्रमशः जैसे मिलें, वैसे शीघ्र ही अपने सेवक जाकर ले आवें

ଏହି କ୍ରତୁରେ ଦ୍ୱିଜମାନେ (ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ) ଯଥାକଥିତ ଯଜ୍ଞାଙ୍ଗସମଗ୍ରୀ, ସମସ୍ତ ଆବଶ୍ୟକ ଉପକରଣ ଏବଂ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ମଙ୍ଗଳଦ୍ରବ୍ୟ ମଧ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ସଂଗ୍ରହ କରାଯାଉ।

Verse 29

अधियज्ञांश्न॒ सम्भारान्‌ धौम्योक्तान्‌ क्षिप्रमेव हि । समानयमन्तु पुरुषा यथायोगं यथाक्रमम्‌,“इस यज्ञके लिये ब्राह्मणोंके बताये अनुसार यज्ञके अंगभूत सामान, आवश्यक उपकरण, सब प्रकारकी मांगलिक वस्तुएँ तथा धौम्यजीकी बतायी हुई यज्ञोपयोगी सामग्री >-इन सभी वस्तुओंको क्रमशः जैसे मिलें, वैसे शीघ्र ही अपने सेवक जाकर ले आवें

ଧୌମ୍ୟଙ୍କ ଉକ୍ତ ଯଜ୍ଞାଙ୍ଗ-ସମ୍ଭାରକୁ ପୁରୁଷମାନେ (ସେବକମାନେ) ଶୀଘ୍ର ଆଣି, ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଓ ଯଥାକ୍ରମେ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରନ୍ତୁ।

Verse 30

इन्द्रसेनो विशोकश्न पूरुश्चार्जुनसारथि: । अन्नाद्याहरणे युक्ता: सन्‍्तु मत्प्रियकाम्यया,“इन्द्रसेन, विशोक और अर्जुनका सारथि पूरु, ये मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे अन्न आदिके संग्रहके कामपर जुट जायँ

ଇନ୍ଦ୍ରସେନ, ବିଶୋକ ଏବଂ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସାରଥି ପୂରୁ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ମୋତେ ପ୍ରୀତ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ଅନ୍ନାଦି ସଂଗ୍ରହ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ ହେଉନ୍ତୁ।

Verse 31

सर्वकामाश्च कार्यन्तां रसगन्धसमन्विता: । मनोरथप्रीतिकरा द्विजानां कुरुसत्तम,“कुरुश्रेष्ठ जिनको खानेकी प्राय: सभी इच्छा करते हैं, वे रस और गन्धसे युक्त भाँति- भाँतिके मिष्टात्न आदि तैयार कराये जाँय, जो ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार प्रीति प्रदान करनेवाले हों”

ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ରସ ଓ ସୁଗନ୍ଧରେ ସମନ୍ୱିତ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଭୋଜ୍ୟ ପଦାର୍ଥ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଉ, ଯାହା ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ (ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ) ଇଚ୍ଛା ପୂରଣ କରି ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୀତି ଦେବ।

Verse 32

तद्घाक्यसमकालं च कृतं सर्व न्यवेदयत्‌ । सहदेवो युधां श्रेष्ठो धर्मराजे युधिषछ्ठिरे,धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात समाप्त होते ही योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेवने उनसे निवेदन किया, “यह सब व्यवस्था हो चुकी है”

ସେହି କଥା ସମାପ୍ତ ହେବା ସହିତ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସହଦେବ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ନିବେଦନ କଲେ— “ସମସ୍ତ ବ୍ୟବସ୍ଥା ଯଥାବିଧି ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଛି।”

