Adhyaya 20
Sabha ParvaAdhyaya 2030 Verses

Adhyaya 20

Jarāsandha–Vāsudeva Saṃvāda: Kṣātra-Dharma, Pride, and the Ethics of Coercion (Sabhā Parva, Adhyāya 20)

Upa-parva: Jarāsandha–Saṃvāda (Discourse with Jarāsandha) — within Sabhā Parva

Adhyāya 20 stages a structured disputation. Jarāsandha opens by denying any remembered enmity and challenges the visitors to name his alleged wrongdoing, warning that harming the innocent burdens one’s conscience and violates dharma (1–5). Vāsudeva replies by reframing Jarāsandha’s conduct as culpable: he has subjugated kṣatriyas, generated severe fault, and seeks to justify violence under religious pretext; Vāsudeva rejects the propriety of human sacrifice and criticizes the moral confusion that labels peers as “beasts” (6–12). The discourse then pivots to kṣatriya ideology: Jarāsandha’s belief in unrivaled supremacy is described as delusion; Vāsudeva invokes the martial-ritual pathway where victory and restraint are disciplined under dharma, urging Jarāsandha to abandon arrogance and avoid ruin exemplified by earlier proud kings (13–22). Identity is disclosed—Vāsudeva and the Pāṇḍavas are not disguised brāhmaṇas—and a clear proposal is issued: engage in a direct contest or release the detained rulers (23–24). Jarāsandha answers with a boast of universal conquest and articulates an ethic of domination as kṣatriya practice, offering to fight singly or in combinations (25–28). Vaiśaṃpāyana concludes by noting Jarāsandha’s preparations and the narrative positioning of Jarāsandha as a destined target within the epic’s larger moral economy (29–34).

Chapter Arc: युधिष्ठिर की अनुमति मिलते ही श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीम—तीनों मगध-यात्रा का संकल्प बाँधते हैं; वायुदेव का संकेत-सा वचन बताता है कि जरासंध साधारण शत्रु नहीं, अपराजेय-सा पर्वत है। → यह स्पष्ट होता जाता है कि जरासंध को सामान्य रण-नीति से नहीं जीता जा सकता—देव-असुर भी युद्ध में उसे न जीत सकें, तो उपाय क्या हो? कृष्ण नीति, भीम बल और अर्जुन रक्षक-ढाल बनकर त्रयी की तरह एक ही यज्ञ-कार्य (राजसूय हेतु बाधा-निवारण) साधने निकलते हैं। → तीनों का निश्चय कठोर रूप लेता है: वे जरासंध से एकान्त में मिलेंगे और उसे ऐसी स्थिति में लाएँगे कि वह तीनों में से किसी एक के साथ द्वन्द्व स्वीकार करे—यहीं से ‘उपाय’ (रण से अधिक नीति) निर्णायक बनता है। → यात्रा का दृश्य-क्रम खुलता है—सरयू पार कर, पूर्वी कोसल, मिथिला, गंगा-शोण आदि नदियों-प्रदेशों को लाँघते हुए वे मगध की सीमा में पहुँचते हैं और गोधन-समृद्ध, जल-वन-शोभित मगध-पुर का दर्शन करते हैं। → मगध-पुर सामने है—अब अगला कदम है जरासंध के निकट जाना और उसे द्वन्द्व के लिए बाध्य करना; क्या नीति बल पर भारी पड़ेगी या बल नीति का मार्ग बनाएगा?

Shlokas

Verse 1

भीकम (2 अमान (जरासंधवधपर्व) विशोड€्ध्याय: युधिष्ठिरके अनुमोदन करनेपर श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेनकी मगध-यात्रा वायुदेव उवाच पतितौ हंसडिम्भकौ कंसश्न॒ सगणो हत: । जरासंधस्य निधने कालो5यं समुपागतः,श्रीकृष्ण कहते हैं--धर्मराज! जरासंधके मुख्य सहायक हंस और डिम्भक यमुनाजीमें डूब मरे। कंस भी अपने सेवकों और सहायकोंसहित कालके गालमें चला गया। अब जरासंधके नाशका यह उचित अवसर आ पहुँचा है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଧର୍ମରାଜ! ହଂସ ଓ ଡିମ୍ଭକ ପତିତ ହୋଇଛନ୍ତି; କଂସ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଗଣସହିତ ହତ ହୋଇଛି। ଏବେ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ବିନାଶର ନିୟତ କାଳ ଉପସ୍ଥିତ।

