
मयेन सभानिर्माणम् (Maya’s Construction of the Assembly Hall)
Upa-parva: Maya-sabhā-nirmāṇa (The Construction of Maya’s Assembly Hall Episode)
Vaiśaṃpāyana narrates Maya’s address to Arjuna: he takes leave, promising a swift return (1). Maya describes a northern locale beyond Kailāsa toward Maināka and the pleasant Bindusaras region, where he had earlier fashioned a jewel-made architectural treasury and where the former assembly resources of Vṛṣaparvan are said to remain (2–4). He identifies specific items: a superior mace stored near Bindusaras, once deposited by King Yauvanāśva after battlefield victories, heavy, durable, and suited to Bhīma (5–6); and the great Varuṇa-conch Devadatta, which he vows to bestow upon Arjuna (7). The narrative then details the northern terrain—Hiraṇyaśṛṅga, the gem-like mountain, and Bindusaras associated with Bhagīratha and major sacrificial histories (8–15). Maya reaches the site, collects the mace, conch, and crystalline sabhā materials linked to Vṛṣaparvan, aided by attendants and rākṣasa helpers (16). He constructs an incomparable, widely renowned, divine, gem-built assembly hall, and distributes the mace to Bhīma and Devadatta to Arjuna (17–18). The hall’s dimensions, radiance, and materials are described with cosmic similes (19–24). Eight thousand formidable Kiṃkara rākṣasas are assigned as carriers and guardians (25–26). Maya further creates an illusion-like lotus-lake with gem-stems and rich fauna, causing some visiting kings to misperceive it and stumble (27–30). Surrounding groves, ponds, birds, and fragrant winds complete the courtly environment (31–33). The construction is completed in fourteen months and formally presented to Dharmarāja Yudhiṣṭhira (34).
Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि खाण्डव-दाह के बाद पाण्डवों के यश और वैभव का नया अध्याय खुलता है—और उसी क्षण मयासुर, जो अग्नि से बचाया गया था, कृतज्ञता का ऋण चुकाने को आगे आता है। → मयासुर पाण्डवों के लिए ऐसी सभा रचने का संकल्प करता है जो तीनों लोकों में विख्यात हो; वह पूर्वकाल के दिव्य-दैत्य-निर्मित वैभव, बिन्दुसर तीर्थ और मणिमय सामग्री का स्मरण कराता है, मानो कह रहा हो कि यह केवल भवन नहीं, प्रतिष्ठा का सिंहासन होगा। साथ ही वह संकेत देता है कि यदि वह अद्भुत सामग्री अब भी सुरक्षित है तो उसे लाकर पाण्डव-यश को स्थायी रूप देगा। → मयासुर का वरदान मूर्त रूप लेता है—भीमसेन को श्रेष्ठ गदा और अर्जुन को ‘देवदत्त’ नामक उत्तम शंख प्रदान किए जाते हैं; फिर उसी दिव्य कौशल से चौदह महीनों में मणि-रत्नों से जड़ी, मायावी जल-सरिताओं और नलिनियों वाली अप्रतिम सभा का निर्माण होता है, जिसमें भीतर ही भीतर वैदूर्य-पत्रों और मणि-नालों वाली कमलिनी तक रची जाती है। → निर्माण पूर्ण होने पर मय धर्मराज युधिष्ठिर को उस ‘यशस्विनी’ सभा का निवेदन करता है—सभा अब पाण्डव-राज्य की नई पहचान बनती है, और कृतज्ञता का ऋण स्थापत्य-वैभव में परिणत हो जाता है। → यह अद्भुत सभा, जो अभी गौरव का कारण है, आगे चलकर किसके लिए भ्रम, अहंकार और विनाश का द्वार बनेगी—यह प्रश्न हवा में टँगा रह जाता है।
Verse 1
