
Bhīmasena’s Digvijaya and Tribute Return (भीमस्य दिग्विजयः धननिवेदनं च)
Upa-parva: Digvijaya (Bhīma-Digvijaya / Northern-Eastern Campaign Episode)
Vaiśaṃpāyana reports Bhīma’s swift sequence of regional submissions: he overcomes rulers associated with Kośala/Ayodhyā, Malla territories, Himalayan-adjacent polities, Kāśī, and additional kings across varied geographies (including Matsya and other named regions). The narrative repeatedly notes restraint—victory achieved without excessive severity—sometimes explicitly through conciliation (sāntva). Bhīma defeats multiple chiefs, including a notable engagement with Karṇa, after which further mountain-dwelling rulers are subdued. The campaign expands toward coastal and island-associated groups described as sāgara-vāsins and mleccha-gaṇas, from whom taxes and diverse valuables are collected. Enumerated tribute includes sandalwood, aguru, fine cloth, gems and pearls, gold, silver, diamond, and coral, presented as a quantified “rain” of wealth. The chapter closes with Bhīma’s return to Indraprastha and formal presentation of the accumulated wealth to Dharmarāja Yudhiṣṭhira, integrating military-polity outcomes into the ritual economy supporting imperial aspiration.
Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं—दिग्विजय की धारा में धनंजय अर्जुन भगदत्त को परास्त कर उत्तर दिशा, कुबेर-पालित प्रदेशों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ पर्वत-राज्य और दुर्गम जनपद उनकी परीक्षा लेने को खड़े हैं। → अर्जुन क्रमशः अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि और उपगिरि जैसे पर्वतीय प्रदेशों को जीतते हुए स्थानीय नरेशों को अपने पक्ष में करते हैं। उलूकवासी राजा बृहन्त तक पहुँचकर संघर्ष तीव्र होता है—यह केवल युद्ध नहीं, पर्वतीय स्वाभिमान और साम्राज्य-कर की स्वीकृति का टकराव है। → पर्वतेश्वर बृहन्त अर्जुन को ‘असह्य’ मानकर भी रण में टिक नहीं पाते; रत्न समेटकर पीछे हटते हैं। इसके बाद अर्जुन अभिसारी, उरगावासी रोचमान, और युद्धमुख पर ऋषिकों को परास्त कर दुर्लभ अश्वों को कर-रूप में प्राप्त करते हैं—तोते के उदर-से हरे, मयूर-सदृश वर्ण वाले, अत्यन्त शीघ्रगामी जवन अश्व—दिग्विजय का ठोस फल। → अर्जुन विजित प्रदेशों में व्यवस्था स्थापित करते हैं; बृहन्त का राज्य पुनः उसी के हाथ में सौंपकर (अधीनता स्वीकार कराकर) आगे बढ़ते हैं। विजय का उद्देश्य लूट नहीं, युधिष्ठिर के राजसूय हेतु कर-संग्रह और राजनीतिक अधीनता का विस्तार बनता है। → हिमवान् और निष्कुट को पार कर पुरुषर्षभ अर्जुन श्वेतपर्वत की ओर बढ़ते हैं—आगे और भी कठोर भूभाग तथा अनजाने प्रतिद्वन्द्वी प्रतीक्षा में हैं।