Verse 2

न शक्‍्यो<सौ रणे जेतुं सर्वैरपि सुरासुरै: । बाहुयुद्धेन जेतव्य: स इत्युपलभामहे,युद्धमें तो सम्पूर्ण देवता और असुर भी उसे जीत नहीं सकते, अतः मेरी समझमें यही आता है कि उसे बाहुयुद्धके द्वारा जीतना चाहिये

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ରଣରେ ସମସ୍ତ ଦେବ ଓ ଅସୁର ମିଶିଲେ ମଧ୍ୟ ତାକୁ ଜିତି ପାରିବେ ନାହିଁ; ତେଣୁ ମୋ ବୁଝାମଣାରେ ସେ ବାହୁଯୁଦ୍ଧରେ ହିଁ ଜିତାଯିବା ଉଚିତ।

Verse 3

मयि नीतिर्बलं भीमे रक्षिता चावयोर्जय: । मागध॑ साधयिष्याम इष्टिं त्रय इवाग्नय:,मुझमें नीति है, भीमसेनमें बल है और अर्जुन हम दोनोंकी रक्षा करनेवाले हैं; अतः जैसे तीन अग्नियाँ यज्ञकी सिद्धि करती हैं, उसी प्रकार हम तीनों मिलकर जरासंधके वधका काम पूरा कर लेंगे

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ମୋ ଭିତରେ ନୀତି ଅଛି, ଭୀମଙ୍କ ଭିତରେ ବଳ ଅଛି, ଏବଂ ଅର୍ଜୁନ ଆମ ଦୁହଙ୍କର ରକ୍ଷକ ଓ ବିଜୟର ନିଶ୍ଚୟ; ତେଣୁ ଯେପରି ତିନି ଅଗ୍ନି ମିଶି ଯଜ୍ଞକୁ ସିଦ୍ଧ କରେ, ସେପରି ଆମେ ତିନିଜଣ ମିଶି ମଗଧରାଜ (ଜରାସନ୍ଧ) ବଧକାର୍ଯ୍ୟ ସାଧିବୁ।

Verse 4

त्रिभिरासादितो5स्माभिविंजने स नराधिप: | न संदेहो यथा युद्धमेकेनाप्युपपास्यति,जब हम तीनों एकान्तमें राजा जरासंधसे मिलेंगे, तब वह हम तीनोंमेंसे किसी एकके साथ द्वन्दयुद्ध करना स्वीकार कर लेगा; इसमें संदेह नहीं है। अपमानके भयसे, बड़े योद्धा भीमसेनके साथ लड़नेके लोभसे तथा अपने बाहुबलसे घमंडमें चूर होनेसे जरासंध निश्चय ही भीमसेनके साथ युद्ध करनेको उद्यत होगा

ବାୟୁ କହିଲେ—ଆମେ ତିନିଜଣ ଯେତେବେଳେ ଏକାନ୍ତ ସ୍ଥାନରେ ସେଇ ରାଜା ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ନିକଟ କରିବୁ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଆମ ତିନିଜଣଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କାହାରୋ ଗୋଟିଏ ସହ ଏକକ ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱଯୁଦ୍ଧ ଗ୍ରହଣ କରିବେ। ମାନଭଙ୍ଗର ଭୟରୁ ସେ ଅସ୍ୱୀକାର କରିପାରିବେ ନାହିଁ; ଏବଂ ମହାବଳୀ ଭୀମସେନ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାର ଲୋଭ ଓ ନିଜ ବାହୁବଳର ଦର୍ପରେ ମତ୍ତ ହୋଇ ଜରାସନ୍ଧ ନିଶ୍ଚୟ ଭୀମ ସହ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଅଗ୍ରସର ହେବେ।

Verse 5

अवमानाच्च लोभाच्च बाहुवीर्याच्च दर्पित: । भीमसेनेन युद्धाय ध्रुवमप्युपयास्थति,जब हम तीनों एकान्तमें राजा जरासंधसे मिलेंगे, तब वह हम तीनोंमेंसे किसी एकके साथ द्वन्दयुद्ध करना स्वीकार कर लेगा; इसमें संदेह नहीं है। अपमानके भयसे, बड़े योद्धा भीमसेनके साथ लड़नेके लोभसे तथा अपने बाहुबलसे घमंडमें चूर होनेसे जरासंध निश्चय ही भीमसेनके साथ युद्ध करनेको उद्यत होगा