जब अल श््मु # तृतीयो<थध्याय: मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्भुत सभाका निर्माण वैशम्पायन उवाच अथाब्रवीन्मय: पार्थमर्जुनं जयतां वरम् | आपूृच्छे त्वां गमिष्यामि पुनरेष्यामि चाप्यहम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर मयासुरने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनसे कहा--'भारत! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ। मैं एक जगह जाऊँगा और फिर शीघ्र ही लौट आऊँगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ମୟାସୁର ବିଜୟୀ ବୀରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ହେ ଭାରତ! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ଅନୁମତି ଚାହୁଁଛି। ମୁଁ ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନକୁ ଯିବି, ଏବଂ ଶୀଘ୍ର ହିଁ ପୁନର୍ବାର ଫେରିଆସିବି।”
Verse 2
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें भगवान् श्रीकृष्णकी द्वारकायात्राविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ,(विश्रुतां त्रिषु लोकेषु पार्थ दिव्यां सभां तव । प्राणिनां विस्मयकरीं तव प्रीतिविवर्धिनीम् । पाण्डवानां च सर्वेषां करिष्यामि धनंजय ।।) “कुन्तीकुमार धनंजय! मैं आपके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात एक दिव्य सभाभवनका निर्माण करूँगा। जो समस्त प्राणियोंको आश्वर्यमें डालनेवाली तथा आपके साथ ही समस्त पाण्डवोंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाली होगी। उत्तरेण तु कैलासं मैनाकं पर्वत प्रति । यियक्षमाणेषु पुरा दानवेषु मया कृतम् 'पूर्वकालमें जब दैत्यलोग कैलास पर्वतसे उत्तर दिशामें स्थित मैनाक पर्वतपर यज्ञ करना चाहते थे, उस समय मैंने एक विचित्र एवं रमणीय मणिमय भाण्ड तैयार किया था, जो बिन्दुसरके समीप सत्यप्रतिज्ञ राजा वृषपर्वाकी सभामें रखा गया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ହେ ପାର୍ଥ, ହେ ଧନଞ୍ଜୟ! ମୁଁ ତୁମ ପାଇଁ ତିନି ଲୋକରେ ବିଶ୍ରୁତ ଏକ ଦିବ୍ୟ ସଭାଭବନ ନିର୍ମାଣ କରିବି—ଯାହା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ବିସ୍ମୟରେ ନିମଗ୍ନ କରିବ ଏବଂ ତୁମର ଓ ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବଙ୍କର ପ୍ରୀତି ବଢ଼ାଇବ। ପୂର୍ବକାଳରେ, କୈଲାସର ଉତ୍ତରେ ଥିବା ମୈନାକ ପର୍ବତରେ ଦାନବମାନେ ଯଜ୍ଞ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବାବେଳେ, ମୁଁ (ସେହି କାର୍ଯ୍ୟାର୍ଥ) ଏକ ଅଦ୍ଭୁତ ନିର୍ମାଣ କରିଥିଲି।”
Verse 3
चित्र मणिमयं भाण्डं रम्यं बिन्दुसर: प्रति । सभायां सत्यसंधस्य यदासीद् वृषपर्वण:,'पूर्वकालमें जब दैत्यलोग कैलास पर्वतसे उत्तर दिशामें स्थित मैनाक पर्वतपर यज्ञ करना चाहते थे, उस समय मैंने एक विचित्र एवं रमणीय मणिमय भाण्ड तैयार किया था, जो बिन्दुसरके समीप सत्यप्रतिज्ञ राजा वृषपर्वाकी सभामें रखा गया था इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभानिर्माणे तृतीयो5ध्याय:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବିନ୍ଦୁସରସ ନିକଟରେ ସତ୍ୟସନ୍ଧ ରାଜା ବୃଷପର୍ବଣଙ୍କ ସଭାରେ ନାନା ପ୍ରକାର ରତ୍ନରେ ନିର୍ମିତ ଏକ ଅଦ୍ଭୁତ ଓ ରମ୍ୟ ମଣିମୟ ପାତ୍ର ରଖାଯାଇଥିଲା।
Verse 4
आगमिष्यामि तद् गृह यदि तिष्ठति भारत । ततः सभां करिष्यामि पाण्डवस्य यशस्विनीम्,“भारत! यदि वह अबतक वहीं होगा तो उसे लेकर पुनः लौट आऊँगा। फिर उसीसे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यशको बढ़ानेवाली सभा तैयार करूँगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ସେ ଯଦି ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସେଠାରେ ଅଛି, ମୁଁ ସେ ଗୃହକୁ ଯାଇ ତାକୁ ନେଇ ଫେରିଆସିବି; ତାପରେ ପାଣ୍ଡବ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର)ଙ୍କ ଯଶ ବଢ଼ାଇବା ଯଶସ୍ବିନୀ ସଭା ନିର୍ମାଣ କରିବି।
