अध्याय ९ — कर्णस्य प्रहारः, योधयुग्मनियोजनम्, शैनेय-कैकेययोर्युद्धविन्यासः
यथा हि शकुनिं गृह छित्त्वा पक्षी च संजय,तथाहमपि सम्प्राप्तो लूनपक्ष इव द्विज: । सूत! जैसे खेलते हुए बालक किसी पक्षीको पकड़कर उसकी दोनों पाँखें काट लेते और प्रसन्नतापूर्वक उसे छोड़ देते हैं। फिर पंख कट जानेके कारण उसका उड़कर कहीं जाना सम्भव नहीं हो पाता। उसी कटे हुए पंखवाले पक्षीके समान मैं भी भारी दुर्दशामें पड़ गया हूँ
yathā hi śakuniṁ gṛhe chittvā pakṣī ca sañjaya, tathāham api samprāpto lūna-pakṣa iva dvijaḥ |
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ! ଯେପରି ଘରେ ଧରାପଡ଼ିଥିବା ପକ୍ଷୀର ପାଖ କୁମାରମାନେ ଖେଳେଖେଳେ କାଟି ଆନନ୍ଦରେ ଛାଡ଼ିଦିଅନ୍ତି, ସେପରି ମୁଁ ମଧ୍ୟ କଟା ପାଖ ଥିବା ଦ୍ୱିଜ ପକ୍ଷୀ ପରି ଏହି ଦଶାକୁ ପହଞ୍ଚିଛି। ପାଖ କଟିଗଲେ ସେ ଇଚ୍ଛାମତେ ଉଡ଼ିପାରେନି; ସେହିପରି ନିଜ ଘରର କର୍ମଫଳରେ ବନ୍ଧି ମୁଁ ଭୟଙ୍କର ଦୁର୍ଦ୍ଦଶାରେ ପଡ଼ିଛି।
धृतराष्ट उवाच