ବାୟୁ କହିଲେ—ଅପମାନରେ ଦଗ୍ଧ, ଲୋଭରେ ପ୍ରେରିତ ଓ ନିଜ ବାହୁବଳର ଦର୍ପରେ ମତ୍ତ ହୋଇ ଜରାସନ୍ଧ ନିଶ୍ଚୟ ଭୀମସେନ ସହ ଏକକ ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଅଗ୍ରସର ହେବେ।

Verse 6

अलं तस्य महाबाहुर्भीमसेनो महाबल: | लोकस्य समुदीर्णस्य निधनायान्तको यथा,जैसे उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत्‌के विनाशके लिये एक ही यमराज काफी हैं, उसी प्रकार महाबली महाबाहु भीमसेन जरासंधके वधके लिये पर्याप्त हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—ସେଇ କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ମହାବାହୁ, ମହାବଳୀ ଭୀମସେନ ଏକାଇ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ। ଯେପରି ନିୟତ ଅନ୍ତକୁ ପହଞ୍ଚିଥିବା ଜଗତର ବିନାଶ ପାଇଁ ଏକମାତ୍ର ଅନ୍ତକ ଯମ ଯଥେଷ୍ଟ, ସେପରି ଜରାସନ୍ଧବଧ ପାଇଁ ଭୀମ ଏକାଇ ଯଥେଷ୍ଟ।

Verse 7

यदि मे हृदयं वेत्सि यदि ते प्रत्ययो मयि । भीमसेनार्जुनौ शीघ्र न्‍्यासभूतौ प्रयच्छ मे,राजन्‌! यदि आप मेरे हृदयको जानते हैं और यदि आपका मुझपर विश्वास है तो भीमसेन और अर्जुनको शीघ्र ही धरोहरके रूपमें मुझे दे दीजिये

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଯଦି ଆପଣ ମୋ ହୃଦୟକୁ ଜାଣନ୍ତି ଏବଂ ଯଦି ମୋ ପ୍ରତି ଆପଣଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ଅଛି, ତେବେ ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଶୀଘ୍ର ‘ନ୍ୟାସ’ (ଧରୋହର) ଭାବେ ମୋତେ ସମର୍ପଣ କରନ୍ତୁ।

Verse 8

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तो भगवता प्रत्युवाच युधिष्ठिर: । भीमार्जुनौ समालोक्य सम्प्रह्ृष्टमुखौ स्थितौ,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान्‌के ऐसा कहनेपर वहाँ खड़े हुए भीमसेन और अर्जुनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उस समय उन दोनोंकी ओर देखकर युधिष्ठिरने इस प्रकार उत्तर दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭଗବାନ ଏପରି କହିବା ପରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ। ଆନନ୍ଦରେ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲ ମୁଖରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଭୀମ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଦେଖି, ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତାପରେ ଏଭଳି କହିଲେ।

Verse 9

युधिछिर उवाच अच्युताच्युत मा मैवं व्याहरामित्रकर्शन । पाण्डवानां भवान्‌ नाथो भवन्तं चाश्रिता वयम्‌,युधिष्ठिर बोले--अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले शत्रुसूदन अच्युत! आप ऐसी बात न कहें, न कहें। आप हम सब पाण्डवोंके स्वामी हैं, रक्षक हैं; हम सब लोग आपकी शरणमें हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଅଚ୍ୟୁତ, ଶତ୍ରୁସୂଦନ! ଏପରି କଥା କହନ୍ତୁ ନାହିଁ। ଆପଣ ଆମ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ନାଥ ଓ ରକ୍ଷକ; ଆମେ ସମସ୍ତେ ଆପଣଙ୍କ ଶରଣାଗତ।

Verse 10

यथा वदसि गोविन्द सर्व तदुपपद्यते | न हि त्वमग्रतस्तेषां येषां लक्ष्मी: पराड्मुखी,गोविन्द! आप जैसा कहते हैं, वह सब ठीक है। जिनकी राज्यलक्ष्मी विमुख हो चुकी है, उनके सम्मुख आप आते ही नहीं हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଗୋବିନ୍ଦ! ଆପଣ ଯେପରି କହୁଛନ୍ତି, ସବୁ ଯଥାଯଥ ମେଳ ଖାଉଛି। ଯାହାଙ୍କର ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀ ବିମୁଖ ହୋଇଯାଇଛି, ସେମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଆପଣ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 11