Verse 5
मन: प्रह्लादिनीं चित्रां सर्वरत्नविभूषिताम् । अस्ति बिन्दुसरस्युग्रा गदा च कुरुनन्दन,“जो सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, विचित्र एवं मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली होगी। कुरुनन्दन! बिन्दुसरमें एक भयंकर गदा भी है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ସଭା ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ରତ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ, ବିଚିତ୍ର ଓ ମନକୁ ଆହ୍ଲାଦିତ କରୁଥିବା ହେବ। ଏବଂ ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! ବିନ୍ଦୁସରସରେ ଏକ ଉଗ୍ର, ଭୟଙ୍କର ଗଦା ମଧ୍ୟ ଅଛି।
Verse 6
निहिता भावयाम्ेवं राज्ञा हत्वा रणे रिपून् । सुवर्णबिन्दुभिश्षित्रा गुर्वी भारसहा दृढा,“मैं समझता हूँ, राजा वृषपववनि युद्धमें शत्रुओंका संहार करके वह गदा वहीं रख दी थी। वह गदा बड़ी भारी है, विशेष भार या आघात सहन करनेमें समर्थ एवं सुदृढ़ है। उसमें सोनेकी फूलियाँ लगी हुई हैं, जिनसे वह बड़ी विचित्र दिखायी देती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୋର ଏହି ଧାରଣା ଯେ ରାଜା ରଣରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରି ସେଇ ଗଦାକୁ ସେଠାରେ ରଖିଦେଇଥିଲେ। ସୁବର୍ଣ୍ଣ ବିନ୍ଦୁମାନେ ଲାଗିଥିବାରୁ ତାହା ବିଚିତ୍ର ଦେଖାଯାଏ; ତାହା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭାରୀ, ଭାର ଓ ଆଘାତ ସହିବାରେ ସମର୍ଥ, ଏବଂ ଦୃଢ଼।
Verse 7
सा वै शतसहस्नस्य सम्मिता शत्रुधातिनी । अनुरूपा च भीमस्य गाण्डीवं भवतो यथा,'शत्रुओंका संहार करनेवाली वह गदा अकेली ही एक लाख गदाओंके बराबर है। जैसे गाण्डीव धनुष आपके योग्य है, वैसे ही वह गदा भीमसेनके योग्य होगी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁନାଶିନୀ ସେଇ ଗଦା ଏକାକୀ ହିଁ ଏକ ଲକ୍ଷ ଗଦା ସମାନ। ଯେପରି ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁଷ ଆପଣଙ୍କୁ ଯୋଗ୍ୟ, ସେପରି ସେଇ ଗଦା ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଯୋଗ୍ୟ ହେବ।
Verse 8
वारुणश्र महाशड्खो देवदत्त: सुघोषवान् | सर्वमेतत् प्रदास्यामि भवते नात्र संशय:,“वहाँ वरुणदेवका देवदत्त नामक महान् शंख भी है, जो बड़ी भारी आवाज करनेवाला है। ये सब वस्तुएँ लाकर मैं आपको भेंट करूँगा, इसमें संशय नहीं है”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଠାରେ ବରୁଣଦେବଙ୍କ ‘ଦେବଦତ୍ତ’ ନାମକ ମହାଶଙ୍ଖ ମଧ୍ୟ ଅଛି, ଯାହାର ଧ୍ୱନି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଗମ୍ଭୀର। ଏ ସମସ୍ତ ବସ୍ତୁ ଆଣି ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ଅର୍ପଣ କରିବି—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 9
इत्युक्त्वा सो5सुर: पार्थ प्रागुदीचीं दिशं गत: । अथोत्तरेण कैलासान्मैनाकं पर्वतं प्रति,अर्जुनसे ऐसा कहकर मयासुर पूर्वोत्तर दिशा (ईशानकोण)-में कैलाससे उत्तर मैनाक पर्वतके पास गया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏପରି କହି, ହେ ପାର୍ଥ, ସେ ଅସୁର ପୂର୍ବୋତ୍ତର ଦିଗକୁ ଗଲା। ପରେ କୈଲାସର ଉତ୍ତର ଦିଆରେ ଯାଇ ମୈନାକ ପର୍ବତ ପ୍ରତି ଅଗ୍ରସର ହେଲା।
Verse 10