Verse 33

ततो द्वैपायनो राजन्नृत्विज: समुपानयत्‌ । वेदानिव महाभागान्‌ साक्षान्मूर्तिमतो द्विजान्‌,राजन! तदनन्तर द्वैपायन व्यासजी बहुत-से ऋत्विजोंको ले आये। वे महाभाग ब्राह्मण मानो साक्षात्‌ मूर्तिमान्‌ वेद ही थे इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि राजसूयदीक्षायां त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: ।। ३३ ॥।। इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापरवके अन्तर्गत राजयूयपर्वमें रजसूयदीक्षाविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ତାପରେ, ହେ ରାଜନ, ଦ୍ୱୈପାୟନ ବ୍ୟାସ ଅନେକ ଋତ୍ୱିଜଙ୍କୁ ଆଗକୁ ଆଣିଲେ। ସେହି ମହାଭାଗ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଯେନ ସାକ୍ଷାତ୍ ମୂର୍ତ୍ତିମାନ ବେଦ ହିଁ।

Verse 34

स्वयं ब्रह्मत्वमकरोत्‌ तस्य सत्यवतीसुतः । धनंजयानामृषभ: सुसामा सामगो5भवत्‌,स्वयं सत्यवतीनन्दन व्यासने उस यज्ञमें ब्रह्माका काम सँभाला। धनंजयगोत्रीय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ सुसामा सामगान करनेवाले हुए

ସେହି ଯଜ୍ଞରେ ସତ୍ୟବତୀପୁତ୍ର ବ୍ୟାସ ସ୍ୱୟଂ ବ୍ରହ୍ମା-ପୁରୋହିତର କାର୍ଯ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କଲେ। ଏବଂ ଧନଞ୍ଜୟ ବଂଶରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସୁସାମା ସାମଗାନକାରୀ (ସାମଗ) ହେଲେ।

Verse 35

याज्ञवल्क्यो बभूवाथ ब्रह्निष्ठो5 ध्वर्युसत्तम: । पैलो होता वसो: पुत्रो धौम्पेन सहितो5भवत्‌,और ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवल्क्य उस यज्ञके श्रेष्ठतम अध्वर्यु थे। वसुपुत्र पैल धौम्य मुनिके साथ होता बने थे

ତାପରେ ବ୍ରହ୍ମନିଷ୍ଠ ଯାଜ୍ଞବଲ୍କ୍ୟ ସେହି ଯଜ୍ଞର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅଧ୍ୱର୍ୟୁ ହେଲେ। ଏବଂ ବସୁପୁତ୍ର ପୈଲ ମୁନି ଧୌମ୍ୟଙ୍କ ସହିତ ହୋତା ହେଲେ।

Verse 36

एतेषां पुत्रवर्गाश्न॒ शिष्पाश्न भरतर्षभ | बशभूवुहोत्रगा: सर्वे वेदवेदाड़पारगा:,भरतश्रेष्ठ! इनके पुत्र और शिष्यवर्गके लोग, जो सब-के-सब वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान थे, 'होत्रग” (सप्तहोता) हुए

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ସେମାନଙ୍କ ପୁତ୍ରବର୍ଗ ଓ ଶିଷ୍ୟସମୂହ—ଯେମାନେ ସମସ୍ତେ ବେଦ ଓ ବେଦାଙ୍ଗରେ ପାରଙ୍ଗତ—ସମସ୍ତେ ହୋତ୍ରଗ (ସପ୍ତହୋତା) ହେଲେ।

Verse 37

ते वाचयित्वा पुण्याहमूहयित्वा च तं विधिम्‌ । शास्त्रोक्तं पूजयामासुस्तद्‌ देवयजनं महत्‌,उन सबने पुण्याहवाचन कराकर उस विधिका ऊहन (अर्थात्र 'राजसूयेन यक्ष्ये, स्वाराज्यमवाप्रवानि'--मैं स्वाराज्य प्राप्त करूँ, इस उद्देश्यसे राजसूययज्ञ करूँगा, इत्यादि रूपसे संकल्प) कराकर शास्त्रोक्त विधिसे उस महान्‌ यज्ञस्थानका पूजन कराया

ସେମାନେ ପୁଣ୍ୟାହବାଚନ କରାଇ ଏବଂ ସେହି ବିଧିର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟକୁ ସଙ୍କଳ୍ପରୂପେ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରାଇ, ଶାସ୍ତ୍ରୋକ୍ତ ବିଧିଅନୁସାରେ ଦେବଯଜନ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ସେହି ମହାନ୍ ଯଜ୍ଞସ୍ଥଳର ପୂଜା କରାଇଲେ।