निहतश्न जरासंधो मोक्षिताश्न महीक्षित: | राजसूयश्न मे लब्धो निदेशे तव तिकछत:ः,आपकी आज्ञाके अनुसार चलनेमात्रसे मैं यह मानता हूँ कि जरासंध मारा गया। समस्त राजा उसकी कैदसे छुटकारा पा गये और मेरा राजसूययज्ञ भी पूरा हो गया

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଆପଣଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଦେଶକୁ ଅନୁସରଣ କରିଥିବାରୁ ମୁଁ ଏହିପରି ମନେ କରେ ଯେ ଜରାସନ୍ଧ ନିହତ ହେଲା, ବନ୍ଦୀ ରାଜାମାନେ ମୁକ୍ତ ହେଲେ, ଏବଂ ମୋର ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ମଧ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେଲା।

Verse 12

क्षिप्रमेव यथा त्वेतत्‌ कार्य समुपपद्यते । अप्रमत्तो जगन्नाथ तथा कुरु नरोत्तम

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଜଗନ୍ନାଥ, ହେ ନରୋତ୍ତମ! ସତର୍କ ରହି ଏପରି କରନ୍ତୁ, ଯେ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ଶୀଘ୍ର ଓ ଯଥାବିଧି ସିଦ୍ଧ ହେଉ।

Verse 13

त्रिभिर्भवद्धि्हिं विना नाहं जीवितुमुत्सहे । धर्मकामार्थरहितो रोगार्त इव दु:खित:

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଆପଣମାନେ ତିନିଜଣ ନଥିଲେ ମୁଁ ବଞ୍ଚିବାକୁ ସାହସ କରେନି। ଧର୍ମ, କାମ ଓ ଅର୍ଥରୁ ବଞ୍ଚିତ ହୋଇ ମୁଁ ରୋଗାକ୍ରାନ୍ତ ଲୋକ ପରି ଦୁଃଖିତ।

Verse 14

न शौरिणा विना पार्थो न शौरि: पाण्डवं विना । नाजेयो<स्त्यनयोलोंके कृष्णयोरिति मे मति:

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଶୌରି ବିନା ପାର୍ଥ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନୁହେଁ, ଏବଂ ପାଣ୍ଡବ ବିନା ଶୌରି ମଧ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନୁହେଁ। ଏହି ଲୋକରେ ଏହି ଦୁଇ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିପାରିବା କେହି ନାହିଁ—ଏହା ମୋର ମତ।

Verse 15

जगन्नाथ! पुरुषोत्तम! आप सावधान होकर वही उपाय कीजिये, जिससे यह कार्य शीघ्र ही पूरा हो जाय। जैसे धर्म, काम और अर्थसे रहित रोगातुर मनुष्य अत्यन्त दुःखी हो जीवनसे हाथ धो बैठता है, उसी प्रकार मैं भी आप तीनोंके बिना जीवित नहीं रह सकता। श्रीकृष्णके बिना अर्जुन और पाण्बुपुत्र अर्जुनके बिना श्रीकृष्ण नहीं रह सकते। इन दोनों कृष्णनामधारी वीरोंके लिये लोकमें कोई भी अजेय नहीं है; ऐसा मेरा विश्वास है | १२-- १४ || अयं च बलिनां श्रेष्ठ: श्रीमानपि वृकोदर: । युवाभ्यां सहितो वीर: कि न कुर्यान्महायशा:,यह बलवानोंमें श्रेष्ठ महायशस्वी कान्तिमान्‌ वीर भीमसेन भी आप दोनोंके साथ रहकर क्या नहीं कर सकता?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଏହି ବୀର ବୃକୋଦର ମଧ୍ୟ, ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଦୀପ୍ତିମାନ ଓ ମହାଯଶସ୍ବୀ—ତୁମ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ସହ ଥାଇ କ’ଣ କରିପାରିବ ନାହିଁ? କୃଷ୍ଣ ଓ ଅର୍ଜୁନ ଏକାଠି, ତାଙ୍କ ପାଖେ ଭୀମ ଥିଲେ, ଶୀଘ୍ର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେବାକୁ ଅସମର୍ଥ ଏମିତି କାର୍ଯ୍ୟ କିଛି ନାହିଁ।