हिरण्यशूज्र: सुमहान् महामणिमयो गिरि: । रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथ:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଠାରେ ‘ହିରଣ୍ୟଶୃଙ୍ଗ’ ନାମକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାଳ ପର୍ବତ ଥିଲା, ଯେନେ ମହାମଣିରେ ଗଢ଼ା ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ। ସେଠାରେ ‘ବିନ୍ଦୁସର’ ନାମକ ଏକ ରମ୍ୟ ସରୋବର ମଧ୍ୟ ଥିଲା, ଯାହା ରାଜା ଭଗୀରଥଙ୍କ ସହ ସମ୍ବନ୍ଧିତ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ।
Verse 11
यत्रेष्ट सर्वभूतानामी श्वरेण महात्मना,भरतश्रेष्ठ! वहीं सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महात्मा प्रजापतिने मुख्य-मुख्य सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, जिनमें सोनेकी वेदियाँ और मणियोंके खंभे बने थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଇ ସ୍ଥାନରେ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କ ଅଧୀଶ୍ୱର ମହାତ୍ମା ପ୍ରଜାପତି ପ୍ରଧାନ ପ୍ରଧାନ ଶତ ଯଜ୍ଞ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରିଥିଲେ।
Verse 12
आद्वता: क्रतवो मुख्या: शतं भरतसत्तम । यत्र यूपा मणिमय श्रैत्याश्वापि हिरण्मया:,भरतश्रेष्ठ! वहीं सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महात्मा प्रजापतिने मुख्य-मुख्य सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, जिनमें सोनेकी वेदियाँ और मणियोंके खंभे बने थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତସତ୍ତମ! ସେଠାରେ ବିଧିପୂର୍ବକ ପ୍ରଧାନ ପ୍ରଧାନ ଶତ କ୍ରତୁ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଥିଲା; ଯେଉଁଠାରେ ଯୂପସ୍ତମ୍ଭ ମଣିମୟ ଥିଲେ ଏବଂ ବେଦୀ ଓ ଅନ୍ୟ ଶ୍ରୌତ ସାମଗ୍ରୀ ହିରଣ୍ମୟ ଥିଲା।
Verse 13
शोभार्थ विहितास्तत्र न तु दृष्टान्तत: कृता: । अन्रेष्टवा स गत: सिद्धि सहस््राक्ष: शचीपति:,यह सब शोभाके लिये बनाया गया था, शास्त्रीय विधि अथवा सिद्धान्तके अनुसार नहीं। सहस्र नेत्रोंवाले शचीपति इन्द्रने भी वहीं यज्ञ करके सिद्धि प्राप्त की थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଠାରେ ଯେ ବ୍ୟବସ୍ଥା ହୋଇଥିଲା, ତାହା କେବଳ ଶୋଭା ଓ ଐଶ୍ୱର୍ୟ ପାଇଁ; ଶାସ୍ତ୍ରୀୟ ଦୃଷ୍ଟାନ୍ତ କିମ୍ବା ପ୍ରମାଣ ଭାବେ ନୁହେଁ। ତଥାପି ସହସ୍ରନେତ୍ର ଶଚୀପତି ଇନ୍ଦ୍ର ସିଦ୍ଧି ଖୋଜି ସେଠାକୁ ଯାଇ ଯଜ୍ଞ କରି ସିଦ୍ଧି ପାଇଥିଲେ।
Verse 14
यत्र भूतपति: सृष्टवा सर्वान् लोकान् सनातन: । उपास्यते तिग्मतेजा: स्थितो भूत: सहस्रशः,सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और समस्त प्राणियोंके अधिपति उग्रतेजस्वी सनातन देवता महादेवजी वहीं रहकर सहसोरों भूतोंसे सेवित होते हैं
ଯେଉଁଠାରେ ସନାତନ, ତୀବ୍ରତେଜସ୍ବୀ ଭୂତପତି—ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ସ୍ରଷ୍ଟା—ମହାଦେବ ଅବସ୍ଥିତ ଅଛନ୍ତି ଏବଂ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଭୂତଗଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଉପାସିତ ହୁଅନ୍ତି।
Verse 15
नरनारायणोौ ब्रह्मा यम: स्थाणुश्न॒ पठचम: । उपासते यत्र सत्र॑ सहस्रयुगपर्यये,एक हजार युग बीतनेपर वहीं नर-नारायण ऋषि, ब्रह्मा, यमराज और पाँचवें महादेवजी यज्ञका अनुष्ठान करते हैं
ଯେଉଁଠାରେ ସହସ୍ର ଯୁଗ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲେ ନର-ନାରାୟଣ ଋଷି, ବ୍ରହ୍ମା, ଯମ ଏବଂ ପଞ୍ଚମ ସ୍ଥାଣୁ (ମହାଦେବ) ସତ୍ର-ଯଜ୍ଞର ଅନୁଷ୍ଠାନ ଓ ଉପାସନା କରନ୍ତି।
Verse 16
यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षणणान् बहून् । श्रद्दधानेन सततं धर्मसम्प्रतिपत्तये,यह वही स्थान है, जहाँ भगवान् वासुदेवने धर्मपरम्पराकी रक्षाके लिये बहुत वर्षोतक निरंतर श्रद्धापूर्वक यज्ञ किया था
ସେଇ ସ୍ଥାନଟି ହେଉଛି, ଯେଉଁଠାରେ ଧର୍ମର ସମ୍ୟକ୍ ପ୍ରତିଷ୍ଠା ପାଇଁ ବାସୁଦେବ ଶ୍ରଦ୍ଧାସହିତ ଅନେକ ଶତ ବର୍ଷ ଧରି ନିରନ୍ତର ସତ୍ର-ଯଜ୍ଞ କରିଥିଲେ।
Verse 17