Verse 1
ऑपन--माज बक। अकाल सप्तविशो<डध्याय: अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना वैशम्पायन उवाच एवमुक्त: प्रत्युवाच भगदत्तं धनंजय: । अनेनैव कृतं सर्वमनुजानीहि याम्यहम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर धनंजयने भगदत्तसे कहा --'राजन्! आपने जो कर देना स्वीकार कर लिया, इतनेसे ही मेरा सब सत्कार हो जायगा, अब अज्ञा दीजिये, मैं जाता हूँ"
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହାଯାଇଲା ପରେ ଧନଞ୍ଜୟ ଭଗଦତ୍ତଙ୍କୁ କହିଲେ—“ରାଜନ୍! ଆପଣ ଯାହା କରିବାକୁ ସ୍ୱୀକାର କରିଛନ୍ତି, ସେତିକିରେ ମୋର ସବୁ ସିଦ୍ଧ ହେଲା। ଏବେ ଅନୁମତି ଦିଅନ୍ତୁ; ମୁଁ ଯାଉଛି।”
Verse 2
तं विजित्य महाबाहु: कुन्तीपुत्रो धनंजय: । प्रययावुत्तरां तस्माद् दिशं धनदपालिताम्,भगदत्तको जीतकर महाबाह कुन्तीपुत्र अर्जुन वहाँसे कुबेरद्वारा सुरक्षित उत्तर दिशामें गये
ତାଙ୍କୁ ଜୟ କରି ମହାବାହୁ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧନଞ୍ଜୟ ସେଠାରୁ ଧନଦ (କୁବେର) ରକ୍ଷିତ ଉତ୍ତର ଦିଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 3
अन्तर्गिरिं च कौन्तेयस्तथैव च बहिर्गिरिम् तथैवोपगिरिं चैव विजिग्ये पुरुषर्षभ:,कुरुश्रेष्ठ धनंजयने क्रमश: अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि और उपगिरि नामक प्रदेशोंपर विजय प्राप्त की
ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ କୌନ୍ତେୟ କ୍ରମେ ଅନ୍ତର୍ଗିରି, ବହିର୍ଗିରି ଏବଂ ଉପଗିରି ନାମକ ଦେଶମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କଲେ।
Verse 4
विजित्य पर्वतान् सर्वान् ये च तत्र नराधिपा: । तान् वशे स्थापयित्वा स धनान्यादाय सर्वश:,फिर समस्त पर्वतों और वहाँ निवास करनेवाले राजाओंको अपने अधीन करके उन्होंने सबसे धन वसूल किये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ସମସ୍ତ ପର୍ବତପ୍ରଦେଶ ଜୟ କରି, ସେଠାରେ ବସୁଥିବା ରାଜାମାନଙ୍କୁ ବଶ କରି, ସବୁ ଦିଗରୁ ତାଙ୍କଠାରୁ ଧନ (କର/ଉପହାର) ସଂଗ୍ରହ କଲେ।
Verse 5
तैरेव सहित: सर्वैरनुरज्य च तान् नृपान् उलूकवासिनं राजन् बृहन्तमुपजग्मिवान्,तत्पश्चात् उन नरेशोंको प्रसन्न करके उन सबके साथ उलूकवासी राजा बृहन्तपर आक्रमण किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରି ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ସହ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ, ଉଲୂକଦେଶବାସୀ ରାଜା ବୃହନ୍ତଙ୍କ ଉପରେ ଅଭିଯାନ କଲେ।
Verse 6
मृदज्भवरनादेन रथनेमिस्वनेन च । हस्तिनां च निनादेन कम्पयन् वसुधामिमाम्,जुझाऊ बाजे, श्रेष्ठ मृदृंग आदिकी ध्वनि, रथके पहियोंकी घर्घराहट और हाथियोंकी गर्जनासे वे इस पृथ्वीको कँपाते हुए आगे बढ़ रहे थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୃଦଙ୍ଗ-ଭେରୀର ଘୋଷ, ରଥଚକ୍ରର ଘରଘର ଶବ୍ଦ ଏବଂ ହାତୀମାନଙ୍କ ଗର୍ଜନାରେ ସେମାନେ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ କମ୍ପାଇ ଆଗେଇ ଯାଉଥିଲେ।