Verse 38

तत्र चक्कुरनुज्ञाता: शरणान्युत शिल्पिन: । गन्धवन्ति विशालानि वेश्मानीव दिवौकसाम्‌,उस स्थानपर राजाकी आज्ञासे शिल्पियोंने देवमन्दिरोंक समान विशाल एवं सुगन्धित भवन बनाये

ସେଠାରେ ରାଜାଙ୍କ ଅନୁମତିରେ ଶିଳ୍ପୀମାନେ ଆଶ୍ରୟସ୍ଥାନ ଆଦି ନିର୍ମାଣ କଲେ—ସୁଗନ୍ଧିତ ଓ ବିଶାଳ ଭବନ, ଯେନେ ଦେବଲୋକର ଗୃହମାନ।

Verse 39

तत आज्ञापयामास स राजा राजसत्तम: | सहदेवं तदा सद्यो मन्त्रिणं पुरुषर्षभ:,तदनन्तर राजशिरोमणि नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्छिरने तुरंत ही मन्त्री सहदेवको आज्ञा दी, 'सब राजाओं तथा ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करनेके लिये तुरंत ही शीघ्रगामी दूत भेजो।' राजाकी यह बात सुनकर सहदेवने दूतोंको भेजा और कहा--

ତାପରେ ରାଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପୁରୁଷସିଂହ ସେହି ରାଜା ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ନିଜ ମନ୍ତ୍ରୀ ସହଦେବଙ୍କୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଲେ।

Verse 40

आमन्त्रणार्थ दूतांस्त्वं प्रेषयस्वाशुगान्‌ द्रुतम्‌ । उपश्रुत्य वचो राज्ञ: स दूतान्‌ प्राहिणोत्‌ तदा,तदनन्तर राजशिरोमणि नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्छिरने तुरंत ही मन्त्री सहदेवको आज्ञा दी, 'सब राजाओं तथा ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करनेके लिये तुरंत ही शीघ्रगामी दूत भेजो।' राजाकी यह बात सुनकर सहदेवने दूतोंको भेजा और कहा--

“ଆମନ୍ତ୍ରଣ ପାଇଁ ଶୀଘ୍ରଗାମୀ ଦୂତମାନଙ୍କୁ ତୁରନ୍ତ ପଠାଅ।” ରାଜାଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ସହଦେବ ସେତେବେଳେ ଦୂତମାନଙ୍କୁ ପଠାଇଲେ।

Verse 41

आमन्त्रयध्वं राष्ट्रेषु ब्राह्मणान्‌ भूमिपानथ । विशश्व मान्यान्‌ शूद्रांक्ष सर्वानानयतेति च,“तुमलोग सभी राज्योंमें घूम-घूमकर वहाँके राजाओं, ब्राह्मणों, वैश्यों तथा सब माननीय शूद्रोंको निमन्त्रित कर दो और बुला ले आओ'

“ତୁମେମାନେ ସମସ୍ତ ରାଷ୍ଟ୍ରରେ ଯାଇ ସେଠାର ଭୂମିପାଳ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଆମନ୍ତ୍ରଣ କର; ବୈଶ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ, ଏବଂ ଯେଯେ ମାନ୍ୟ ଶୂଦ୍ର ଅଛନ୍ତି—ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଡାକି ଏଠାକୁ ଆଣ।”

Verse 42

वैशम्पायन उवाच समाज्ञप्तास्ततो दूता: पाण्डवेयस्य शासनात्‌ | आमन्त्रयाम्बभूवुश्च आनयंश्वापरान्‌ द्रुतम्‌ । तथा परानपि नरानात्मन: शीघ्रगामिन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरके आदेशसे सहदेवकी आज्ञा पाकर सब शीघ्रगामी दूत गये और उन्होंने ब्राह्मण आदि सब वर्णोंके लोगोंको निमन्त्रित किया तथा बहुतोंको वे अपने साथ ही शीघ्र बुला लाये। वे अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य व्यक्तियोंको भी साथ लाना न भूले