सुवर्णमालिनो यूपाश्रैत्याश्वाप्पतिभास्वरा: । ददौ यत्र सहस्राणि प्रयुतानि च केशव:,उस यज्ञमें स्वर्णणालाओंसे मण्डित खंभे और अत्यन्त चमकीली वेदियाँ बनी थीं। भगवान् केशवने उस यज्ञमें सहस्रों-लाखों वस्तुएँ दानमें दी थीं
ସେଇ ଯଜ୍ଞରେ ଯୂପସ୍ତମ୍ଭଗୁଡ଼ିକ ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାରେ ମଣ୍ଡିତ ଥିଲେ ଏବଂ ବେଦୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲେ। ସେଠାରେ କେଶବ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଓ ପ୍ରୟୁତ (ଦଶ-ଦଶ ହଜାର) ପରିମାଣର ଦାନ ଦେଇଥିଲେ।
Verse 18
तत्र गत्वा स जग्राह गदां शड्खं च भारत । स्फाटिकं च सभाद्रव्यं यदासीद् वृषपर्वण:,भारत! तदनन्तर मयासुरने वहाँ जाकर वह गदा, शंख और सभाभवन बनानेके लिये स्फटिक मणिमय द्रव्य ले लिया, जो पहले वृषपर्वाके अधिकारमें था
ସେଠାକୁ ଯାଇ, ହେ ଭାରତ, ସେ ଗଦା ଓ ଶଙ୍ଖ, ଏବଂ ସଭାଗୃହ ନିର୍ମାଣ ପାଇଁ ସ୍ଫଟିକମୟ ଦ୍ରବ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଅଧିକାର କଲା; ଯାହା ପୂର୍ବେ ବୃଷପର୍ବଣଙ୍କର ଥିଲା।
Verse 19
किंकरै: सह रक्षोभियदरक्षन्महद् धनम् । तदगृह्लान्मयस्तत्र गत्वा सर्व महासुर:,बहुत-से किंकर तथा राक्षस जिस महान् धनकी रक्षा करते थे, वहाँ जाकर महान् असुर मयने वह सब ले लिया
କିଙ୍କର ଓ ରାକ୍ଷସମାନେ ଯେ ମହାଧନକୁ ରକ୍ଷା କରୁଥିଲେ, ସେଠାକୁ ଯାଇ ମହାବଳୀ ଅସୁର ମୟ ସେ ସବୁ ଗ୍ରହଣ କଲା।
Verse 20
तदाह्ृत्य च तां चक्रे सो5सुरोडप्रतिमां सभाम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमयीं शुभाम्,वे सब वस्तुएँ लाकर उस असुरने वह अनुपम सभाभवन तैयार की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात, दिव्य, मणिमयी और शुभ एवं सुन्दर थी
ସେ ସବୁ ଆଣି, ସେ ଅସୁର ଏକ ଅପ୍ରତିମ ସଭାଗୃହ ନିର୍ମାଣ କଲା; ଯାହା ତ୍ରିଲୋକରେ ବିଶ୍ରୁତ, ଦିବ୍ୟ, ମଣିମୟ ଓ ଶୁଭଶୋଭାମୟ ଥିଲା।
Verse 21
गदां च भीमसेनाय प्रवरां प्रददौ तदा । देवदत्तं चार्जुनाय शड्खप्रवरमुत्तमम्,उसने उस समय वह श्रेष्ठ गदा भीमसेनको और देवदत्त नामक उत्तम शंख अर्जुनको भेंट कर दिया
ସେତେବେଳେ ସେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗଦା ଦେଲା, ଏବଂ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ‘ଦେବଦତ୍ତ’ ନାମକ ଉତ୍ତମ—ଶଙ୍ଖମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଶଙ୍ଖ ପ୍ରଦାନ କଲା।
Verse 22
यस्य शड्खस्य नादेन भूतानि प्रचकम्पिरे । सभा च सा महाराज शातकुम्भमयद्रुमा,उस शंखकी आवाज सुनकर समस्त प्राणी काँप उठते थे। महाराज! उस सभामें सुवर्णमय वृक्ष शोभा पाते थे
ଯେ ଶଙ୍ଖର ନାଦରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ କମ୍ପିଉଠୁଥିଲେ; ଏବଂ, ହେ ମହାରାଜ, ସେ ସଭାଗୃହ ଶାତକୁମ୍ଭ—ଶୁଦ୍ଧ ସୁବର୍ଣ୍ଣ—ମୟ ବୃକ୍ଷମାନେ ଦ୍ୱାରା ଶୋଭିତ ଥିଲା।
Verse 23
दशकिष्कुसहस्राणि समन्तादायताभवत् । यथा बल्लेर्यथार्कस्य सोमस्यथ च यथा सभा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି ସଭା ଚାରିଦିଗରେ ଦଶହଜାର କିଷ୍କୁ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ତୃତ ଥିଲା। ତାହାର ଦୀପ୍ତି ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ତେଜ ସମାନ; ଅଦ୍ଭୁତ ଓ ଆଦର୍ଶ ରାଜସଭା ପରି, ଅସାଧାରଣ ଶିଳ୍ପକୌଶଳରେ ପ୍ରକାଶିତ ରାଜଶକ୍ତିର ପ୍ରତୀକ ହୋଇ ସେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲା।
Verse 24
अभिष्नतीव प्रभया प्रभामर्कस्य भास्वराम्,वह अपनी प्रभाद्वारा सूर्यदेवकी तेजोमयी प्रभासे टक्कर लेती थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାହାର ପ୍ରଭା ଯେନ ସୂର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ଦହନଶୀଳ ତେଜକୁ ଆଘାତ କରି, ତାହା ସହ ପ୍ରତିସ୍ପର୍ଧା କରୁଛି। ତାହାରୁ ନିସ୍ସରିତ ଆଲୋକ ଏତେ ପ୍ରଖର ଥିଲା ଯେ ଦର୍ଶକମାନଙ୍କ ମନରେ ବିସ୍ମୟ ଓ ଭକ୍ତିଭୟ ଜାଗ୍ରତ ହେଉଥିଲା।
