
Kṛṣṇasya Khāṇḍavaprasthāt Dvārakā-prayāṇaḥ | Krishna’s Departure for Dvārakā
Upa-parva: Kṛṣṇa-Dvārakāgamanam (Departure from Khāṇḍavaprastha to Dvārakā)
Vaiśaṃpāyana narrates Kṛṣṇa’s conclusion of a peaceful stay at Khāṇḍavaprastha, where he has been honored by the Pāṇḍavas. Desiring to see his father, Kṛṣṇa consults Dharmarāja (Yudhiṣṭhira) and Kuntī, then offers reverential greetings to elders and kin. He meets Subhadrā with visible affection, receives messages oriented to family obligations, and proceeds to acknowledge Draupadī and the household priest Dhaumya according to custom. The departure is framed as a public, ritually ordered act: worship of deities and brāhmaṇas, benedictions with auspicious substances, and gifts (vasu) before circumambulation. Kṛṣṇa mounts a swift golden chariot bearing the Garuḍa emblem, armed with his characteristic weapons, and departs at an auspicious tithi, nakṣatra, and muhūrta. Yudhiṣṭhira briefly takes the reins in a gesture of devotion; Arjuna, Bhīma, and the twins accompany him in procession. After mutual embraces and formal leave-taking, Kṛṣṇa sends them back and reaches Dvārakā in due time, while the Pāṇḍavas remain emotionally drawn to him even after he vanishes from sight.
Chapter Arc: खाण्डवप्रस्थ में अतिथि-सा ठहरकर, फिर पिता के दर्शन की लालसा से श्रीकृष्ण का द्वारका लौटने का निश्चय—और धर्मराज युधिष्ठिर व माता कुन्ती से विदा लेने की तैयारी। → कृष्ण का प्रणाम, आलिंगन, अनुमति-याचना—कुन्ती, युधिष्ठिर, द्रौपदी, धौम्य आदि के साथ विदाई के संस्कार; पाण्डवों और नगरवासियों का मन कृष्ण के साथ खिंचता चला जाता है, विदाई का क्षण भारी होता जाता है। → जगद्वन्द्य केशव का कुन्ती के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम और कुन्ती द्वारा शिर पर आशीर्वाद—इसके बाद कृष्ण का रथारूढ़ होकर प्रस्थान, और पाण्डवों का नेत्रों से उन्हें तब तक अनुगमन करना जब तक वे दृष्टिपथ से ओझल न हो जाएँ। → कृष्ण शीघ्र द्वारका पहुँचते हैं; पाण्डव अपने नगर लौटते हैं, पर मन गोविन्द में अटका रहता है—विदाई के बाद भी संबंध की डोर और वचन-बंध बना रहता है। → द्वारका में कृष्ण का स्वजनों (रुक्मिणी तथा पुत्रों/यादवों) से मिलन—और आगे के प्रसंगों के लिए मंच तैयार: यह प्रस्थान किस नए राजनैतिक/धार्मिक घटनाक्रम की भूमिका बनेगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं) अपन क्ात छा आर: द्वितीयो<्थ्याय: श्रीकृष्णकी द्वाराकायात्रा वैशम्पायन उवाच उषित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दन: । पार्थ: प्रीतिसमायुक्तै: पूजनाहोंडभिपूजित:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! परम पूजनीय भगवान् श्रीकृष्ण खाण्डवप्रस्थमें सुखपूर्वक रहकर प्रेमी पाण्डवोंके द्वारा नित्य पूजित होते रहे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଖାଣ୍ଡବପ୍ରସ୍ଥରେ ସୁଖପୂର୍ବକ ବସବାସ କରୁଥିବା ପୂଜ୍ୟ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପ୍ରେମରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ପାଣ୍ଡବମାନେ ନିରନ୍ତର ଭକ୍ତିଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ପୂଜା କରୁଥିଲେ।
Verse 2
गमनाय मतिं चक्रे पितुर्दर्शनलालस: । धर्मराजमथामन्त्रय पृथां च पृुथुलोचन:,तदनन्तर पिताके दर्शनके लिये उत्सुक होकर विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिर और कुन्तीकी आज्ञा लेकर वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि भगवद्याने द्वितीयोडध्याय:
ପିତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ଉତ୍ସୁକ ହୋଇ ବିଶାଳ-ନେତ୍ର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବାକୁ ମନ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ। ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଓ ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ)ଙ୍କ ଅନୁମତି ନେଇ ସେଠାରୁ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କଲେ—ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ଶିଷ୍ଟାଚାର ରକ୍ଷା କରି।
Verse 3
ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना जगद्वन्द्य: पितृष्वसु: । स तया मूर्ध्न्युपाच्रात: परिष्वक्तश्न केशव:,जगद्वन्द्ध केशवने अपनी बुआ कुन्तीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और कुन्तीने उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया
ଜଗତ୍-ବନ୍ଦ୍ୟ କେଶବ ନିଜ ପିତୃସ୍ୱସା କୁନ୍ତୀ (ପୃଥା)ଙ୍କ ଚରଣରେ ମସ୍ତକ ରଖି ପ୍ରଣାମ କଲେ। କୁନ୍ତୀ ସ୍ନେହରେ ତାଙ୍କ ମସ୍ତକ ସୁଘି ହୃଦୟରେ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ।
Verse 4
ददर्शानन्तरं कृष्णो भगिनीं स्वां महायशा: । तामुपेत्य हृषीकेश: प्रीत्या बाष्पसमन्वित:,तत्पश्चात् महायशस्वी हृषीकेश अपनी बहिन सुभद्रासे मिले। उसके पास जानेपर स्नेहवश उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये
ତାପରେ ମହାଯଶସ୍ବୀ କୃଷ୍ଣ ନିଜ ଭଗିନୀ ସୁଭଦ୍ରାଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ। ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଉଥିବାବେଳେ ହୃଷୀକେଶ ସ୍ନେହାନନ୍ଦରେ ବିହ୍ୱଳ ହେଲେ, ଚକ୍ଷୁରେ ଅଶ୍ରୁ ଭରି ଆସିଲା।
Verse 5
अर्थ्य तथ्यं हितं वाक््यं लघु युक्तमनुत्तरम् । उवाच भगवान् भद्रां सुभद्रां भद्रभाषिणीम्,भगवानने मंगलमय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी सुभद्रासे बहुत थोड़े, सत्य, प्रयोजनपूर्ण, हितकारी, युक्तियुक्त एवं अकाट्य वचनोंद्वारा अपने जानेकी आवश्यकता बतायी (और उसे ढाढ़स बँधाया)
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭଗବାନ ଶୁଭଭାଷିଣୀ କଲ୍ୟାଣମୟୀ ସୁଭଦ୍ରାଙ୍କୁ ଅତି ସଂକ୍ଷିପ୍ତ କିନ୍ତୁ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ବାକ୍ୟ କହିଲେ—ଯାହା ସତ୍ୟ, ପ୍ରୟୋଜନପୂର୍ଣ୍ଣ, ହିତକର, ଯୁକ୍ତିସମ୍ମତ ଓ ଅଖଣ୍ଡନୀୟ। ସେହି ଉପଦେଶରେ ସେ ନିଜ ପ୍ରସ୍ଥାନର ଆବଶ୍ୟକତା ଜଣାଇ ତାଙ୍କ ହୃଦୟକୁ ଆଶ୍ୱସ୍ତ କଲେ।
Verse 6
तया स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि स: । सम्पूजितश्चाप्पसकृच्छिरसा चाभिवादित:,सुभद्राने बार-बार भाईकी पूजा करके मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और माता- पिता आदि स्वजनोंसे कहनेके लिये संदेश दिये
ସୁଭଦ୍ରା ମାତା-ପିତା ଆଦି ସ୍ୱଜନମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯେ ସନ୍ଦେଶ ଦେଲେ, ସେ ତାହା ଶୁଣିଲେ। ତାପରେ ସୁଭଦ୍ରା ପୁନଃପୁନଃ ତାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନରେ ପୂଜା କରି, ଶିର ନମାଇ ବାରମ୍ବାର ପ୍ରଣାମ କଲେ।
Verse 7
तामनुज्ञाय वार्ष्णेय: प्रतिनन्द्य च भामिनीम् । ददर्शानन्तरं कृष्णां धौम्यं चापि जनार्दन:,भामिनी सुभद्राको प्रसन्न करके उससे जानेकी अनुमति लेकर वृष्णिकुलभूषण जनार्दन द्रौपदी तथा धौम्यमुनिसे मिले
ଭାମିନୀ ସୁଭଦ୍ରାଙ୍କ ଅନୁମତି ନେଇ ଏବଂ ତାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଜଣାଇ ବୃଷ୍ଣିକୁଳଭୂଷଣ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପରେ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ଓ ମୁନି ଧୌମ୍ୟଙ୍କୁ ଭେଟିଲେ।
Verse 8
ववन्दे च यथान्यायं धौम्यं पुरुषसत्तम: । द्रौपदी सान्त्वयित्वा च आमन्त्रय च जनार्दन:,पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने यथोचित रीतिसे धौम्यजीको प्रणाम किया और द्रौपदीको सान्त्वना दे उसकी अनुमति लेकर वे अर्जुनके साथ अन्य भाइयोंके पास गये। पाँचों भाई पाण्डवोंसे घिरे हुए विद्वान् एवं बलवान् श्रीकृष्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए
ପୁରୁଷସତ୍ତମ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯଥାନ୍ୟାୟ ଧୌମ୍ୟ ମୁନିଙ୍କୁ ବନ୍ଦନା କଲେ। ପରେ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଇ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଅନୁମତି ନେଇ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 9
भ्रातृनभ्यगमद् दिद्वान् पार्थेन सहितो बली । भ्रातृभि: पञ्चभि: कृष्णो वृत: शक्र इवामरै:,पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने यथोचित रीतिसे धौम्यजीको प्रणाम किया और द्रौपदीको सान्त्वना दे उसकी अनुमति लेकर वे अर्जुनके साथ अन्य भाइयोंके पास गये। पाँचों भाई पाण्डवोंसे घिरे हुए विद्वान् एवं बलवान् श्रीकृष्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए
ତାପରେ ବିଦ୍ୱାନ୍ ଓ ବଳବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ସହିତ ଭ୍ରାତୃମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ। ପାଞ୍ଚ ପାଣ୍ଡବ ଭ୍ରାତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇଥିବା କୃଷ୍ଣ ଦେବତାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରା ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ପରି ଶୋଭିତ ହେଲେ।
Verse 10
यात्राकालस्य योग्यानि कर्माणि गरुडथ्वज: । कर्तुकाम: शुचिर्भूत्वा स्नातवान् समलंकृत:,तदनन्तर गरुडध्वज श्रीकृष्णने यात्राकालोचित कर्म करनेके लिये पवित्र हो स्नान करके अलंकार धारण किया
ତଦନନ୍ତର ଗରୁଡଧ୍ୱଜ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯାତ୍ରାକାଳର ଯୋଗ୍ୟ କର୍ମ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରି ଶୁଚି ହୋଇ ସ୍ନାନ କଲେ ଏବଂ ଅଳଙ୍କାର ଧାରଣ କଲେ।
Verse 11
अर्चयामास देवांश्र द्विजांश्व॒ यदुपुड्भव: । माल्यजाप्यनमस्कारैर्गन्धैरुच्चावचैरपि,फिर उन यदुश्रेष्ठने प्रचुर पुष्प-माला, जप, नमस्कार और चन्दन आदि अनेक प्रकारके सुगन्धित पदार्थोद्वारा देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा की
ପରେ ଯଦୁକୁଳଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପୁଷ୍ପମାଳା, ଜପ, ନମସ୍କାର ଏବଂ ଚନ୍ଦନାଦି ନାନା ପ୍ରକାର ସୁଗନ୍ଧିତ ଦ୍ରବ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ଓ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ (ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ) ବିଧିପୂର୍ବକ ଅର୍ଚ୍ଚନା କଲେ।
Verse 12
स कृत्वा सर्वकार्याणि प्रतस्थे तस्थुषां वर: | उपेत्य स यदुश्रेष्ठो बाह्मुकक्षाद् विनिर्गत:,प्रतिष्ठित पुरुषोंमें श्रेष्ठ यदुप्रवर श्रीकृष्ण यात्राकालोचित सब कार्य पूर्ण करके प्रस्थित हुए और भीतरसे चलकर बाहरी ड्योढ़ीको पार करते हुए राजभवनसे बाहर निकले
ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯଦୁପ୍ରବର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯାତ୍ରାକାଳୋଚିତ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟ ସମାପ୍ତ କରି ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ; ଭିତରୁ ଚାଲି ବାହାର ଡ୍ୟୋଢ଼ି ଅତିକ୍ରମ କରି ରାଜଭବନରୁ ବାହାରିଲେ।
Verse 13
स्वस्तिवाच्याहतो विप्रान् दधिपात्रफलाक्षतै: । वसु प्रदाय च ततः प्रदक्षिणमथाकरोत्,उस समय सुयोग्य ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया और भगवानने दहीसे भरे पात्र, अक्षत, फल आदिके साथ जन ब्राह्मणोंको धन देकर उन सबकी परिक्रमा की
ସେତେବେଳେ ଯୋଗ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କଲେ; ଭଗବାନ ଦହିଭରା ପାତ୍ର, ଅକ୍ଷତ, ଫଳ ଆଦି ସହିତ ସେମାନଙ୍କୁ ଧନ ଦେଇ, ପରେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପ୍ରଦକ୍ଷିଣା କଲେ।
Verse 14
काज्चनं रथमास्थाय तार्ष्यकेतनमाशुगम् | गदाचक्रासिशार्ड्रद्यिरायुधैरावृतं शुभम्,इसके बाद गरुडचिह्वनित ध्वजासे सुशोभित और गदा, चक्र, खड्ग एवं शाड्र्गधनुष आदि आयुधोंसे सम्पन्न शैब्य, सुग्रीव आदि घोड़ोंसे युक्त शुभ सुवर्णमय रथपर आखरूढ़ हो कमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की