Verse 7
ततो बृहन्तस्त्वरितो बलेन चतुरक्लिणा | निष्क्रम्य नगरात् तस्माद् योधयामास फाल्गुनम्,तब राजा बृहन्त तुरंत ही चतुरंगिणी सेनाके साथ नगरसे बाहर निकले और अर्जुनसे युद्ध करने लगे
ତାପରେ ରାଜା ବୃହନ୍ତ ଶୀଘ୍ର ଚତୁରଙ୍ଗିଣୀ ସେନା ସହିତ ସେହି ନଗରରୁ ବାହାରି, ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ସହ ଯୁଦ୍ଧ କଲେ।
Verse 8
सुमहान् संनिपातो5भूद् धनंजयबृहन्तयो: । न शशाक बृहन्तस्तु सोढुं पाण्डवविक्रमम्,उस समय अर्जुन और बृहन्तमें बड़े जोरकी मार-काट शुरू हुई, परंतु बृहन्त पाण्डुपुत्र अर्जुनके पराक्रमको न सह सके
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଓ ବୃହନ୍ତଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହା ସଂଘର୍ଷ ହେଲା; କିନ୍ତୁ ବୃହନ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ବିକ୍ରମ ସହି ପାରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 9
सो<विषद्वतमं मत्वा कौन्तेयं पर्वतेश्वर: । उपावर्तत दुर्थर्षो रत्नान्यादाय सर्वश:,कुन्तीकुमारको असहा मानकर दुर्धर्ष वीर पर्वतराज बृहन्त युद्धसे हट गये और सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରଙ୍କୁ ସର୍ବଥା ଅଡିଗ ବୋଲି ଜାଣି ଦୁର୍ଧର୍ଷ ପର୍ବତେଶ୍ୱର ଯୁଦ୍ଧରୁ ପଛକୁ ଫେରିଗଲେ। ସେ ସବୁ ପ୍ରକାର ରତ୍ନ ସଂଗ୍ରହ କରି ସେବାଭାବରେ ଆଗେଇ ଆସି ଅର୍ପଣ କଲେ।
Verse 10
स तद्राज्यमवस्थाप्य उलूकसहितो ययौ । सेनाबिन्दुमथो राजन् राज्यादाशु समाक्षिपत्,जनमेजय! अर्जुनने बृहन्तका राज्य पुनः उन्हींके हाथमें सौंपकर उलूकराजके साथ सेनाबिन्दुपर आक्रमण किया और उन्हें शीघ्र ही राज्यच्युत कर दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ରାଜ୍ୟକୁ ଯଥାବିଧି ପୁନଃସ୍ଥାପନ କରି ଉଲୂକଙ୍କ ସହିତ ଯାତ୍ରା କଲେ। ହେ ରାଜା ଜନମେଜୟ, ପରେ ସେ ସେନାବିନ୍ଦୁକୁ ଶୀଘ୍ର ରାଜ୍ୟରୁ ପଦଚ୍ୟୁତ କରିଦେଲେ।
Verse 11
मोदापुरं वामदेवं सुदामानं सुसंकुलम् । उलूकानुत्तरांश्वैव तांश्व॒ राज्ञ: समानयत्,तदनन्तर मोदापुर, वामदेव, सुदामा, सुसंकुल तथा उत्तर उलूक देशों और वहाँके राजाओंको अपने अधीन किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ମୋଦାପୁର, ବାମଦେବ, ସୁଦାମା, ଜନସଂକୁଳ ସୁସଙ୍କୁଳକୁ, ଏବଂ ଉତ୍ତର ଉଲୂକ ଦେଶମାନଙ୍କୁ ଓ ସେଠାର ରାଜାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଅଧୀନ କରିନେଲେ।
Verse 12
तत्रस्थ: पुरुषैरेव धर्मराजस्य शासनात् । किरीटी जितवान् राजन् देशान् पञ्चगणांस्तत:ः,राजन! धर्मराजकी आज्ञासे किरीटधारी अर्जुनने वहीं रहकर अपने सेवकोंद्वारा पंचगण नामक देशोंको जीत लिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍, ସେଠାରେ ରହି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ ନିଜ ଲୋକମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ‘ପଞ୍ଚଗଣ’ ନାମକ ଦେଶମାନଙ୍କୁ ଜୟ କଲେ।
Verse 13
स देवप्रस्थमासाद्य सेनाबिन्दो: पुरं प्रति । बलेन चतुरज्जेण निवेशमकरोत् प्रभु:,वहाँसे सेनाबिन्दुकी राजधानी देवप्रस्थमें आकर चतुरंगिणी सेनाके साथ शक्तिशाली अर्जुनने वहीं पड़ाव डाला