Verse 25
प्रबभौ ज्वलमानेव दिव्या दिव्येन वर्चसा । नवमेघप्रतीकाशा दिवमावृत्य विछिता । आयता विपुला रम्या विपाप्मा विगतक््लमा,वह दिव्य सभाभवन अपने अलौकिक तेजसे निरंतर प्रदीप्त-तसी जान पड़ती थी। उसकी ऊँचाई इतनी अधिक थी कि नूतन मेघोंकी घटाके समान वह आकाशको घेरकर खड़ी थी। उसका विस्तार भी बहुत था। वह रमणीय सभाभवन पाप-तापका नाश करनेवाली थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି ଦିବ୍ୟ ସଭାଭବନ ଯେନ ନିରନ୍ତର ଜ୍ୱଳିତ, ଦିବ୍ୟ ବର୍ଚ୍ଚସ୍ରେ ଦୀପ୍ତ ଥିଲା। ନୂତନ ମେଘପୁଞ୍ଜ ପରି ଆକାଶକୁ ଆବୃତ କରିଥିବା ଭଳି ଉଚ୍ଚ ହୋଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲା। ଦୀର୍ଘ, ବିଶାଳ ଓ ରମଣୀୟ; ପାପ-ତାପ ନାଶକ, ଶ୍ରମ-କ୍ଲେଶରହିତ ଥିଲା।
Verse 26
उत्तमद्रव्यसम्पन्ना रत्नप्राकारतोरणा । बहुचित्रा बहुधना सुकृता विश्वकर्मणा,उत्तमोत्तम द्रव्योंसे उसका निर्माण किया गया था। उसके परकोटे और फाटक रत्नोंसे बने हुए थे। उसमें अनेक प्रकारके अद्भुत चित्र अंकित थे। वह बहुत धनसे पूर्ण थी। दानवोंके विश्वकर्मा मयासुरने उस सभाभवनको बहुत सुन्दरतासे बनाया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି ସଭା ଉତ୍ତମୋତ୍ତମ ଦ୍ରବ୍ୟରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଥିଲା; ତାହାର ପ୍ରାକାର ଓ ତୋରଣଦ୍ୱାର ରତ୍ନରେ ନିର୍ମିତ। ନାନାପ୍ରକାର ଅଦ୍ଭୁତ ଚିତ୍ର ଓ ଅଲଙ୍କାରରେ ତାହା ଶୋଭିତ, ଏବଂ ଅପାର ଧନ-ବୈଭବରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା। ଦାନବଶିଳ୍ପୀ ମୟାସୁର—ବିଶ୍ୱକର୍ମା-ତୁଲ୍ୟ—ଏହାକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁନ୍ଦରତାରେ ଗଢ଼ିଥିଲେ।
Verse 27
न दाशार्ही सुधर्मा वा ब्रह्मणो वाथ तादृशी । सभा रूपेण सम्पन्ना यां चक्रे मतिमान् मय:,बुद्धिमान मयने जिस सभाका निर्माण किया था, उसके समान सुन्दर यादवोंकी सुधर्मा सभा अथवा ब्रह्माजीकी सभा भी नहीं थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବୁଦ୍ଧିମାନ ମୟ ଯେ ସଭା ନିର୍ମାଣ କରିଥିଲେ, ରୂପ-ବୈଭବରେ ତାହା ସମାନ ନ ଦାଶାର୍ହମାନଙ୍କ (ଯାଦବମାନଙ୍କ) ସୁଧର୍ମା ସଭା ଥିଲା, ନ ହିଁ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ସଭା।
Verse 28
तां सम तत्र मयेनोक्ता रक्षन्ति च वहन्ति च । सभामष्टौ सहस्राणि किंकरा नाम राक्षसा:,मयासुरकी आज्ञाके अनुसार आठ हजार किंकर नामक राक्षस उस सभाकी रक्षा करते और उसे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर उठाकर ले जाते थे
ସେଠାରେ ମୟାସୁରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ ‘କିଙ୍କର’ ନାମକ ଆଠ ହଜାର ରାକ୍ଷସ ସେ ସଭାଗୃହକୁ ରକ୍ଷା କରୁଥିଲେ ଏବଂ ତାହାକୁ ଉଠାଇ ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନରୁ ଅନ୍ୟ ସ୍ଥାନକୁ ବହନ କରୁଥିଲେ।
Verse 29
अन्तरिक्षचरा घोरा महाकाया महाबला: । रक्ताक्षा: पिड़लाक्षाश्न शुक्तिकर्णा: प्रहारिण:,वे राक्षस भयंकर आकृतिवाले, आकाशमें विचरने-वाले, विशालकाय और महाबली थे। उनकी आँखें लाल और पिंगलवर्णकी थीं तथा कान सीपीके समान जान पड़ते थे। वे सब-के-सब प्रहार करनेमें कुशल थे
ସେ ରାକ୍ଷସମାନେ ଆକାଶଚାରୀ, ଭୟଙ୍କର, ବିଶାଳକାୟ ଓ ମହାବଳୀ ଥିଲେ। ତାଙ୍କର ଆଖି ଲାଲ ଓ ପିଙ୍ଗଳବର୍ଣ୍ଣର; କାନ ଶୁକ୍ତି (ଶଙ୍ଖ-ଶିପି) ପରି ଦେଖାଯାଉଥିଲା। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ପ୍ରହାର କରିବାରେ ନିପୁଣ ଥିଲେ।
Verse 30