ତାପରେ ଗରୁଡଚିହ୍ନିତ ଧ୍ୱଜରେ ଶୋଭିତ, ଗଦା-ଚକ୍ର-ଖଡ୍ଗ ଓ ଶାର୍ଙ୍ଗଧନୁ ଆଦି ଆୟୁଧରେ ସଜ୍ଜିତ, ଶୁଭ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଦ୍ରୁତ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି କମଳନୟନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଉତ୍ତମ ତିଥି, ଶୁଭ ନକ୍ଷତ୍ର ଓ ଗୁଣଯୁକ୍ତ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ଯାତ୍ରା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 15
तिथावप्यथ नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते । प्रययौ पुण्डरीकाक्ष: शैब्यसुग्रीववाहन:,इसके बाद गरुडचिह्वनित ध्वजासे सुशोभित और गदा, चक्र, खड्ग एवं शाड्र्गधनुष आदि आयुधोंसे सम्पन्न शैब्य, सुग्रीव आदि घोड़ोंसे युक्त शुभ सुवर्णमय रथपर आखरूढ़ हो कमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की
ତାପରେ ଉତ୍ତମ ତିଥି, ଶୁଭ ନକ୍ଷତ୍ର ଓ ଗୁଣଯୁକ୍ତ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ, ଶୈବ୍ୟ ଓ ସୁଗ୍ରୀବ ଆଦି ଅଶ୍ୱମାନେ ଯୁକ୍ତ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି କମଳନୟନ ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯାତ୍ରାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 16
अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिर: । अपास्य चास्य यन्तारं दारुक॑ यन्तृसत्तमम्,उस समय श्रीकृष्णका रथ हाँकनेवाले सारथियोंमें श्रेष्ठ दारुकको हटाकर उसके स्थानमें राजा युधिष्ठिर प्रेमपूर्वक भगवान्के साथ रथपर जा बैठे
ସେତେବେଳେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ରଥ ହାଙ୍କୁଥିବା ସାରଥିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦାରୁକଙ୍କୁ ପାଶେ ରଖି, ତାଙ୍କ ସ୍ଥାନରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପ୍ରେମପୂର୍ବକ ଭଗବାନଙ୍କ ସହ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ବସିଲେ।
Verse 17
अभीषून् सम्प्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा । उपारुह्ार्जुनश्वापि चामरव्यजनं सितम्
ତେବେ କୁରୁପତି ସ୍ୱୟଂ ଲଗାମ ଧରିଲେ। ଅର୍ଜୁନ ମଧ୍ୟ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି, ପରିଚର୍ଯ୍ୟା-ଧର୍ମରୂପେ ଶ୍ୱେତ ଚାମର-ବ୍ୟଜନ ଧାରଣ କରି ରାଜକୀୟ ମର୍ଯ୍ୟାଦାକୁ ଶୋଭାୟିତ କଲେ।
Verse 18
तथैव भीमसेनो5पि यमाभ्यां सहितो बली,अन्वीयमान: शुशुभे शिष्यैरिव गुरु: प्रियै: इसी प्रकार नकुल-सहदेवसहित बलवान् भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शाड््गधनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों)-से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया। उस छत्रमें वैदूर्ययमणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीजघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे। उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों
ସେହିପରି ବଳବାନ ଭୀମସେନ ମଧ୍ୟ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ଯମଜ (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ସହ ଅନୁସରଣ କରି ଶୋଭିତ ହେଲେ—ଯେପରି ପ୍ରିୟ ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ ଗୁରୁ ଅଗ୍ରସର ହୁଅନ୍ତି।
Verse 19
पृष्ठतोडनुययौ कृष्णमृत्विक्पौरजनै: सह । (छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् । वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम् ।। दधार तरसा भीमश्छत्र तच्छार््डधन्वने । उपारुहा[ रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते ।। नकुल: सहदेवश्न धूयमानौ जनार्दनम् ।) स तथा क्रातृभि: सर्वे: केशव: परवीरहा
କୃଷ୍ଣଙ୍କ ପଛେ ଋତ୍ୱିଜମାନେ ଓ ପୌରଜନମାନେ ସହ ଅନୁସରଣ କଲେ। ଭୀମ ତ୍ୱରାରେ ଶାର୍ଂଗଧନ୍ୱୀଙ୍କ ଉପରେ ଶତଶଲାକାଯୁକ୍ତ, ଦିବ୍ୟମାଳାରେ ଶୋଭିତ, ବୈଡୂର୍ୟମଣି-ଦଣ୍ଡସହିତ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣବିଭୂଷିତ ଛତ୍ର ଧାରଣ କଲେ। ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ ଶୀଘ୍ର ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ଜନାର୍ଦନଙ୍କ ଉପରେ ଶ୍ୱେତ ଚାମର-ବ୍ୟଜନ ଡୁଳାଇଲେ। ଏଭଳି ସମସ୍ତ ଭ୍ରାତାଙ୍କ ସେବାରେ କେଶବ—ପରବୀରହନ୍ତା—ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 20
