यथैव मनत्तो मद्येन त्वं तथा लक्ष्यसे वृष | तथाद्य त्वां प्रमाद्यन्तं चिकित्सेयं सुहृत्तया,किंतु वृषभस्वरूप कर्ण! जैसे कोई मदिरासे मतवाला हो गया हो, उसी प्रकार तुम भी उन्मत्त दिखायी दे रहे हो; अतः मैं हितैषी सुहृद् होनेके नाते तुम-जैसे प्रमत्तकी आज चिकित्सा करूँगा
ହେ ବୃଷଭସ୍ୱରୂପ କର୍ଣ୍ଣ! ଯେପରି ମଦିରାରେ ମତ୍ତ ହୋଇଥିବା ଲୋକ ଦିଶେ, ସେପରି ତୁମେ ମଧ୍ୟ ଉନ୍ମତ୍ତ ଲାଗୁଛ; ତେଣୁ ହିତେଷୀ ସୁହୃଦ୍ ହୋଇ ଆଜି ମୁଁ ତୁମ ଏହି ପ୍ରମାଦର ଚିକିତ୍ସା କରିବି।
संजय उवाच