
Jarāsandha-prastāvaḥ — Nīti-cintā ca Jarāsandhasya janma-vṛttāntaḥ (The Jarāsandha Prelude: Strategic Counsel and Birth Account)
Upa-parva: Jarāsandha-vadha-nīti (Strategic Counsel on Jarāsandha)
The chapter opens with Vāsudeva endorsing Arjuna’s displayed judgment as appropriate for a Bhārata-lineage prince, then articulates a rationale for timely, disciplined action: the time of death is unknown, and immortality is not attained by non-engagement; therefore, one should proceed with heart-steadying resolve via methodical nīti. The discourse highlights avoiding direct approach to a stronger force when formations are uneven, preferring structured deployment and proximity-based advantage. Yudhiṣṭhira then inquires about Jarāsandha—his strength and extraordinary resilience. Kṛṣṇa responds with a dynastic account beginning with King Bṛhadratha of Magadha, his two wives, and the absence of an heir despite rites. A sage’s boon is mediated through a consecrated mango fruit divided between the queens, leading to pregnancy and the birth of two living halves. The halves are discarded by attendants; the rākṣasī Jarā retrieves and joins them, producing a single, exceptionally strong child. Jarā then presents the child to Bṛhadratha, explaining the circumstances, thereby establishing the etiological basis for Jarāsandha’s name and exceptional constitution.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ का स्वप्न सामने है, पर उसके द्वार पर जरासंध का अडिग पर्वत खड़ा है। युधिष्ठिर का मन उत्साहहीन होकर संन्यास की ओर झुकता है—और सभा में एक क्षण को विजय का संकल्प डगमगा जाता है। → युधिष्ठिर अपने प्रियतम सहारों—भीम और अर्जुन को ‘दो नेत्र’ और कृष्ण को ‘मन’ कहकर भी स्वीकारते हैं कि जरासंध की सेना और पराक्रम यम के समान दुर्जेय हैं। वे कहते हैं कि राजसूय ‘दुराहर’ है; आरम्भ करने पर भी विफलता का भय है, और न करने पर भी अयोग्यता का कलंक। → कृष्ण क्षत्रिय-धर्म का कठोर प्रकाश सभा में रखते हैं: शत्रु-विजय ही क्षत्रिय की वृत्ति है; दैन्य और मोह—ये दोनों विनाशक दोष हैं जिन्हें जय चाहने वाले राजा को त्यागना चाहिए। वे बताते हैं कि प्रमाद-रूप छिद्र से बलवान शत्रु भी क्षीण होता है—अर्थात् जरासंध भी अजेय नहीं, अवसर और नीति से जीता जा सकता है। → कृष्ण लक्ष्य को धर्म-रक्षा से जोड़ते हैं: राजसूय की सिद्धि के लिए जरासंध-विनाश और बंदी राजाओं का परिरक्षण—यह यज्ञार्थ कर्म भी है और लोक-रक्षा भी। वे युधिष्ठिर को संन्यास-प्रवृत्ति से हटाकर आरम्भ, पुरुषार्थ और नीति-युक्त अभियान की ओर मोड़ते हैं। → युधिष्ठिर का संकल्प पुनः जागता है—अब प्रश्न यह रह जाता है कि जरासंध तक पहुँचने और उसे गिराने का ‘द्वार’ कौन-सा होगा, और कौन-से वीर इस कार्य के लिए अग्रसर होंगे।