तस्मिन् सुघोरे तुमुले वर्तमाने प्रधानभूयिष्ठतरैः समन्तात् । दुःशासनं तत्र समीक्ष्य राजन् भीमो महाबाहुरचिन्त्यकर्मा,जज्वाल क्रोधादथ भीमसेन आज्यप्रसिक्तो हि यथा हुताश: । राजन! वहाँ चारों ओर जब प्रधान-प्रधान वीरोंका वह अत्यन्त घोर तुमुल युद्ध चल रहा था, उस समय अचिन्त्यपराक्रमी महाबाहु भीमसेन दुःशासनको देखकर पिछली बातें याद करने लगे--*देवी द्रौपदी रजस्वला थी। उसने कोई अपराध नहीं किया था। उसके पति भी उसकी सहायतासे मुँह मोड़ चुके थे तो भी इस दुःशासनने द्रौपदीके केश पकड़े और भरी सभामें उसके वस्त्रोंका अपहरण किया।” उसने और भी जो-जो दुःख दिये थे, उन सबको याद करके भीमसेन घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान क्रोधसे जल उठे
sañjaya uvāca | tasmin sughore tumule vartamāne pradhānabhūyiṣṭhataraiḥ samantāt | duḥśāsanaṃ tatra samīkṣya rājan bhīmo mahābāhur acintyakarmā | jajvāla krodhād atha bhīmasena ājyaprasikto hi yathā hutāśaḥ |
ରାଜନ୍! ଚାରିଦିଗରେ ପ୍ରଧାନ ପ୍ରଧାନ ବୀରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଆବୃତ ସେଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଘୋର ତୁମୁଳ ଯୁଦ୍ଧ ଚାଲିଥିବାବେଳେ, ଅଚିନ୍ତ୍ୟକର୍ମା ମହାବାହୁ ଭୀମସେନ ସେଠାରେ ଦୁଃଶାସନକୁ ଦେଖିଲେ। ପୂର୍ବ ଅପରାଧ ସ୍ମରଣ ହେଉଥିବା ସହିତ ଭୀମସେନ ଘୃତାହୁତି ପାଇଥିବା ଅଗ୍ନି ପରି କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିଉଠିଲେ।
संजय उवाच