कर्णनिधनवृत्तान्तनिवेदनम् | Reporting Karṇa’s Fall to Yudhiṣṭhira
त॑ हन्यां चेत् केशव जीवलोके स्थाता नाहं कालमप्यल्पमात्रम् । ध्यात्वा नूनं होनसा चापि मुक्तो वध राज्ञो भ्रष्टवीर्यो विचेता:,केशव! यदि मैं युधिष्ठिरको मार डालूँ तो इस जीव-जगतमे थोड़ी देर भी मैं जीवित नहीं रह सकता। यदि किसी तरह पापसे छूट जाऊँ तो भी राजा युधिष्ठिरके वधका चिन्तन करके जी नहीं सकता। निश्चय ही इस समय मैं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर पराक्रमशून्य और अचेत- सा हो गया हूँ
taṁ hanyāṁ cet keśava jīvaloke sthātā na ahaṁ kālam api alpamātram | dhyātvā nūnaṁ hīnasā cāpi mukto vadhaṁ rājño bhraṣṭavīryo vicetāḥ ||
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— “କେଶବ! ଯଦି ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରିଦେଉ, ତେବେ ଏହି ଜୀବଲୋକରେ କ୍ଷଣମାତ୍ର ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚିପାରିବି ନାହିଁ। କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ପାପରୁ ମୁକ୍ତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ରାଜାଙ୍କ ବଧର ଚିନ୍ତା କରି ପରେ ମୁଁ ଜୀବନ ଧାରଣ କରିପାରିବି ନାହିଁ। ନିଶ୍ଚୟ ଏହି ସମୟରେ ମୁଁ କର୍ତ୍ତବ୍ୟବିମୂଢ଼, ପରାକ୍ରମହୀନ ଏବଂ ପ୍ରାୟ ଅଚେତ ହୋଇପଡ଼ିଛି।”
अर्जुन उवाच