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେନାବିନ୍ଦୁଙ୍କ ନଗର ଦେବପ୍ରସ୍ଥକୁ ପହଞ୍ଚି ସେ ପ୍ରବଳ ପ୍ରଭୁ ଚତୁରଙ୍ଗିଣୀ ସେନା ସହ ସେଠାରେ ହିଁ ଶିବିର ସ୍ଥାପନ କଲେ।
Verse 14
स तै: परिवृतः सर्वर्विष्वगश्नचं नराधिपम् । अभ्यगच्छन्महातेजा: पौरवं पुरुषर्षभ,नरश्रेष्ठल उन सभी पराजित राजाओंसे घिरे हुए महातेजस्वी अर्जुनने पौरव राजा विष्वगश्वपर आक्रमण किया
ପରାଜିତ ରାଜାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସବୁଦିଗରୁ ଘେରାଯାଇଥିବା ମହାତେଜସ୍ବୀ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅର୍ଜୁନ ପୌରବ ନରାଧିପ ବିଷ୍ୱଗଶ୍ୱଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବାକୁ ଅଗ୍ରସର ହୋଇ ଆକ୍ରମଣ କଲେ।
Verse 15
विजित्य चाहवे शूरान् पर्वतीयान् महारथान् | जिगाय सेनया राजन् पुरं पौरवरक्षितम्,वहाँ संग्राममें शूरवीर पर्वतीय महारथियोंको परास्त करके पौरदद्वारा सुरक्षित उनकी राजधानीको भी सेनाद्वारा जीत लिया
ଯୁଦ୍ଧରେ ପର୍ବତବାସୀ ଶୂର ମହାରଥୀମାନଙ୍କୁ ଜିତି, ହେ ରାଜନ୍, ସେ ନିଜ ସେନାବଳରେ ପୌରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ରକ୍ଷିତ ସେହି ପୁରକୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କଲେ।
Verse 16
पौरवं युधि निर्जित्य दस्यून् पर्वतवासिन: । गणानुत्सवसंकेतानजयत् सप्त पाण्डव:,पौरवको युद्धमें जीतकर पर्वतनिवासी लुटेरोंके सात दलोंपर, जो “उत्सवसंकेत' कहलाते थे, पाण्डुकुमार अर्जुनने विजय प्राप्त की
ପୌରବକୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଜିତି, ସପ୍ତମ ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନ ‘ଉତ୍ସବସଙ୍କେତ’ ନାମରେ ପରିଚିତ ପର୍ବତବାସୀ ଦସ୍ୟୁମାନଙ୍କ ଗଣମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କଲେ।
Verse 17
ततः काश्मीरकान् वीरान् क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभ: । व्यजयल्लोदहितं चैव मण्डलैर्दशभि: सह,इसके बाद क्षत्रियशिरोमणि धनंजयने काश्मीरके क्षत्रियवीरोंको तथा दस मण्डलोंके साथ राजा लोहितको भी जीत लिया
ତାପରେ କ୍ଷତ୍ରିୟଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନଞ୍ଜୟ କାଶ୍ମୀରର ବୀର କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କଲେ ଏବଂ ଦଶ ମଣ୍ଡଳ ସହିତ ରାଜା ଲୋହିତଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜିତିଲେ।
Verse 18
तत्त्रिगर्ता: कौन्तेयं दार्वा: कोकनदास्तथा । क्षत्रिया बहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वश:,तदनन्तर त्रिगर्त, दार्व और कोकनद आदि बहुत-से क्षत्रियनरेशशण सब ओरसे कुन्तीनन्दन अर्जुनकी शरणमें आये
ତଦନନ୍ତର, ହେ ରାଜନ୍, ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତ, ଦାର୍ୱ ଓ କୋକନଦ ଆଦି ଅନେକ କ୍ଷତ୍ରିୟ ନରେଶ ସବୁଦିଗରୁ ଫେରି ଆସି କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଶରଣକୁ ଗଲେ।
Verse 19