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं) ऑपन---ह< बक। ] अत्ऑका:< घोडशो< ध्याय: जरासंधको जीतनेके विषयमें युधिष्ठिरके उत्साहहीन होनेपर अर्जुनका उत्साहपूर्ण उद्गार युधिषछिर उवाच सम्राड्गुणमभीप्सन् वै युष्मान् स्वार्थपरायण: । कथं प्रहिणुयां कृष्ण सो5हं केवलसाहसात्,युधिष्ठिर बोले--श्रीकृष्ण! मैं सम्राट्के गुणोंको प्राप्त करनेकी इच्छा रखकर स्वार्थसाधनमें तत्पर हो केवल साहसके भरोसे आपलोगोंको जरासंधके पास कैसे भेज दूँ?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ହେ କୃଷ୍ଣ! ସମ୍ରାଟଙ୍କୁ ଯୋଗ୍ୟ ଗୁଣ ଲାଭ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରି, ନିଜ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟସିଦ୍ଧିରେ ତତ୍ପର ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ, କେବଳ ସାହସର ଭରସାରେ ମୁଁ ତୁମମାନଙ୍କୁ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ପାଖକୁ କିପରି ପଠାଇବି? ତୁମ ସୁରକ୍ଷାକୁ ମୂଲ୍ୟ ଦେଇ ସାମ୍ରାଜ୍ୟ ଧାଉଥିବା ଚେଷ୍ଟା ତ ଅବିବେକୀ ଓ ସ୍ୱାର୍ଥପର କାର୍ଯ୍ୟ।
Verse 2
भीमार्जुनावुभौ नेत्रे मनो मन्ये जनार्दनम् | मनश्नक्षुविहीनस्य कीदृशं जीवितं भवेत्,भीमसेन और अर्जुन मेरे दोनों नेत्र हैं और जनार्दन आपको मैं अपना मन मानता हूँ। अपने मन और नेत्रोंको खो देनेपर मेरा यह जीवन कैसा हो जायगा?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନ ମୋ ପାଇଁ ଦୁଇ ଚକ୍ଷୁ ସମାନ; ଜନାର୍ଦନ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ ମୋର ମନ ଭାବେ ମାନେ। ମନ ଓ ଦୃଷ୍ଟି ହରାଇଲେ ଜୀବନ କେମିତି ରହିବ?
Verse 3
जरासंधबल प्राप्य दुष्पारं भीमविक्रमम् । यमो<पि न विजेता55जौ तत्र वः कि विचेष्टितम्,जरासंधकी सेनाका पार पाना कठिन है। उसका पराक्रम भयानक है। युद्धमें उस सेनाका सामना करके यमराज भी विजयी नहीं हो सकते, फिर वहाँ आपलोगोंका प्रयत्न क्या कर सकता है?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ସେନାବଳ ଅତିକ୍ରମ କରିବା ଦୁର୍ଲଭ; ତାଙ୍କର ପରାକ୍ରମ ଭୟଙ୍କର। ସେଇ ରଣରେ ଯମ ମଧ୍ୟ ଜିତିପାରିବେ ନାହିଁ—ତେବେ ସେଠାରେ ତୁମମାନଙ୍କ ପ୍ରୟାସ କ’ଣ କରିପାରିବ?
Verse 4
(कथं जित्वा पुनर्यूयमस्मान् सम्प्रति यास्यथ ।) अस्मिंस्त्वर्थान्तिरे युक्तमनर्थ: प्रतिपद्यते तस्मान्न प्रतिपत्तिस्तु कार्या युक्ता मता मम,आपलोग किस प्रकार उसे जीतकर फिर हमारे पास लौट सकेंगे? यह कार्य हमारे लिये इष्ट फलके विपरीत फल देनेवाला जान पड़ता है। इसमें लगे हुए मनुष्यको निश्चय ही अनर्थकी प्राप्ति होती है। इसलिये अबतक हम जिसे करना चाहते थे, उस राजसूययज्ञकी ओर ध्यान देना उचित नहीं जान पड़ता
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ତୁମେ ତାଙ୍କୁ ଜିତି ପୁଣି ଆମ ପାଖକୁ କିପରି ଫେରିବ? ଏହି ଉଦ୍ୟମ ଆମ ଇଚ୍ଛିତ ଫଳର ବିପରୀତ ଫଳ ଦେବା ପରି ଲାଗୁଛି। ଏପରି ଭିନ୍ନ ପଥରେ ଲାଗିଲେ ନିଶ୍ଚୟ ଅନର୍ଥ ମିଳେ। ତେଣୁ ମୋ ମତରେ, ଆମେ ଯେ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ପାଇଁ ଆଗେଇଯାଉଥିଲୁ, ସେ ଦିଗରେ ଏବେ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବା ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ନୁହେଁ।