पार्थमामन्त्रय गोविन्द: परिष्वज्य सुपीडितम्,श्रीकृष्णके बिछोहसे अर्जुनको बड़ी व्यथा हो रही थी। गोविन्दने उन्हें हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी अनुमति ली। फिर उन्होंने युधिष्ठिर और भीमसेनका चरणस्पर्श किया। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनने भगवान्को छातीसे लगा लिया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया (तब भगवानने भी उन दोनोंको छातीसे लगा लिया)
ଗୋବିନ୍ଦ ପାର୍ଥଙ୍କୁ ବିଦାୟର ଅନୁମତି ମାଗି, ବିରହବ୍ୟଥାରେ ପୀଡିତ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ହୃଦୟସହିତ ଧରି ଦୃଢ଼ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ। ପରେ ସେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଓ ଭୀମସେନଙ୍କ ପାଦ ସ୍ପର୍ଶ କଲେ। ତାପରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମ ଓ ଅର୍ଜୁନ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ ବକ୍ଷସ୍ଥଳେ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ; ନକୁଳ-ସହଦେବ ତାଙ୍କ ପାଦରେ ପ୍ରଣାମ କଲେ—ଏବଂ ସେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କୁ ସ୍ନେହରେ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ।
Verse 21
युधिष्ठिरं पूजयित्वा भीमसेनं यमौ तथा । परिष्वक्तो भृशं तैस्तु यमाभ्यामभिवादित:,श्रीकृष्णके बिछोहसे अर्जुनको बड़ी व्यथा हो रही थी। गोविन्दने उन्हें हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी अनुमति ली। फिर उन्होंने युधिष्ठिर और भीमसेनका चरणस्पर्श किया। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनने भगवान्को छातीसे लगा लिया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया (तब भगवानने भी उन दोनोंको छातीसे लगा लिया)
ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମସେନ ଓ ଯମଜ (ନକୁଳ-ସହଦେବ)ଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଇ, ସେ ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ନେହପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଆଲିଙ୍ଗିତ ହେଲେ; ଏବଂ ଯମଜମାନେ ତାଙ୍କୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ଅଭିବାଦନ କଲେ।
Verse 22
योजनार्धमथो गत्वा कृष्ण: परपुरंजय: । युधिष्ठिरं समामन्त्रय निवर्तस्वेति भारत,भारत! शत्रुविजयी श्रीकृष्णने दो कोस दूर चले जानेपर युधिष्ठिरसे जानेकी अनुमति ले यह अनुरोध किया कि 'अब आप लौट जाइये'
ଅର୍ଧ ଯୋଜନ ଆଗକୁ ଯାଇ ପରପୁରଜୟୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କରି ବିଦାୟ ନେଇ କହିଲେ—“ହେ ଭାରତ, ଏବେ ଆପଣ ଫେରନ୍ତୁ।”
Verse 23
ततो<5भिवाद्य गोविन्द: पादौ जग्राह धर्मवित् | उत्थाप्य धर्मराजस्तु मूर्थ्न्युपाप्राय केशवम्,तदनन्तर धर्मज्ञ गोविन्दने प्रणाम करके युधिष्ठिरके पैर पकड़ लिये। फिर पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्छिरने यादवश्रेष्ठ कमलनयन केशवको दोनों हाथोंसे उठाकर उनका मस्तक सूँघा और “जाओ” कहकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी
ତାପରେ ଧର୍ମଜ୍ଞ ଗୋବିନ୍ଦ ପ୍ରଣାମ କରି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଦ ଧରିଲେ। ଧର୍ମରାଜ କେଶବଙ୍କୁ ଉଠାଇ ସ୍ନେହରେ ତାଙ୍କ ମସ୍ତକ ଘ୍ରାଣ କରି “ଯାଅ” ବୋଲି ବିଦାୟ ଦେଲେ।
Verse 24
पाण्डवो यादवश्रेष्ठ कृष्णं कमललोचनम् । गम्यतामित्यनुज्ञाप्य धर्मराजो युधिष्ठटिर:,तदनन्तर धर्मज्ञ गोविन्दने प्रणाम करके युधिष्ठिरके पैर पकड़ लिये। फिर पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्छिरने यादवश्रेष्ठ कमलनयन केशवको दोनों हाथोंसे उठाकर उनका मस्तक सूँघा और “जाओ” कहकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी
ତେବେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯାଦବଶ୍ରେଷ୍ଠ କମଳଲୋଚନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ “ଆପଣ ଯାଆନ୍ତୁ” ବୋଲି ଅନୁମତି ଦେଇ ବିଦାୟ କଲେ।
Verse 25
ततस्तै: संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदन: । निवर्त्य च तथा कृच्छात् पाण्डवान् सपदानुगान्,तत्पश्चात् उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान् मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों-सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों। जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे
ତାପରେ ମଧୁସୂଦନ ଯଥାବତ୍ ପ୍ରତିଜ୍ଞା-ସମ୍ବିଦ କରି, ପାଦେ ଅନୁସରଣ କରିଥିବା ନାଗରିକମାନଙ୍କ ସହିତ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ବହୁ କଷ୍ଟରେ ଫେରାଇଲେ।
Verse 26
स्वां पुरी प्रययौ हृष्टो यथा शक्रो5मरावतीम् | लोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात् तदा,तत्पश्चात् उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान् मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों-सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों। जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे
ସେ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ନିଜ ପୁରୀକୁ ପ୍ରୟାଣ କଲେ—ଯେପରି ଶକ୍ର ଅମରାବତୀକୁ ଯାଆନ୍ତି। ସେତେବେଳେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ସେ ଦୃଷ୍ଟିପଥରୁ ଅଦୃଶ୍ୟ ହେଉଅବଧି ନେତ୍ରଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରୁଥିଲେ।
Verse 27
मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात् | अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने,अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया। अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये। पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी। उन सबका मन भगवान् गोविन्दके साथ ही चला गया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଗଭୀର ପ୍ରୀତିର ବନ୍ଧନରେ ସେମାନଙ୍କ ମନ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଚାଲିଗଲା। କେଶବଙ୍କ ଦର୍ଶନ ହେଲା ସତ୍ତ୍ୱେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ହୃଦୟ ତୃପ୍ତ ହେଲା ନାହିଁ; ଏତେ ପ୍ରବଳ ଥିଲା ତାଙ୍କ ସାନ୍ନିଧ୍ୟ ପ୍ରତି ପ୍ରେମ ଓ ଆକାଂକ୍ଷା।
Verse 28
क्षिप्रमन्तर्दथे शौरिश्वक्षुषां प्रियदर्शन: । अकामा एव पार्थास्ति गोविन्दगतमानसा:,अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया। अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये। पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी। उन सबका मन भगवान् गोविन्दके साथ ही चला गया
ସମସ୍ତଙ୍କ ଚକ୍ଷୁକୁ ପ୍ରିୟ ଦର୍ଶନ ଦେଇଥିବା ଶୌରି କ୍ଷଣମାତ୍ରେ ଅଦୃଶ୍ୟ ହୋଇଗଲେ। ପାର୍ଥମାନଙ୍କର ଦର୍ଶନ-ଆକାଂକ୍ଷା ଅପୂର୍ଣ୍ଣ ରହିଲା, ତଥାପି ସେମାନେ ଯେନେ ନିଷ୍କାମ ହେଲେ—କାରଣ ସେମାନଙ୍କ ମନ ଗୋବିନ୍ଦଙ୍କ ପଛେ ଚାଲିଗଲା।
Verse 29
निवृत्योपययुस्तर्ण स्वं पुरं पुरुषर्षभा: । स्यन्दनेनाथ कृष्णो5पि त्वरितं द्वारकामगात्,अब वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव मार्गसे लौटकर तुरंत अपने नगरकी ओर चल पड़े। उधर श्रीकृष्ण भी रथके द्वारा शीघ्र ही द्वारका जा पहुँचे
ସେହି ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ପାଣ୍ଡବମାନେ ପଥରୁ ଫେରି ତୁରନ୍ତ ନିଜ ନଗରକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ। ଏପଟେ କୃଷ୍ଣ ମଧ୍ୟ ରଥାରୂଢ ହୋଇ ଶୀଘ୍ର ଦ୍ୱାରକାକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।
Verse 30
सात्वतेन च वीरेण पृष्ठतो यायिना तदा । दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुत: । स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मानिव वेगवान्,सात्वतवंशी वीर सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णके पीछे बैठकर यात्रा कर रहे थे और सारथि दारुक आगे था। उन दोनोंके साथ देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण वेगशाली गरुड़की भाँति द्वारकामें पहुँच गये