अभिसारीं ततो रम्यां विजिग्ये कुरुनन्दन: । उरगावासिनं चैव रोचमानं रणेडजयत्,इसके बाद कुरुनन्दन धनंजयने रमणीय अभिसारी नगरीपर विजय पायी और उरगावासी राजा रोचमानको भी युद्धमें परास्त किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ କୁରୁନନ୍ଦନ ଧନଞ୍ଜୟ ରମ୍ୟ ଅଭିସାରୀ ନଗରୀକୁ ଜୟ କଲେ; ଏବଂ ଉରଗଦେଶବାସୀ ରାଜା ରୋଚମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ରଣରେ ପରାଜିତ କଲେ।
Verse 20
ततः सिंहपुरं रम्यं चित्रायुधसुरक्षितम् | प्राधमद् बलमास्थाय पाकशासनिराहवे,तदनन्तर इन्द्रकुमार अर्जुनने राजा चित्रायुथके द्वारा सुरक्षित सुरम्य नगर सिंहपुरपर सेना लेकर आक्रमण किया और उसे युद्धमें जीत लिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଇନ୍ଦ୍ରପୁତ୍ର ପାକଶାସନି ଅର୍ଜୁନ ସେନା ନେଇ, ଚିତ୍ରାୟୁଧ ଦ୍ୱାରା ସୁରକ୍ଷିତ ରମ୍ୟ ସିଂହପୁର ଉପରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଆକ୍ରମଣ କରି ତାହାକୁ ଜୟ କଲେ।
Verse 21
ततः सुद्यांश्व चोलांश्व किरीटी पाण्डवर्षभ: । सहित: सर्वसैन्येन प्रामथत् कुरुनन्दन:,इसके बाद पाण्डवप्रवर कुरुकुलनन्दन किरीटीने अपनी सारी सेनाके साथ धावा करके सुह्य तथा चोल-देशकी सेनाओंको मथ डाला
ତାପରେ କିରୀଟଧାରୀ, ପାଣ୍ଡବଶ୍ରେଷ୍ଠ କୁରୁନନ୍ଦନ, ସମଗ୍ର ସେନା ସହ ଅଗ୍ରସର ହୋଇ ସୁଦ୍ୟ ଓ ଚୋଳମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ଚୂର୍ଣ୍ଣ କଲେ।
Verse 22
ततः परमविक्रान्तो बाह्लीकान् पाकशासनि: । महता परिमर्देन वशे चक्रे दुरासदान्,तत्पश्चात् परम पराक्रमी इन्द्रकुमारने बड़ी भारी मार-काट मचाकर दुर्धर्ष वीर बाह्लीकोंको वशमें किया
ତାପରେ ପରମ ପରାକ୍ରାନ୍ତ ପାକଶାସନି ଇନ୍ଦ୍ରପୁତ୍ର ମହା ପରିମର୍ଦ୍ଦନ ଦ୍ୱାରା ଦୁର୍ଜୟ ବାହ୍ଲୀକମାନଙ୍କୁ ବଶ କଲେ।
Verse 23
गृहीत्वा तु बल॑ सारं फाल्गुन: पाण्डुनन्दन: । दरदान् सह काम्बोजैरजयत् पाकशासनि:,पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने साथ शक्तिशालिनी सेना लेकर काम्बोजोंके साथ दरदोंको भी जीत लिया
ତାପରେ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଫାଲ୍ଗୁନ ବଳର ସାର—ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେନା—ଗ୍ରହଣ କରି, କାମ୍ବୋଜମାନଙ୍କ ସହ ଦରଦମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କଲେ; ଶତ୍ରୁଦମନରେ ସେ ଇନ୍ଦ୍ରସମ ପାକଶାସନି ଥିଲେ।
Verse 24
प्रागुत्तरां दिशं ये च वसन्त्याश्रित्य दस्यव: । निवसन्ति वने ये च तान् सर्वानजयत् प्रभु:,ईशान कोणका आश्रय ले जो लुटेरे या डाकू वनमें निवास करते थे, उन सबको शक्तिशाली धनंजयने जीतकर वशमें कर लिया
ଯେ ଦସ୍ୟୁମାନେ ପ୍ରାଗୁତ୍ତର (ଇଶାନ) ଦିଗକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ବସୁଥିଲେ ଏବଂ ଯେମାନେ ବନରେ ନିବାସ କରୁଥିବା ଲୁଟେରା ଥିଲେ—ସେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପ୍ରବଳ ପ୍ରଭୁ ଧନଞ୍ଜୟ ଜୟ କରି ବଶ କଲେ।
Verse 25
लोहान् परमकाम्बोजानृषिकानुनत्तरानपि । सहितांस््तान् महाराज व्यजयत् पाकशासनि:,महाराज! लोह, परमकाम्बोज, ऋषिक तथा उत्तर देशोंको भी अर्जुनने एक साथ जीत लिया