तस्यां सभायां नलिनीं चकाराप्रतिमां मय: । वैदूर्यपत्रविततां मणिनालमयाम्बुजाम्,मयासुरने उस सभाभवनके भीतर एक बड़ी सुन्दर पुष्करिणी बना रखी थी, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी। उसमें इन्द्रनीलमणिमय कमलके पत्ते फैले हुए थे। उन कमलोंके मृणाल मणियोंके बने थे
ସେ ସଭାଗୃହର ଭିତରେ ମୟାସୁର ଏକ ଅପ୍ରତିମ ନଲିନୀ (ପୁଷ୍କରିଣୀ) ତିଆରି କରିଥିଲେ। ସେଠାରେ ବୈଦୂର୍ୟମଣି ପରି ଦୀପ୍ତ କମଳପତ୍ର ବିସ୍ତାରିତ ଥିଲା, ଏବଂ କମଳର ମୃଣାଳ ମଧ୍ୟ ମଣିରେ ନିର୍ମିତ ଥିଲା।
Verse 31
॥! । ५ ॥ ८7 ऋ# पद्मसौगन्धिकवतीं नानाद्विजगणायुताम् | पुष्पितै: पड़कजैश्षित्रां कूर्मैर्मत्स्यैश्न काउचनै: । चित्रस्फटिकसोपानां निष्पड़कसलिलां शुभाम्,उसमें पद्मरागमणिमय कमलोंकी मनोहर सुगंध छा रही थी। अनेक प्रकारके पक्षी उसमें रहते थे। खिले हुए कमलों और सुनहली मछलियों तथा कछुओंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उस पोखरीमें उतरनेके लिये स्फटिकमणिकी विचित्र सीढ़ियाँ बनी थीं। उसमें पंकरहित स्वच्छ जल भरा हुआ था। वह देखनेमें बड़ी सुन्दर थी
ସେଠାରେ ପଦ୍ମରାଗମଣିରେ ନିର୍ମିତ କମଳମାନଙ୍କର ମନୋହର ସୁଗନ୍ଧ ଛାଇଥିଲା ଏବଂ ନାନା ପ୍ରକାର ପକ୍ଷୀଦଳ ସେଠାରେ ଭିଡ଼ କରୁଥିଲେ। ଫୁଟିଥିବା କମଳ, କଚ୍ଛପ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣବର୍ଣ୍ଣ ମାଛ ଦ୍ୱାରା ତାହାର ଶୋଭା ବିଚିତ୍ର ହୋଇଉଠୁଥିଲା। ତାହାରେ ଅବତରଣ ପାଇଁ ଚିତ୍ରବିଚିତ୍ର ସ୍ଫଟିକମଣିର ସିଢ଼ି ଥିଲା; କାଦା ନଥିବା ସ୍ୱଚ୍ଛ ଜଳ ଭରିଥିଲା—ସମଗ୍ର ଦୃଶ୍ୟ ଶୁଭ ଓ ରମଣୀୟ ଥିଲା।
Verse 32
मन्दानिलसमुद्धूतां मुक्ताबिन्दुभिराचिताम् । महामणिशिलापट्टबद्धपर्यन्तवेदिकाम्,मन्द वायुसे उद्वेलित हो जब जलकी बूँदें उछलकर कमलके पत्तोंपर बिखर जाती थीं, उस समय वह सारी पुष्करिणी मौक्तिकबिन्दुओंसे व्याप्त जान पड़ती थी। उसके चारों ओरके घाटोंपर बड़ी-बड़ी मणियोंकी चौकोर शिलाखण्डोंसे पक्की वेदियाँ बनायी गयी थीं
ମନ୍ଦ ପବନରେ ଜଳ ଉଦ୍ବେଳିତ ହୋଇ ବୁନ୍ଦାମାନେ ଉଛଳି କମଳପତ୍ର ଉପରେ ଛିଟିଯାଉଥିଲେ; ସେତେବେଳେ ସମଗ୍ର ପୁଷ୍କରିଣୀ ମୁକ୍ତାବିନ୍ଦୁରେ ଆଚ୍ଛାଦିତ ପରି ଲାଗୁଥିଲା। ତାହାର ଚାରିପାଖରେ ମହାମଣି ସଦୃଶ ବଡ଼ ବଡ଼ ଶିଳାପଟ୍ଟ ଦ୍ୱାରା ପକ୍କା ଭାବେ ବାନ୍ଧା ଘାଟ ଓ ବେଦିକା ଥିଲା।
Verse 33
मणिरत्नचितां तां तु केचिदश्येत्य पार्थिवा: । दृष्टवापि नाभ्यजानन्त तेऊज्ञानात् प्रपतन्त्युत,मणियों तथा रत्नोंसे व्याप्त होनेके कारण कुछ राजालोग उस पुष्करिणीके पास आकर और उसे देखकर भी उसकी यथार्थतापर विश्वास नहीं करते थे और भ्रमसे उसे स्थल समझकर उसमें गिर पड़ते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମଣି-ରତ୍ନରେ ଭରିଥିବା ସେହି ପୁଷ୍କରିଣୀ ପାଖକୁ କେତେକ ରାଜା ଆସିଲେ। ଦେଖିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ତାହାର ଯଥାର୍ଥ ସ୍ୱରୂପ ଚିହ୍ନି ପାରିଲେ ନାହିଁ; ଅଜ୍ଞାନମୋହରେ ତାହାକୁ ଭୂମି ଭାବି ସେଥିରେ ପଡ଼ିଗଲେ।
Verse 34
तां सभामभितो नित्यं पुष्पवन्तो महाद्रुमा: । आसन् नानाविधा लोला: शीतच्छाया मनोरमा:,उस सभाभवनके सब ओर अनेक प्रकारके बड़े-बड़े वृक्ष लहलहा रहे थे, जो सदा फूलोंसे भरे रहते थे। उनकी छाया बड़ी शीतल थी। वे मनोरम वृक्ष सदा हवाके झोंकोंसे हिलते रहते थे
ସେହି ସଭାଭବନର ଚାରିପାଖେ ନିତ୍ୟ ଫୁଲରେ ଭରିଥିବା ନାନାପ୍ରକାର ମହାବୃକ୍ଷ ଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କର ଛାୟା ଶୀତଳ ଓ ମନୋହର; ପବନର ଝୋକାରେ ସେଇ ସୁନ୍ଦର ବୃକ୍ଷମାନେ ସଦା ଦୋଳାୟମାନ ହୁଅୁଥିଲେ।
Verse 35
काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्व सर्वश: । हंसकारण्डवोपेताशक्षक्रवाकोपशोभिता:,केवल वृक्ष ही नहीं; उस भवनके चारों ओर अनेक सुगन्धित वन, उपवन और बावलियाँ भी थीं, जो हंस, कारण्डव तथा चक्रवाक आदि पक्षियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी शोभा पा रही थीं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଚାରିଦିଗରେ ସୁଗନ୍ଧିତ କାନନ ଓ ଉପବନ ଥିଲା, ଏବଂ ସର୍ବତ୍ର ପୁଷ୍କରିଣୀମାନେ। ସେଗୁଡ଼ିକ ହଂସ ଓ କାରଣ୍ଡବ ପକ୍ଷୀରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା ଏବଂ ଚକ୍ରବାକ ପକ୍ଷୀମାନେ ସେମାନଙ୍କୁ ଅଧିକ ଶୋଭା ଦେଉଥିଲେ।