Verse 5
यथाहं विमृशाम्येकस्तत् तावच्छुयतां मम । संन्यासं रोचये साधु कार्यस्यास्य जनार्दन | प्रतिहन्ति मनो मे5द्य राजसूयो दुराहर:,जनार्दन! इस विषयमें मैं अकेले जैसा सोचता हूँ, मेरे उस विचारको आप सुनें। मुझे तो इस कार्यको छोड़ देना ही अच्छा लगता है। राजसूयका अनुष्ठान बहुत कठिन है। अब यह मेरे मनको निरुत्साह कर रहा है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ହେ ଜନାର୍ଦନ! ମୁଁ ଏକା ଯେପରି ଭାବୁଛି, ସେତିକି ଶୁଣ। ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ମୋତେ ଶ୍ରେୟସ୍କର ଲାଗୁଛି। ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ଅତ୍ୟନ୍ତ କଠିନ; ଆଜି ଏହା ମୋର ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ରୋକୁଛି ଏବଂ ମନରେ ଅନିଚ୍ଛା ଜଗାଉଛି।
Verse 6
वैशग्पायन उवाच पार्थ: प्राप्य धनु: श्रेष्ठमक्षय्ये च महेषुधी । रथं ध्वजं सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुन उत्तम गाण्डीव धनुष, दो अक्षय तूणीर, दिव्य रथ, ध्वजा और सभा प्राप्त कर चुके थे; इससे उत्साहित होकर वे युधिष्ठिरसे बोले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନୁ, ଦୁଇଟି ଅକ୍ଷୟ ମହାତୂଣୀର, ରଥ, ଧ୍ୱଜା ଓ ସଭାଗୃହ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ଉତ୍ସାହିତ ହୋଇ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।
Verse 7
अर्जुन उवाच धनु: शस्त्र शरा वीर्य पक्षो भूमिर्यशो बलम् | प्राप्तमेतन््मया राजन दुष्प्रापं यदभीप्सितम्,अर्जुनने कहा--राजन्! धनुष, शस्त्र, बाण, पराक्रम, श्रेष्ठ सहायक, भूमि, यश और बलकी प्राप्ति बड़ी कठिनाईसे होती है; किंतु ये सभी दुर्लभ वस्तुएँ मुझे अपनी इच्छाके अनुकूल प्राप्त हुई हैं
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ରାଜନ! ଧନୁ, ଶସ୍ତ୍ର, ବାଣ, ପରାକ୍ରମ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସହାୟ, ଭୂମି, ଯଶ ଓ ବଳ—ଏସବୁ ଦୁଷ୍ପ୍ରାପ୍ୟ; ତଥାପି ଯାହାକୁ ମୁଁ ଅଭିଲଷିଥିଲି, ସେସବୁ ମୋତେ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛି।
Verse 8
कुले जन्म प्रशंसन्ति वैद्या: साधु सुनिष्ठिता: । बलेन सदृशं नास्ति वीर्य तु मम रोचते,अनुभवी दिद्वान् उत्तम कुलमें जन्मकी बड़ी प्रशंसा करते हैं; परंतु बलके समान वह भी नहीं है। मुझे तो बल-पराक्रम ही श्रेष्ठ जान पड़ता है
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ସଦାଚାରରେ ସୁସ୍ଥିତ ବିଦ୍ୱାନମାନେ ଉତ୍ତମ କୁଳରେ ଜନ୍ମକୁ ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ବଳ ସମାନ କିଛି ନାହିଁ। ମୋତେ ତ ଭୀର୍ୟ ଓ ପରାକ୍ରମ ହିଁ ଅଧିକ ରୋଚେ।
Verse 9
कृतवीर्यकुले जातो निर्वीर्य: कि करिष्यति | निर्वीर्ये तु कुले जातो वीर्यवांस्तु विशिष्यते,महापराक्रमी राजा कृतवीर्यके कुलमें उत्पन्न होकर भी जो स्वयं निर्बल है, वह क्या करेगा? निर्बल कुलमें जन्म लेकर भी जो बलवान और पराक्रमी है, वही श्रेष्ठ है