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଆଦେଶରେ, ସହଦେବଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଦେଶ ପାଇ, ଶୀଘ୍ରଗାମୀ ଦୂତମାନେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ସେମାନେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଆଦି ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣର ଲୋକଙ୍କୁ ଆମନ୍ତ୍ରଣ କରି, ଅନେକଙ୍କୁ ତୁରନ୍ତ ସହିତ ଆଣିଲେ। ନିଜ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ଅନ୍ୟ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଡାକିବାରେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ଅବହେଳା କଲେ ନାହିଁ।

Verse 43

ततस्ते तु यथाकाल कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरम्‌ । दीक्षयाज्चक्रिरे विप्रा राजसूयाय भारत,भारत! तदनन्तर वहाँ आये हुए सब ब्राह्मणोंने ठीक समयपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राजसूययज्ञकी दीक्षा दी

ତାପରେ, ହେ ଭାରତ! ସେଠାରେ ସମାଗତ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଯଥାକାଳ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞର ଦୀକ୍ଷା ଦେଲେ।

Verse 44

दीक्षित: स तु धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिर: । जगाम यज्ञायतनं वृतो विप्रै: सहस्रश:,यज्ञकी दीक्षा लेकर धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिर सहसौ्रों ब्राह्मणोंसे घिरे हुए यज्ञमण्डपमें गये

ଯଜ୍ଞଦୀକ୍ଷା গ্ৰହଣ କରି ଧର୍ମାତ୍ମା ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସହସ୍ର ସହସ୍ର ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ହୋଇ ଯଜ୍ଞାୟତନକୁ ଗଲେ।

Verse 45

भ्रातृभिज्ञातिभिश्वैव सुहृद्धिः सचिवै: सह । क्षत्रियैश्व मनुष्येन्द्रैननादेशसमागतै:

ସେ ଭାଇମାନଙ୍କ, ଜ୍ଞାତିବର୍ଗ, ସୁହୃଦ ଓ ସଚିବମାନଙ୍କ ସହିତ ଥିଲେ; ଏବଂ ନାନା ଦେଶରୁ ସମାଗତ କ୍ଷତ୍ରିୟ ନରେନ୍ଦ୍ରମାନେ—ମନୁଷ୍ୟାଧିପତିମାନେ—ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।

Verse 46

अमात्यैश्न नरश्रेष्ठो धर्मो विग्रहवानिव । उस समय उनके सगे भाई, जाति-बन्धु, सुहृद, सहायक अनेक देशोंसे आये हुए क्षत्रिय-नरेश तथा मन्त्रिगण भी थे। नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर मूर्तिमान्‌ धर्म ही जान पड़ते थे || ४५ *3॥ आजजम्मुर्ब्राह्मणास्तत्र विषयेभ्यस्ततस्तत:

ଅମାତ୍ୟମାନଙ୍କ (ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ) ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ସେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେ ସମୟରେ ଯେନ ମୂର୍ତ୍ତିମାନ ଧର୍ମ ହିଁ ପ୍ରତୀତ ହେଉଥିଲେ।

Verse 47

तेषामावसथांक्षक्रुर्थर्मराजस्य शासनात्‌,धर्मराजकी आज्ञासे हजारों शिल्पियोंने आत्मीयजनोंके साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंके ठहरनेके लिये पृथक्‌-पृथक्‌ घर बनाये थे, जो बहुत-से अन्न और वस्त्रोंसे परिपूर्ण थे और जिनमें सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक रहनेकी सुविधाएँ थीं

ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ହଜାର ହଜାର ଶିଳ୍ପୀ, ନିଜ ନିଜ ସ୍ୱଜନଙ୍କ ସହ ଆସିଥିବା ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ରହିବା ପାଇଁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଗୃହ ନିର୍ମାଣ କଲେ—ଯେଗୁଡ଼ିକ ଅନ୍ନ ଓ ବସ୍ତ୍ରରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା ଏବଂ ସମସ୍ତ ଋତୁରେ ସୁଖରେ ବାସ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ସୁବିଧାରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଥିଲା।