Verse 36
जलजानां च पद्मानां स्थलजानां च सर्वश: । मारुतो गन्धमादाय पाण्डवान् सम निषेवते,वहाँ जल और स्थलमें होनेवाले कमलोंकी सुगन्ध लेकर वायु सदा पाण्डवोंकी सेवा किया करती थी
ଜଳଜ ଓ ସ୍ଥଳଜ ପଦ୍ମମାନଙ୍କର ସୁଗନ୍ଧ ନେଇ ମାରୁତ ସଦା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ସେବା କରୁଥିବା ପରି ବହୁଥିଲା।
Verse 37
ईदृशीं तां सभां कृत्वा मासै: परिचतुर्दशै: । निछितां धर्मराजाय मयो राजन् न््यवेदयत्,मयासुरने पूरे चौदह महीनोंमें इस प्रकारकी उस अद्भुत सभाभवनका निर्माण किया था। राजन! जब वह बनकर तैयार हो गयी, तब उसने धर्मराजको इस बातकी सूचना दी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଚୌଦ ମାସରେ ଏପରି ଅଦ୍ଭୁତ ସଭା ନିର୍ମାଣ କରି, ହେ ରାଜନ, ମୟ ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ ଜଣାଇଲେ ଯେ ତାହା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଛି।
Verse 103
द्रष्ट भागीरथी गद्भामुवास बहुला: समा: । “वहीं हिरण्यशृंग नामक महामणिमय विशाल पर्वत है, जहाँ रमणीय बिन्दुसर नामक तीर्थ है। वहीं राजा भगीरथने भागीरथी गंगाका दर्शन करनेके लिये बहुत वर्षोतक (तपस्या करते हुए) निवास किया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଠାରେ ଭାଗୀରଥୀ ଗଙ୍ଗା ପ୍ରବାହିତ; ଏବଂ ସେଠାରେ ରାଜା ଭଗୀରଥ ଅନେକ ବର୍ଷ କଠୋର ତପସ୍ୟାରେ ବସବାସ କରିଥିଲେ। ସେଇ ଅଞ୍ଚଳରେ ମହାମଣିମୟ ଭଳି ବିଶାଳ ‘ହିରଣ୍ୟଶୃଙ୍ଗ’ ନାମକ ପର୍ବତ ଅଛି, ଏବଂ ସେଠାରେ ‘ବିନ୍ଦୁସର’ ନାମକ ରମଣୀୟ ତୀର୍ଥ ମଧ୍ୟ ଅଛି। ଭାଗୀରଥୀ ଗଙ୍ଗାଙ୍କ ସାକ୍ଷାତ୍ ଦର୍ଶନ ଓ ସାନ୍ନିଧ୍ୟ ପାଇଁ ରାଜା ଭଗୀରଥ ଦୀର୍ଘକାଳ ତପ କରିଥିଲେ।
Verse 233
भ्राजमाना तथात्यर्थ दधार परमं वपु: । वह सब ओरसे दस हजार हाथ विस्तृत थी (अर्थात् उसकी लंबाई और चौड़ाई भी दस- दस हजार हाथ थी)। जैसे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाकी सभाभवन प्रकाशित होती है, उसी प्रकार अत्यन्त उद्धासित होनेवाली उस सभाने बड़ा मनोहर रूप धारण किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ସଭା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ପରମ ଶୋଭା ଧାରଣ କଲା। ଶୁଣାଯାଏ, ଚାରିଦିଗରେ ତାହାର ବିସ୍ତାର ଦଶହଜାର ହସ୍ତ। ଯେପରି ଅଗ୍ନି, ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ଚନ୍ଦ୍ରର ଆଲୋକରେ ପ୍ରାସାଦ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ହୁଏ, ସେପରି ସେ ସଭା ମଧ୍ୟ ଅସାଧାରଣ ଦୀପ୍ତିରେ ମନୋହର ରୂପ ନେଲା।
The chapter foregrounds an implicit ethical tension: political authority is reinforced through extraordinary splendor and engineered marvels, yet such splendor can distort perception and judgment, as shown by visitors misreading the constructed lotus-lake.
Institution-building and public legitimacy are powerful tools of governance, but perception is fallible; discernment (viveka) is necessary to prevent prestige, novelty, and aesthetic force from becoming sources of error or rivalry.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as narrative groundwork, explaining the material and symbolic foundations of Yudhiṣṭhira’s court that later become consequential in the epic’s political and ethical developments.