ସେତେବେଳେ ଦେବକୀସୁତ, ବିଷ୍ଣୁସ୍ୱରୂପ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସହ ବୀର ସାତ୍ୱତ (ସାତ୍ୟକି) ପଛେ ବସି ଯାତ୍ରା କରୁଥିଲେ, ଏବଂ ସାରଥି ଦାରୁକ ରଥ ଚାଳାଉଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କ ସହିତ କୃଷ୍ଣ ଗରୁଡ ପରି ବେଗବାନ ହୋଇ ଦ୍ୱାରକାକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।
Verse 31
वैशम्पायन उवाच निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युत: । सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों-सहित मार्गसे लौटकर सुहृदोंके साथ अपने श्रेष्ठ नगरके भीतर प्रविष्ट हुए
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଧର୍ମରୁ ଚ୍ୟୁତ ନ ହେବା ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ପଥରୁ ଫେରି, ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ହୋଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନଗରରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 32
विसृज्य सुहृद: सर्वान् भ्रातृन् पुत्रांश्च धर्मराट् । मुमोद पुरुषव्याप्रो द्रौपद्या सहितो नूप,राजन! वहाँ पुरुषसिंह धर्मराजने समस्त सुहृदों, भाइयों और पुत्रोंको विदा करके राजमहलमें द्रौपदीके साथ बैठकर प्रसन्नताका अनुभव किया
ଧର୍ମରାଜ ସମସ୍ତ ସୁହୃଦ, ଭ୍ରାତା ଓ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଦେଇ, ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର ସେ ନୃପ ଦ୍ରୌପଦୀ ସହିତ ରାଜପ୍ରାସାଦରେ ଉପବିଷ୍ଟ ହୋଇ ଶାନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନତା ଅନୁଭବ କଲେ।
Verse 33
केशवो<पि मुदा युक्त: प्रविवेश पुरोत्तमम् । पूज्यमानो यदुश्रेष्ठैरुग्रसेनमुखैस्तथा,इधर भगवान् केशव भी उग्रसेन आदि श्रेष्ठ यादवोंसे सम्मानित हो प्रसन्नतापूर्वक द्वारकापुरीके भीतर गये
କେଶବ ମଧ୍ୟ ଆନନ୍ଦଯୁକ୍ତ ହୋଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନଗରୀରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ; ଉଗ୍ରସେନ ପ୍ରମୁଖ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯାଦବମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ-ସମ୍ମାନିତ ହୋଇ ସେ ଭିତରକୁ ଗଲେ।
Verse 34
आहुकं पितरं वृद्ध मातरं च यशस्विनीम् । अभिवाद्य बल॑ चैव स्थित: कमललोचन:,कमलनयन श्रीकृष्णने राजा उम्रसेन, बूढ़े पिता वसुदेव और यशस्विनी माता देवकीको प्रणाम करके बलरामजीके चरणोंमें मस्तक झुकाया
କମଳଲୋଚନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବୃଦ୍ଧ ପିତା ଆହୁକ (ଉଗ୍ରସେନ) ଓ ଯଶସ୍ୱିନୀ ମାତାଙ୍କୁ ଅଭିବାଦନ କଲେ; ପରେ ବଳ (ବଳରାମ)ଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଣାମ କରି ସେମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଲେ।
Verse 35
प्रद्युम्नसाम्बनिशठां श्वारुदेष्णं गद॑ तथा । अनिरुद्धं च भानुं च परिष्वज्य जनार्दन:
ଜନାର୍ଦନ ପ୍ରଦ୍ୟୁମ୍ନ, ସାମ୍ବ, ନିଷଠ, ଶ୍ୱାରୁଦେଷ୍ଣ, ଗଦ, ଅନିରୁଦ୍ଧ ଓ ଭାନୁ—ଏ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ନିଜ ସନ୍ନିଧିରେ ଆଣିଲେ; କୁଳବନ୍ଧନର ଦୃଢତା ପ୍ରକାଶ କଲେ।
Verse 36
मयो5पि स महाभाग: सर्वरत्नविभूषिताम् । विधिवत् कल्पयामास सभां धर्मसुताय वै,इधर महाभाग मयने भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित सभामण्डप बनानेकी मन-ही-मन कल्पना की
ଏପଟେ ମହାଭାଗ ମୟ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମସୁତ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଇଁ ବିଧିବତ୍ ସମସ୍ତ ରତ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ ଏକ ସଭାମଣ୍ଡପ କଳ୍ପନା କରି ତାହା ପ୍ରସ୍ତୁତ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 173