Verse 48

बद्चन्नाच्छादनैर्युक्तानू सगणानां पृथक्‌ पृथक्‌ सर्वर्तुगुणसम्पन्नान्‌ शिल्पिनो5थ सहस्रशः,धर्मराजकी आज्ञासे हजारों शिल्पियोंने आत्मीयजनोंके साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंके ठहरनेके लिये पृथक्‌-पृथक्‌ घर बनाये थे, जो बहुत-से अन्न और वस्त्रोंसे परिपूर्ण थे और जिनमें सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक रहनेकी सुविधाएँ थीं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ହଜାର ହଜାର ଶିଳ୍ପୀ, ନିଜ ନିଜ ସ୍ୱଜନଙ୍କ ସହ ଆସିଥିବା ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପାଇଁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଆବାସ ନିର୍ମାଣ କଲେ। ସେ ଗୃହଗୁଡ଼ିକ ଅନ୍ନ ଓ ବସ୍ତ୍ରରେ ସୁସମୃଦ୍ଧ ଥିଲା ଏବଂ ସମସ୍ତ ଋତୁକୁ ଅନୁକୂଳ ସୁଖସୁବିଧାରେ ସଜ୍ଜିତ ଥିଲା, ଯେପରି ଅତିଥିମାନେ ସହଜରେ ଓ ଗୌରବସହିତ ବାସ କରିପାରନ୍ତି।

Verse 49

तेषु ते न्‍्यवसन्‌ राजन ब्राह्मणा नृपसत्कृता: | कथयन्त: कथा बद्दी: पश्यन्तो नटनर्तकान्‌,राजन! उन गृहोंमें वे ब्राह्मणलोग राजासे सत्कार पाकर निवास करने लगे। वहाँ वे नाना प्रकारकी कथाएँ कहते और नट-नर्तकोंके खेल देखते थे

ହେ ରାଜନ, ସେହି ଗୃହଗୁଡ଼ିକରେ ରାଜସତ୍କାର ପାଇ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ବାସ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ସେଠାରେ ସେମାନେ ନାନା ପ୍ରକାର କଥା କହୁଥିଲେ ଏବଂ ନଟ-ନର୍ତ୍ତକମାନଙ୍କ ଖେଳ-ନୃତ୍ୟ ଦେଖୁଥିଲେ।

Verse 50

भुज्जतां चैव विप्राणां वदतां च महास्वन: । अनिशं श्रूयते तत्र मुदितानां महात्मनाम्‌,वहाँ भोजन करते और बोलते हुए आनन्दमग्न महात्मा ब्राह्मणोंका निरन्तर महान्‌ कोलाहल सुनायी पड़ता था

ସେଠାରେ ଭୋଜନ କରୁଥିବା ଓ କଥାହୁଏଁଥିବା ଆନନ୍ଦମଗ୍ନ ମହାତ୍ମା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର ନିରନ୍ତର ମହା କୋଲାହଳ ଶୁଣାଯାଉଥିଲା।

Verse 51

दीयतां दीयतामेषां भुज्यतां भुज्यतामिति । एवम्प्रकारा: संजल्पा: श्रूयन्ते स्मात्र नित्यश:,“इनको दीजिये, इन्हें परोसिये, भोजन कीजिये, भोजन कीजिये” इसी प्रकारके शब्द वहाँ प्रतिदिन कानोंमें पड़ते थे

“ଏମାନଙ୍କୁ ଦିଅ, ଦିଅ; ପରିବେଷଣ କର, କର; ଭୋଜନ କର, କର”—ଏପରି ପ୍ରକାରର ଡାକଡାକି ଓ କଥାବାର୍ତ୍ତା ସେଠାରେ ପ୍ରତିଦିନ ନିତ୍ୟ ଶୁଣାଯାଉଥିଲା।