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—କୃତବୀର୍ୟ କୁଳରେ ଜନ୍ମ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଯଦି ନିଜେ ନିର୍ବୀର୍ୟ, ସେ କ’ଣ କରିପାରିବ? କିନ୍ତୁ ନିର୍ବୀର୍ୟ କୁଳରେ ଜନ୍ମ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଯେ ବୀର୍ୟବାନ, ସେ ନିଜ ଗୁଣରେ ହିଁ ବିଶିଷ୍ଟ ହୁଏ।
Verse 10
क्षत्रिय: सर्वशो राजन् यस्य वृत्तिरद्धिषज्जये | सर्वेर्गुणैविह्ीनो5पि वीर्यवान् हि तरेद् रिपून्,महाराज! शत्रुओंको जीतनेमें जिसकी प्रवृत्ति हो, वही सब प्रकारसे श्रेष्ठ क्षत्रिय है। बलवान पुरुष सब गुणोंसे हीन हो, तो भी वह शत्रुओंके संकटसे पार हो सकता है
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ଶତ୍ରୁଜୟରେ ଯାହାର ପ୍ରବୃତ୍ତି, ସେଇ ସର୍ବଥା ଶ୍ରେଷ୍ଠ କ୍ଷତ୍ରିୟ। ବଳବାନ ପୁରୁଷ ଅନ୍ୟ ଗୁଣରେ ହୀନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଶତ୍ରୁ-ସଙ୍କଟକୁ ତରିଯାଏ।
Verse 11
सर्वैरपि गुणैर्युक्तो निर्वीर्य: कि करिष्यति । गुणीभूता गुणा: सर्वे तिष्ठन्ति हि पराक्रमे,जो निर्बल है, वह सर्वगुणसम्पन्न होकर भी क्या करेगा? पराक्रममें सभी गुण उसके अंग बनकर रहते हैं
ଯେ ନିର୍ବଳ, ସେ ସର୍ବଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ କ’ଣ ସାଧିବ? ପରାକ୍ରମରେ ହିଁ ସମସ୍ତ ଗୁଣର ପ୍ରତିଷ୍ଠା; ସାହସ ଓ ଉଦ୍ୟମ ଥିଲେ ଅନ୍ୟ ଗୁଣଗୁଡ଼ିକ ତାହାର ଅଙ୍ଗ-ଉପକରଣ ହୋଇ ରହେ।
Verse 12
जयस्य हेतु: सिद्धिर्हिं कर्म दैवं च संश्रितम् । संयुक्तो हि बलै: कश्रित् प्रमादान्नोपयुज्यते,महाराज! सिद्धि (मनोयोग) और प्रारब्धके अनुकूल पुरुषार्थ ही विजयका हेतु है। कोई बलसे संयुक्त होनेपर भी प्रमाद करे--कर्तव्यमें मन न लगावे, तो वह अपने उद्देश्यमें सफल नहीं हो सकता
ମହାରାଜ! ବିଜୟର ହେତୁ ସେଇ ସିଦ୍ଧି, ଯାହା ଯଥାକର୍ମ ଓ ଦୈବ—ଉଭୟର ଆଶ୍ରୟରେ ରହେ। ବଳସଂଯୁକ୍ତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଯେ ପ୍ରମାଦ କରେ, କର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ମନ ନ ଲଗାଏ, ସେ ଲକ୍ଷ୍ୟ ପାଇବ ନାହିଁ।
Verse 13
तेन द्वारेण शत्रुभ्य: क्षीयते सबलो रिपु:,प्रमादरूप छिद्रके कारण बलवान शत्रु भी अपने शत्रुओंद्वारा मारा जाता है
ସେଇ ‘ଦ୍ୱାର’—ଅର୍ଥାତ୍ ପ୍ରମାଦରୂପ ଛିଦ୍ର—ଦ୍ୱାରା ବଳବାନ ଶତ୍ରୁ ମଧ୍ୟ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ହାତରେ କ୍ଷୀଣ ହୋଇ ନଶିଯାଏ।
Verse 14
दैन्यं यथा बलवति तथा मोहो बलान्विते । तावुभौ नाशकौ हेतू राज्ञा त्याज्यौ जयार्थिना,बलवान पुरुषमें जैसे दीनताका होना बड़ा भारी दोष है, वैसे ही बलिष्ठ पुरुषमें मोहका होना भी महान् दुर्गुण है। दीनता और मोह दोनों विनाशके कारण हैं; अतः विजय चाहनेवाले राजाके लिये वे दोनों ही त्याज्य हैं
ବଳବାନ ପୁରୁଷରେ ଦୈନ୍ୟ ଯେପରି ଭାରି ଦୋଷ, ସେପରି ବଳିଷ୍ଠରେ ମୋହ ମଧ୍ୟ ମହାଦୁର୍ଗୁଣ। ଦୈନ୍ୟ ଓ ମୋହ—ଉଭୟ ନାଶର କାରଣ; ତେଣୁ ବିଜୟକାମୀ ରାଜା ଦୁହିଁକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 15
जरासंधविनाशं च राज्ञां च परिरक्षणम् | यदि कुर्याम यज्ञार्थ कि ततः: परमं भवेत्,यदि हम राजसूययज्ञकी सिद्धिके लिये जरासंधका विनाश तथा कैदमें पड़े हुए राजाओंकी रक्षा कर सकें तो इससे उत्तम और क्या हो सकता है?
ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ଯଦି ଆମେ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ବିନାଶ କରି, କାରାବନ୍ଦୀ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା (ଉଦ୍ଧାର) କରିପାରୁ, ତେବେ ଏହାଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଉ କ’ଣ ହେବ?
Verse 16
अनारम्भे हि नियतो भवेदगुणनिश्चय: । गुणान्नि:संशयाद् राजन् नैर्गुण्यं मन्यसे कथम्,यदि हम यज्ञका आरम्भ नहीं करते हैं तो निश्चय ही हमारी अयोग्यता एवं दुर्बलता प्रकट होती है; अतः राजन! सुनिश्चित गुणकी उपेक्षा करके आप निर्गुणताका कलंक क्यों स्वीकार कर रहे हैं? इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधवधमन्त्रणे षोडशो<ध्याय:
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— ଯଦି ଆମେ ଯଜ୍ଞର ଆରମ୍ଭ ନ କରୁ, ତେବେ ନିଶ୍ଚୟ ଏହି ନିଷ୍କର୍ଷ ହେବ ଯେ ଆମର ଗୁଣ ଓ ସାମର୍ଥ୍ୟ ନାହିଁ। ତେଣୁ, ରାଜନ, ନିଶ୍ଚିତ ଶ୍ରେଷ୍ଠତାକୁ ଅବହେଳା କରି ‘ନିର୍ଗୁଣ’—ଅର୍ଥାତ୍ କର୍ତ୍ତବ୍ୟବେଳେ କାର୍ଯ୍ୟ ନ କରୁଥିବା—ଏହି କଳଙ୍କ କାହିଁକି ଗ୍ରହଣ କରୁଛନ୍ତି?
Verse 17
काषायं सुलभ पश्चान्मुनीनां शममिच्छताम् । साम्राज्यं तु भवेच्छक्यं वयं योत्स्यामहे परान्,ऐसा करनेपर तो शान्तिकी इच्छा रखनेवाले संन्यासियोंका गेरुआ वस्त्र ही हमें सुलभ होगा, परंतु हमलोग साम्राज्यको प्राप्त करनेमें समर्थ हैं; अतः हमलोग शत्रुओंसे अवश्य युद्ध करेंगे
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— ଯଦି ଆମେ ଏହାର ବିପରୀତ କରୁ, ତେବେ ପରେ ଶାନ୍ତି ଚାହୁଁଥିବା ମୁନିମାନଙ୍କର କାଷାୟ (ଗେରୁଆ) ବସ୍ତ୍ର ହିଁ ଆମ ପାଇଁ ସହଜ ହେବ। କିନ୍ତୁ ଆମେ ସାମ୍ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତିରେ ସମର୍ଥ; ତେଣୁ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ନିଶ୍ଚୟ ଯୁଦ୍ଧ କରିବୁ।
Whether to delay action due to risk and uncertainty versus proceeding with a method-governed plan: the chapter argues for timely engagement guided by disciplined formations and targeted objectives rather than indiscriminate escalation.
Sound policy combines resolve with procedure: act without paralysis over uncertain outcomes, avoid approaching superior strength without advantageous configuration, and prioritize decisive levers of power while maintaining moral coherence.
No explicit phalaśruti is presented in the supplied passage; the chapter’s meta-value is primarily etiological and instructional—linking political strategy to a narrative explanation of Jarāsandha’s exceptional nature.