रुक्मदण्डं बृहद्वाहुर्विदुधाव प्रदक्षिणम् । कुरुराज युधिष्ठिरने घोड़ोंकी बागडोर स्वयं अपने हाथमें ले ली। फिर महाबाहु अर्जुन भी रथपर बैठ गये और सुवर्णमय दण्डसे विभूषित श्वेत चँवर और व्यजन लेकर दाहिनी ओरसे उनके ऊपर डुलाने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସୁବର୍ଣ୍ଣଦଣ୍ଡ ହାତରେ ଧରି ମହାବାହୁ ଆଦରପୂର୍ବକ ଦକ୍ଷିଣାବର୍ତ୍ତରେ ପ୍ରଦକ୍ଷିଣା କଲେ। କୁରୁରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଜେ ଘୋଡ଼ାମାନଙ୍କର ବାଗଡୋର ନିଜ ହାତରେ ଧରିଲେ। ପରେ ମହାବାହୁ ଅର୍ଜୁନ ମଧ୍ୟ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି, ସୁବର୍ଣ୍ଣଦଣ୍ଡରେ ଶୋଭିତ ଶ୍ୱେତ ଚାମର ଓ ବ୍ୟଜନ ନେଇ ଡାହାଣ ପାର୍ଶ୍ୱରୁ ତାଙ୍କ ଉପରେ ଡୁଲାଇଲେ—ଏହା ସମ୍ମାନ ଓ ସ୍ୱଇଚ୍ଛାସେବାର ଚିହ୍ନ ଥିଲା।
Verse 193
अन्वीयमान: शुशुभे शिष्यैरिव गुरु: प्रियै: इसी प्रकार नकुल-सहदेवसहित बलवान् भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शाड््गधनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों)-से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया। उस छत्रमें वैदूर्ययमणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीजघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे। उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅନୁସରଣ କରୁଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କେଶବ ଏମିତି ଶୋଭିତ ହେଉଥିଲେ, ଯେପରି ପ୍ରିୟ ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅନୁଗତ ଗୁରୁ। ସେହି ଯାତ୍ରାରେ ବଳବାନ ଭୀମସେନ, ନକୁଳ-ସହଦେବ ସହିତ, ଋତ୍ୱିଜ ଓ ପୁରବାସୀମାନଙ୍କ ଘେରାରେ, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଚାଲିଲେ। ସେମାନେ ତ୍ୱରାରେ ଆଗକୁ ଯାଇ, ଶାଡ୍ଗଧନୁ ଧାରଣ କରିଥିବା ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କ ଉପରେ ଦିବ୍ୟମାଳାରେ ସୁଶୋଭିତ, ଶତଶଲାକାଯୁକ୍ତ, ସୁବର୍ଣ୍ଣବିଭୂଷିତ ଛତ୍ର ଧରିଲେ; ସେହି ଛତ୍ରରେ ବୈଦୂର୍ୟମଣିର ଦଣ୍ଡ ଥିଲା। ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ ମଧ୍ୟ ଶୀଘ୍ର ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ଶ୍ୱେତ ଚାମର ଓ ବ୍ୟଜନ ଡୁଲାଇ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କ ସେବା କଲେ। ସେତେବେଳେ ସମସ୍ତ ଫୁଫେରା ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଯୁକ୍ତ ଶତ୍ରୁଦମନ କେଶବ, ପ୍ରିୟ ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ ଗୁରୁ ଯାତ୍ରା କରୁଥିବା ପରି, ଅପୂର୍ବ ଶୋଭା ପାଇଲେ।
Verse 356
स वृद्धैरभ्यनुज्ञातो रुक्मिण्या भवन ययौ । तत्पश्चात् जनार्दनने प्रद्यम्न, साम्ब, निशठ, चारुदेष्ण, गद, अनिरुद्ध तथा भानु आदिको स्नेहपूर्वक हृदयसे लगाया और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञा लेकर रुक्मिणीजीके महलमें प्रवेश किया
ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ଅନୁମତି ପାଇ ସେ ରୁକ୍ମିଣୀଙ୍କ ଭବନକୁ ଗଲେ। ତାପରେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ପ୍ରଦ୍ୟୁମ୍ନ, ସାମ୍ବ, ନିଶଠ, ଚାରୁଦେଷ୍ଣ, ଗଦ, ଅନିରୁଦ୍ଧ, ଭାନୁ ଆଦିଙ୍କୁ ସ୍ନେହପୂର୍ବକ ହୃଦୟରେ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି, ପୁନଃ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସମ୍ମତି ନେଇ ରୁକ୍ମିଣୀଙ୍କ ପ୍ରାସାଦରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
The chapter emphasizes dharma as correct relational conduct—seeking permission, honoring elders and priests, and aligning personal affection with public responsibility during political travel.
That orderly transitions of power and movement are stabilized by ritualized courtesy: consultation, respectful farewells, gifts and blessings, and public signals of alliance reduce ambiguity in political relationships.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter operates as narrative-ethnographic documentation of protocol, with its significance arising from how these norms support legitimacy and cohesion in the epic’s political world.