Verse 16

सुप्रणीतो बलौघो हि कुरुते कार्यमुत्तमम्‌ । अंध॑ बल॑ जडं प्राहु: प्रणेतव्यं विचक्षणै:,चतुर सेनापतियोंद्वारा अच्छी तरह संचालित की हुई सेना उत्तम कार्य करती है, अन्यथा उस सेनाको अंधी और जड कहते हैं; अतः नीतिनिपुण पुरुषोंद्वारा ही सेनाका संचालन होना चाहिये

ସୁଭଳି ନିୟନ୍ତ୍ରିତ ସେନାବଳ ହିଁ ଉତ୍ତମ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧନ କରେ; ନହେଲେ ସେହି ବଳକୁ ଅନ୍ଧ ଓ ଜଡ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। ତେଣୁ ନୀତିନିପୁଣ ବିଚକ୍ଷଣମାନେ ହିଁ ସେନାକୁ ନେତୃତ୍ୱ ଦେବା ଉଚିତ।

Verse 17

यतो हि निम्नं भवति नयन्ति हि ततो जलम्‌ । यतश्कछिद्रं ततश्चापि नयन्ते धीवरा जलम्‌,जिधर नीची जमीन होती है, उधर ही लोग जल बहाकर ले जाते हैं। जहाँ गड्ढा होता है, उधर ही धीवर भी जल बहाते हैं (इसी प्रकार आपलोग भी जैसे कार्य-साधनमें सुविधा हो, वैसा ही करें)

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯେଉଁଠି ଭୂମି ନିମ୍ନ, ଲୋକେ ଜଳକୁ ସେଇ ଦିଗକୁ ନେଇଯାନ୍ତି; ଯେଉଁଠି ଛିଦ୍ର କିମ୍ବା ଗଡ଼ା, ସେଠିକୁ ମଧ୍ୟ ଧୀବରମାନେ ଜଳ ପ୍ରବାହ କରାନ୍ତି। ସେହିପରି, ଯେଉଁ ଉପାୟ ସମ୍ଭବ ଓ ସୁବିଧାଜନକ, ସେଇ ମାର୍ଗରେ ଅଗ୍ରସର ହେବା ଉଚିତ—ପରିସ୍ଥିତି ଯେ ଦିଗକୁ ସହଜ କରେ, ସେଇ ଦିଗକୁ ଧର।

Verse 18

तस्मान्नयविधानज्ञं पुरुषं लोकविश्रुतम्‌ । वयम॒श्रित्य गोविन्द यताम: कार्यसिद्धये,इसीलिये हम नीतिविधानके ज्ञाता लोकविख्यात महापुरुष श्रीगोविन्दकी शरण लेकर कार्यसिद्धिके लिये प्रयत्न करते हैं

ତେଣୁ ନୟବିଧାନର ଜ୍ଞାତା ଏବଂ ଲୋକବିଶ୍ରୁତ ଗୋବିନ୍ଦଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଆମେ କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ କରୁଛୁ।

Verse 19

एवं प्रज्ञानयबलं क्रियोपायसमन्वितम्‌ | पुरस्कुर्वीत कार्येषु कृष्णं कार्यार्थसिद्धये,इसी प्रकार सबके लिये यह उचित है कि कार्य और प्रयोजनकी सिद्धिके लिये सभी कार्योमें बुद्धि, नीति, बल, प्रयत्न और उपायसे युक्त श्रीकृष्णको ही आगे रखे

ଏହିପରି କାର୍ଯ୍ୟ ଓ ପ୍ରୟୋଜନର ସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉଦ୍ୟମରେ ପ୍ରଜ୍ଞା, ନୀତି, ବଳ, ପ୍ରୟାସ ଓ ଉପାୟରେ ଯୁକ୍ତ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖିବା ଯଥୋଚିତ; ତାହାଲେ ଅଭିପ୍ରେତ ଫଳ ନିଶ୍ଚୟ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ।

Verse 20

एवमेव यदुश्रेष्ठ यावत्कार्यार्थसिद्धये । अर्जुन: कृष्णमन्वेतु भीमो<न्वेतु धनंजयम्‌ । नयो जयो बलं चैव विक्रमे सिद्धिमेष्यति,यदुश्रेष्ठस इसी प्रकार समस्त कार्योकी सिद्धिके लिये आपका आश्रय लेना परम आवश्यक है। अर्जुन आप श्रीकृष्णका अनुसरण करें और भीमसेन अर्जुनका। नीति, विजय और बल तीनों मिलकर पराक्रम करें तो उन्हें अवश्य सिद्धि प्राप्त होगी इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि कृष्णपाण्डवमाग धयात्रायां विंशोडध्याय:

