अर्जुनस्योत्तरदिग्विजयः
Arjuna’s Northern Conquests and Tribute Collection
तेनैव रथमुख्येन मनसस्तुल्यगामिना । धर्मराजविसूष्टेन दिव्येनानादयन् दिश:,भारत! जरासंधको बुद्धिपूर्वक मरवाकर शत्रुदमन श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर, कुन्ती तथा द्रौपदीसे आज्ञा ले, सुभद्रा, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा धौम्यजीसे भी पूछकर धर्मराजके दिये हुए उसी मनके समान वेगशाली दिव्य एवं उत्तम रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए अपनी द्वारकापुरीको चले गये
tenaiva rathamukhyena manas-tulya-gāminā | dharmarāja-visṛṣṭena divyenānādayan diśaḥ, bhārata |
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତେବେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦତ୍ତ ସେହି ଦିବ୍ୟ, ମନ ସମ ବେଗଶାଳୀ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି, ହେ ଭାରତ, ଦିଗମାନଙ୍କୁ ନିନାଦିତ କରି ସେ ନିଜ ଦ୍ୱାରକାପୁରୀକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
वैशम्पायन उवाच