ମହାରାଜ! ପାକଶାସନି (ଅର୍ଜୁନ) ଲୋହ, ପରମକାମ୍ବୋଜ, ଋଷିକ ଏବଂ ଉତ୍ତରଦେଶୀୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ—ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଏକାସାଥି—ଜୟ କଲେ।
Verse 26
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें अर्जुनविग्विजयप्रसंगमें भगदत्तपराजयसम्बन्धी छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ऋषिकेष्वपि संग्रामो बभूवातिभयंकर: । तारकामयसंकाश: परस्त्वृषिकपार्थयो: ऋषिकदेशमें भी ऋषिकराज और अर्जुनमें तारकामय संग्रामके समान बड़ा भयंकर युद्ध हुआ
ଋଷିକଦେଶରେ ମଧ୍ୟ ଋଷିକରାଜ ଓ ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ମଧ୍ୟରେ ତାରକାମୟ ସଂଗ୍ରାମ ସଦୃଶ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧ ହେଲା।
Verse 27
स विजित्य ततो राजन्नृषिकान् रणमूर्थनि । शुकोदरसमांस्तत्र हयानष्टी समानयत्,राजन! युद्धके मुहानेपर ऋषिकोंको हराकर अर्जुनने तोतेके उदरके समान हरे रंगवाले आठ घोड़े उनसे भेंट लिये इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि फाल्गुनदिग्विजये नानादेशजये सप्तविंशोडध्याय:
ରାଜନ! ରଣମୁଖରେ ଋଷିକମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରି ଅର୍ଜୁନ ସେଠାରୁ ଶୁକର ଉଦର ସମାନ ହରିତାଭ ରଙ୍ଗର ଆଠଟି ଘୋଡ଼ା ଭେଟ ରୂପେ ପାଇ ସହ ଆଣିଲେ।
Verse 28
मयूरसदृशानन्यानुत्तरानपरानपि । जवनानाशुगांश्वैव करार्थ समुपानयत्,इनके सिवा मोरके समान रंगवाले उत्तम, गतिशील और शीघ्रगामी दूसरे भी बहुत-से घोड़े वे करके रूपमें वसूल कर लाये
ଏହାଛଡ଼ା ସେ କରାର୍ଥ (କର/ଭେଟ) ରୂପେ ମୟୂର ସଦୃଶ ବର୍ଣ୍ଣର, ଉତ୍ତମ, ବେଗବାନ ଓ ଅତିଶୀଘ୍ରଗାମୀ ଅନେକ ଅନ୍ୟ ଘୋଡ଼ା ମଧ୍ୟ ସଂଗ୍ରହ କରି ଆଣିଲେ।
Verse 29
स विनिर्जित्य संग्रामे हिमवन्तं सनिष्कुटम् । श्वेतपर्वतमासाद्य न्यविशत् पुरुषर्षभ:,इसके बाद पुरुषोत्तम अर्जुन संग्राममें हिमवान् और निष्कुट प्रदेशके अधिपतियोंको जीतकर धवलगिरिपर आये और वहीं सेनाका पड़ाव डाला
ଯୁଦ୍ଧରେ ହିମବାନ୍ ଓ ନିଷ୍କୁଟ-ପ୍ରଦେଶକୁ ଜୟ କରି ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅର୍ଜୁନ ଶ୍ୱେତପର୍ବତକୁ ପହଞ୍ଚି ସେଠାରେ ସେନାର ଶିବିର ସ୍ଥାପନ କଲେ।
The tension between Kṣātra obligation to secure political order and the ethical demand for restraint, repeatedly marked by victories achieved without excessive severity and, at points, through conciliation.
Effective sovereignty is portrayed as compatible with measured action—success in state expansion is ideally achieved through proportional force, negotiation, and controlled escalation.
No explicit phalaśruti is presented here; the chapter’s meta-function is archival and political, demonstrating how tribute and submission support ritual legitimacy and court-centered authority.