ହେ ଯଦୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହିପରି ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ଗ୍ରହଣ ପରମ ଆବଶ୍ୟକ। ଅର୍ଜୁନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରୁ; ଭୀମ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରୁ। ନୀତି, ବିଜୟ ଓ ବଳ—ଏ ତିନି ଏକତ୍ର ହୋଇ ପରାକ୍ରମ କଲେ—ନିଶ୍ଚୟ ସିଦ୍ଧି ମିଳେ।

Verse 21

वैशग्पायन उवाच एवमुक्तास्तत: सर्वे भ्रातरो विपुलौजस: । वार्ष्णेय: पाण्डवेयौ च प्रतस्थुर्मागधध॑ प्रति,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर वे सब महातेजस्वी भाई--श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेन मगधराज जरासंधसे भिड़नेके लिये उसकी राजधानीकी ओर चल दिये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏପରି କହିବା ପରେ, ମହାଉଜସ୍ବୀ ସେ ସମସ୍ତ ଭାଇ, ବାର୍ଷ୍ଣେୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସହିତ ପାଣ୍ଡବ ବୀରମାନେ, ମଗଧାଧିପତିଙ୍କ ଦିଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ—ତାଙ୍କ ନିଜ ରାଜଧାନୀରେ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କରିବା ସଙ୍କଳ୍ପରେ।

Verse 22

वर्चस्विनां ब्राह्मणानां स्नातकानां परिच्छदम्‌ | आच्छाद्य सुद्ददां वाक्यैर्मनोज्जैरभिनन्दिता:,उन्होंने तेजस्वी स्नातक ब्राह्मणोंके-से वस्त्र पहनकर उनके द्वारा अपने क्षत्रियरूपको छिपाकर यात्रा की। उस समय हितैषी सुहृदोंने मनोहर वचनोंद्वारा उन सबका अभिनन्दन किया

ସେମାନେ ତେଜସ୍ବୀ ସ୍ନାତକ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପରି ପୋଷାକ ପିନ୍ଧି ନିଜ କ୍ଷତ୍ରିୟ ପରିଚୟ ଲୁଚାଇ ଯାତ୍ରା କଲେ। ସେତେବେଳେ ହିତେଷୀ ସୁହୃଦମାନେ ମନୋହର ଓ ଦୃଢ଼ ବଚନରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଅଭିନନ୍ଦନ କଲେ।

Verse 23

अमषदिभिततप्तानां ज्ञात्यर्थ मुख्यतेजसाम्‌ । रविसोमाग्निवपुषां दीप्तमासीत्‌ तदा वपु:,जरासंधके प्रति रोषके कारण वे प्रज्वलित-से हो रहे थे। जाति-भाइयोंके उद्धारके लिये उनका महान्‌ तेज प्रकट हुआ था। उस समय सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके समान तेजस्वी शरीरवाले उन तीनोंका स्वरूप अत्यन्त उद्धासित हो रहा था। एक ही कार्यके लिये उद्यत हुए और युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले उन दोनों (कृष्णोंको अर्थात्‌ नर-नारायणरूप कृष्ण और अर्जुन)-को भीमसेनको आगे लिये जाते देख युधिष्ठिरको निश्चय हो गया कि जरासंध अवश्य मारा जायगा

ଜରାସନ୍ଧ ପ୍ରତି ଅସହ୍ୟ କ୍ରୋଧରେ ସେମାନେ ଭିତରେ ଭିତରେ ତପ୍ତ ହେଉଥିଲେ; ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କ ଉଦ୍ଧାରାର୍ଥେ ସେମାନଙ୍କ ମୁଖ୍ୟ ତେଜ ପ୍ରକଟ ହେଲା। ସେତେବେଳେ ସୂର୍ଯ୍ୟ, ଚନ୍ଦ୍ର ଓ ଅଗ୍ନି ସମ ଦୀପ୍ତ ଦେହଧାରୀ ସେ ତିନିଜଣଙ୍କ ରୂପ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଭାବେ ଜ୍ୱଳି ଉଠିଲା।