Verse 52

गवां शतसहस्राणि शयनानां च भारत । रुक्मस्य योषितां चैव धर्मराज: पृथग्‌ ददौ,भारत! धर्मराज युधिष्ठिरने एक लाख गौएँ, उतनी ही शब्याएँ, एक लाख स्वर्णमुद्राएँ तथा उतनी ही अविवाहित युवतियाँ पृथक्‌-पृथक्‌ ब्राह्मणोंको दान की

ହେ ଭାରତ! ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଦାନରୂପେ ଶତସହସ୍ର ଗୋ, ତଦ୍ରୂପ ଶୟନ, ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଓ କନ୍ୟାମାନଙ୍କୁ ଦେଲେ।

Verse 53

प्रावर्ततैवं यज्ञ: स पाण्डवस्य महात्मन: । पृथिव्यामेकवीरस्य शक्रस्येव त्रिविष्टपे,इस प्रकार स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति भूमण्डलमें अद्वितीय वीर महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका वह यज्ञ प्रारम्भ हुआ

ଏହିପରି ପୃଥିବୀରେ ଏକବୀର ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞ ଆରମ୍ଭ ହେଲା—ଯେପରି ତ୍ରିବିଷ୍ଟପରେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କର।

Verse 54

ततो युधिष्छिरो राजा प्रेषयामास पाण्डवम्‌ | नकुलं हास्तिनपुरं भीष्माय पुरुषर्षभ:,तदनन्तर पुरुषोतम राजा युधिष्ठिरने भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, विदुर, कृपाचार्य तथा दुर्योधन आदि सब भाइयों एवं अपनेमें अनुराग रखनेवाले अन्य जो लोग वहाँ रहते थे, उन सबको बुलानेके लिये पाण्डुपुत्र नकुलको हस्तिनापुर भेजा

ତାପରେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ଡାକିବା ପାଇଁ ପାଣ୍ଡବ ନକୁଳଙ୍କୁ ହସ୍ତିନାପୁରକୁ ପଠାଇଲେ।

Verse 55

द्रोणाय धृतराष्ट्राय विदुराय कृपाय च । भ्रातृणां चैव सर्वेषां येडनुरक्ता युधिष्ठिरे,तदनन्तर पुरुषोतम राजा युधिष्ठिरने भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, विदुर, कृपाचार्य तथा दुर्योधन आदि सब भाइयों एवं अपनेमें अनुराग रखनेवाले अन्य जो लोग वहाँ रहते थे, उन सबको बुलानेके लिये पाण्डुपुत्र नकुलको हस्तिनापुर भेजा

(ସନ୍ଦେଶ) ଦ୍ରୋଣ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ବିଦୁର ଓ କୃପଙ୍କୁ; ଏବଂ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପ୍ରତି ଅନୁରକ୍ତ ସମସ୍ତ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ।

Verse 463

सर्वविद्यासु निष्णाता वेदवेदाड़पारगा: । तत्पश्चात्‌ वहाँ भिन्न-भिन्न देशोंसे ब्राह्यगलोग आये, जो सम्पूर्ण विद्याओंमें निष्पात तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान्‌ थे

ତାପରେ ଭିନ୍ନ-ଭିନ୍ନ ଦେଶରୁ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ସେଠାକୁ ଆସିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତ ବିଦ୍ୟାରେ ନିଷ୍ଣାତ ଓ ବେଦ-ବେଦାଙ୍ଗରେ ପାରଙ୍ଗତ ଥିଲେ।

Frequently Asked Questions

The tension lies in selecting a single recipient of highest honor in a multi-king assembly: a procedural decision about precedence must balance ritual correctness, political stability, and perceived fairness among rival elites.

Public authority depends on transparent criteria and proper protocol; honoring the most worthy is not mere ceremony but a governance act that signals norms, consolidates consensus, and reduces arbitrariness in statecraft.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative-ethical framing, showing how ritual procedure and speech in assembly can generate downstream conflict within the epic’s broader dharma inquiry.