Verse 24

हतं मेने जरासंध॑ दृष्टवा भीमपुरोगमौ । एककार्यसमुद्यन्तौ कृष्णौ युद्धेडधपराजितौ,जरासंधके प्रति रोषके कारण वे प्रज्वलित-से हो रहे थे। जाति-भाइयोंके उद्धारके लिये उनका महान्‌ तेज प्रकट हुआ था। उस समय सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके समान तेजस्वी शरीरवाले उन तीनोंका स्वरूप अत्यन्त उद्धासित हो रहा था। एक ही कार्यके लिये उद्यत हुए और युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले उन दोनों (कृष्णोंको अर्थात्‌ नर-नारायणरूप कृष्ण और अर्जुन)-को भीमसेनको आगे लिये जाते देख युधिष्ठिरको निश्चय हो गया कि जरासंध अवश्य मारा जायगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭୀମକୁ ଆଗରେ ରଖି ଏକମାତ୍ର କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଥିବା, ଯୁଦ୍ଧରେ କେବେ ଅପରାଜିତ ସେଇ ଦୁଇ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦେଖି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଶ୍ଚୟ କଲେ—ଜରାସନ୍ଧ ଯେନେ ହତ ହୋଇଗଲା। ଜରାସନ୍ଧ ପ୍ରତି ଧର୍ମସମ୍ମତ କ୍ରୋଧରେ ପ୍ରଜ୍ୱଲିତ ହୋଇ, ସ୍ୱଜନଙ୍କ ଉଦ୍ଧାର ପାଇଁ ତାଙ୍କର ମହାତେଜ ପ୍ରକାଶିତ ହେଲା। ସେ ସମୟରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ-ଚନ୍ଦ୍ର-ଅଗ୍ନି ସମ ଦ୍ୟୁତିମାନ ସେଇ ତିନିଜଣଙ୍କ ରୂପ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ହୋଇଉଠିଲା।

Verse 25

ईशौ हि तौ महात्मानौ सर्वकार्यप्रवर्तिनौ | धर्मकामार्थलोकानां कार्याणां च प्रवर्तकौ,क्योंकि वे दोनों महात्मा निमेष-उन्मेषसे लेकर महाप्रलयपर्यन्त समस्त कार्योंके नियन्ता तथा धर्म, काम और अर्थसाधनमें लगे हुए लोगोंको तत्सम्बन्धी कार्योमें लगानेवाले ईश्वर (नर-नारायण) हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଇ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା ନିଶ୍ଚୟ ଈଶ୍ୱର; ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ପ୍ରବର୍ତ୍ତନ କରୁଥିବା। ନିମେଷ-ଉନ୍ମେଷରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ମହାପ୍ରଳୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମସ୍ତ କ୍ରିୟାର ନିୟନ୍ତା ସେମାନେ; ଏବଂ ଧର୍ମ, କାମ, ଅର୍ଥରେ ନିବିଷ୍ଟ ଲୋକଙ୍କୁ ତଦନୁକୂଳ କର୍ମରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ କରାନ୍ତି—ଏହିପରି ସେମାନେ ନର-ନାରାୟଣ।

Verse 26

कुरुभ्य: प्रस्थितास्ते तु मध्येन कुरुजाज्लम्‌ । रम्यं पच्मसरो गत्वा कालकूटमतीत्य च,वे तीनों कुरुदेशसे प्रस्थित हो कुरुजांगलके बीचसे होते हुए रमणीय पद्मसरोवरपर पहुँचे। फिर कालकूट पर्वतको लाँधचकर गण्डकी, महाशोण, सदानीरा एवं एकपर्वतक प्रदेशकी सब नदियोंको क्रमश: पार करते हुए आगे बढ़ते गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ କୁରୁଦେଶରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରି କୁରୁଜାଙ୍ଗଲର ମଧ୍ୟଦେଇ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ। ରମଣୀୟ ପଦ୍ମସରୋବରକୁ ପହଞ୍ଚି, ପରେ କାଳକୂଟ ପର୍ବତକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ଗଣ୍ଡକୀ, ମହାଶୋଣ, ସଦାନୀରା ଏବଂ ଏକପର୍ବତ ଦେଶର ନଦୀମାନଙ୍କୁ କ୍ରମେ ପାର କରି ଆଗକୁ ବଢ଼ିଗଲେ।

Verse 27

गण्डकीं च महाशोणं सदानीरां तथैव च । एकपर्वतके नद्यः क्रमेणैत्याव्रजन्त ते,वे तीनों कुरुदेशसे प्रस्थित हो कुरुजांगलके बीचसे होते हुए रमणीय पद्मसरोवरपर पहुँचे। फिर कालकूट पर्वतको लाँधचकर गण्डकी, महाशोण, सदानीरा एवं एकपर्वतक प्रदेशकी सब नदियोंको क्रमश: पार करते हुए आगे बढ़ते गये

ସେମାନେ ଗଣ୍ଡକୀ, ମହାଶୋଣ, ସଦାନୀରା ଏବଂ ଏକପର୍ବତ ଦେଶର ନଦୀମାନଙ୍କୁ କ୍ରମେ ପାର କରି ଆଗକୁ ବଢ଼ିଲେ।

Verse 28

उत्तीर्य सर॒यूं रम्यां दृष्टवा पूर्वाश्ष कोसलान्‌ | अतीत्य जम्मुर्मिथिलां पश्यन्तो विपुला नदी:,इससे पहले मार्ममें उन्होंने रमणीय सरयू नदी पार करके पूर्वी कोसलप्रदेशमें भी पदार्पण किया था। कोसल पार करके बहुत-सी नदियोंका अवलोकन करते हुए वे मिथिलामें गये। गंगा और शोणभद्रको पार करके वे तीनों अच्युत वीर पूर्वाभिमुख होकर चलने लगे। उन्होंने कुश एवं चीरसे ही अपने शरीरको ढक रखा था। जाते-जाते वे मगधक्षेत्रकी सीमामें पहुँच गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ରମଣୀୟ ସରୟୂ ନଦୀକୁ ପାର କରି ପୂର୍ବ କୋସଲକୁ ଦେଖିଲେ। ପରେ ଜମ୍ବୁ-ପ୍ରଦେଶକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ପଥେ ପଥେ ଅନେକ ବିପୁଳ ନଦୀ ନିହାରି ମିଥିଲାକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 29

अतीत्य गड्डां शोणं च त्रयस्ते प्राड्मुखास्तदा । कुशचीरच्छदा जम्मुर्मागधं क्षेत्रमच्युता:,इससे पहले मार्ममें उन्होंने रमणीय सरयू नदी पार करके पूर्वी कोसलप्रदेशमें भी पदार्पण किया था। कोसल पार करके बहुत-सी नदियोंका अवलोकन करते हुए वे मिथिलामें गये। गंगा और शोणभद्रको पार करके वे तीनों अच्युत वीर पूर्वाभिमुख होकर चलने लगे। उन्होंने कुश एवं चीरसे ही अपने शरीरको ढक रखा था। जाते-जाते वे मगधक्षेत्रकी सीमामें पहुँच गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଗଙ୍ଗା ଓ ଶୋଣକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ସେଇ ତିନି ଦୃଢ଼ବ୍ରତ ବୀର ତେବେ ପୂର୍ବମୁଖ ହୋଇ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ। କୁଶଘାସ ଓ ବଲ୍କଳବସ୍ତ୍ରରେ ମାତ୍ର ଦେହ ଢାକି ଯାତ୍ରା କରି କରି, କ୍ରମେ ମଗଧଦେଶର ସୀମାକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 30

ते शश्वद्‌ गोधनाकीर्णमम्बुमन्तं शुभद्रुमम्‌ । गोरथ॑ं गिरिमासाद्य ददृशुर्मागधं पुरम्‌,फिर सदा गोधनसे भरे-पूरे, जलसे परिपूर्ण तथा सुन्दर वृक्षोंसे सुशोभित गोरथ पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने मगधकी राजधानीको देखा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସଦା ଗୋଧନରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, ଜଳସମୃଦ୍ଧ ଓ ଶୁଭବୃକ୍ଷରେ ଶୋଭିତ ଗୋରଥ ପର୍ବତକୁ ପହଞ୍ଚି ସେମାନେ ମଗଧମାନଙ୍କ ନଗରୀ—ରାଜଧାନୀ—କୁ ଦେଖିଲେ।

Frequently Asked Questions

Whether a ruler can claim kṣatriya-duty while subjugating peers and treating them as instruments of prestige or ritual intent; the chapter tests the boundary between legitimate enforcement and unjust coercion against those deemed not guilty.

Power must be ethically constrained: dharma is not validated by victory alone, and pride (māna/darpa) is portrayed as a systematic risk that corrupts judgment, invites downfall, and harms public order.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary appears through Vaiśaṃpāyana’s closing framing, which positions the confrontation as part of an ordered moral sequence in the epic where harmful governance becomes subject to corrective intervention.